Mujhmein Kuchh Hai Jo Aaina Sa Hai
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‘मुझमें कुछ है जो आईना सा है’ ध्रुव गुप्त की ग़ज़लों-नज़्मों का वह संग्रह है जिसमें रोशनी का अँधेरा और अँधेरे की रोशनी है। और यही शायर की वह हासिलात हैं जिनके सहारे नहीं, ताक़त से उसने अपनी शायरी के मिज़ाज और फ़न को एरक जदीद मुकाम दिया है।</p> <p>ध्रुव गुप्त की शायरी की एक बड़ी ताक़त है—लोक। लोक गाँव का, नगर का। शायर के इस लोक में सम्बन्ध-सरोकार, दुःख-आग और आवारगी तथा दूब-भर उम्मीद के विभिन्न रंग-रूप और आयामों के अन्दाज़े-बयाँ सुर में सृजन-सा नज़र आते हैं। लफ़्ज़ों की आँखों और ज़ुबाँ से पता चलता है कि लोग यहाँ अपने ख़्वाबों के लिए जीते भी हैं, मरते भी हैं और मारे भी जाते हैं। इसलिए यहाँ ख़ामोशियाँ भी गाई जाती हैं।</p> <p>संग्रह में ग़ज़लें हों या नज़्म—स्रोतों का एक बड़ा हिस्सा, अपने कथ्य-प्रकृति के इन्तख़ाब में बचपन और माँ का है। समाज और संस्कृति का है, जो तसव्वुर और हक़ीक़त की केन्द्रीयता में वजूद और आफ़ाक की निर्मिति के लिए अहम भूमिका निभाते हैं। घुटन और टूटन के मद्देनज़र शायर का यह गहरा इन्द्रिय-बोध ही है कि अपनी दुनिया के लिए इस उत्तर-आधुनिक दुनिया में वह, जो दिख सके-देख सके, उसे आदमी की नज़र से ही नहीं बल्कि उस चिड़िया की नज़र से भी देखता है—जिसका एक घर के एक कमरे में अपना एक घर था, और जिसमें एक दिन सामान इतने रखे गए कि घर में उसका घर रहा ही नहीं और वह भी एक दिन एक घर के एक बन्द कमरे में मर गई!</p> <p>ज्यूँ मुन्दरिज है कि शायरी चाहे उर्दू की हो या हिन्दी की लफ़्ज़ों के हक़्काक बनने से कोई शायर नहीं हो जाता। शायर तो वही होता है जो अपने ज़ख़्मों की परतों में जीने के लिए रोज़ मरता रहता हो और यहाँ भी उसे खरोंचते हुए गुज़रता हो वक़्त! ध्रुव गुप्त के इस संग्रह के किसी शेर, किसी अच्छर, किसी मिसरे से ही सही, एहसास और अनुभव की यह तासीर अँधेरे की रोशनी और रोशनी के अँधेरे में एक परिन्दे के उड़ान भरने-सा प्रतीत होती है और यह प्रतीति ही ‘मुझमें कुछ है जो आईना सा है’ की प्रतीति भी है!
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‘मुझमें कुछ है जो आईना सा है’ ध्रुव गुप्त की ग़ज़लों-नज़्मों का वह संग्रह है जिसमें रोशनी का अँधेरा और अँधेरे की रोशनी है। और यही शायर की वह हासिलात हैं जिनके सहारे नहीं, ताक़त से उसने अपनी शायरी के मिज़ाज और फ़न को एरक जदीद मुकाम दिया है।</p>
<p>ध्रुव गुप्त की शायरी की एक बड़ी ताक़त है—लोक। लोक गाँव का, नगर का। शायर के इस लोक में सम्बन्ध-सरोकार, दुःख-आग और आवारगी तथा दूब-भर उम्मीद के विभिन्न रंग-रूप और आयामों के अन्दाज़े-बयाँ सुर में सृजन-सा नज़र आते हैं। लफ़्ज़ों की आँखों और ज़ुबाँ से पता चलता है कि लोग यहाँ अपने ख़्वाबों के लिए जीते भी हैं, मरते भी हैं और मारे भी जाते हैं। इसलिए यहाँ ख़ामोशियाँ भी गाई जाती हैं।</p>
<p>संग्रह में ग़ज़लें हों या नज़्म—स्रोतों का एक बड़ा हिस्सा, अपने कथ्य-प्रकृति के इन्तख़ाब में बचपन और माँ का है। समाज और संस्कृति का है, जो तसव्वुर और हक़ीक़त की केन्द्रीयता में वजूद और आफ़ाक की निर्मिति के लिए अहम भूमिका निभाते हैं। घुटन और टूटन के मद्देनज़र शायर का यह गहरा इन्द्रिय-बोध ही है कि अपनी दुनिया के लिए इस उत्तर-आधुनिक दुनिया में वह, जो दिख सके-देख सके, उसे आदमी की नज़र से ही नहीं बल्कि उस चिड़िया की नज़र से भी देखता है—जिसका एक घर के एक कमरे में अपना एक घर था, और जिसमें एक दिन सामान इतने रखे गए कि घर में उसका घर रहा ही नहीं और वह भी एक दिन एक घर के एक बन्द कमरे में मर गई!</p>
<p>ज्यूँ मुन्दरिज है कि शायरी चाहे उर्दू की हो या हिन्दी की लफ़्ज़ों के हक़्काक बनने से कोई शायर नहीं हो जाता। शायर तो वही होता है जो अपने ज़ख़्मों की परतों में जीने के लिए रोज़ मरता रहता हो और यहाँ भी उसे खरोंचते हुए गुज़रता हो वक़्त! ध्रुव गुप्त के इस संग्रह के किसी शेर, किसी अच्छर, किसी मिसरे से ही सही, एहसास और अनुभव की यह तासीर अँधेरे की रोशनी और रोशनी के अँधेरे में एक परिन्दे के उड़ान भरने-सा प्रतीत होती है और यह प्रतीति ही ‘मुझमें कुछ है जो आईना सा है’ की प्रतीति भी है!
Book Details
-
ISBN9788183616836
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Ashok Kumar Pandey
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- Description: ‘आवाज़-बेआवाज़’ की कविताएँ मानवीय और राजनीतिक सरोकारों का एक विशाल वितान रचती हैं। ये एक ऐसे हस्सास मन का प्रतिबिम्ब हैं, जिसकी चिन्ताएँ अपने अध्ययन-कक्ष से लेकर संसार के हर उस कोने तक व्यापती हैं जहाँ मनुष्यता संकट में है, जहाँ सर्वसत्तावादी राजनीति मानव-जीवन को अपना चारा बनाने को उद्यत है। ये एक चिन्तनशील और सजग मस्तिष्क के वे हार्दिक उद्गार हैं जो केवल कविता में ही व्यक्त हो सकते थे। कश्मीर से लेकर फ़लस्तीन और प्रेम की सान्द्र अनुभूतियों से लेकर व्यक्ति के तीक्ष्ण व्यर्थताबोध तक ये कविताएँ अपने सघन शिल्प में एक लम्बी सड़क बनाती हैं जिस पर आप वर्तमान समय की वास्तविकताओं के एक बहुरूपदर्शी सफ़र पर निकलते हैं। राजनीति की मौजूदा भंगिमाओं को ये कविताएँ अकसर ही अचूक ढंग से निडरतापूर्वक रेखांकित करती हैं, और उनके फलितार्थों के प्रति हमें आगाह करती हैं। ‘आवाज़ें पहले से रिकॉर्ड हैं’—यह एक वाक्य ही हमारे इस काल की सर्वाधिक भयावह परिस्थिति को समझने के लिए पर्याप्त है, जहाँ वे तमाम चीज़ें जिनसे जनतंत्र को उम्मीद थी, भीतर से ख़ाली हो गई प्रतीत होती हैं। इन कविताओं के असंख्य बिम्ब और उनका आन्तरिक तनाव देर तक आपके साथ रहता है।
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