Pragatisheel Sahitya Ki Jimmedari
Author:
MarkandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
हिन्दी साहित्य में मार्कण्डेय की पहचान मुख्यतः कहानीकार के रूप में है<strong>।</strong> 2-डी, मिन्टो रोड से सीधे जुड़े रहे लोग भी उन्हें एक बेहतरीन क़िस्सागो के रूप में ही याद करते हैं<strong>।</strong> लेकिन देश और समाज-संस्कृति की लेकर उनकी चिन्ताएँ व ज़िम्मेदारी का भाव उन्हें कहानी से निर्बन्ध भी करता रहता और विचार-रूप में सीधे व्यक्त हो उठता<strong>।</strong> यह पुस्तक मार्कण्डेय की इस पहचान को सामने लाती है।</p>
<p>इस पुस्तक की अन्तर्वस्तु का फैलाव साहित्य से लेकर राजनीति की हद तक है<strong>।</strong> मार्कण्डेय यहाँ जिस चिन्तनधारा व इतिहासबोध को अपनाते हैं, वह आधुनिक समाज-विज्ञानों से आता तो है लेकिन अपने समाज की आन्तरिक स्थिति, ‘जन’ तथा ‘लोक’ से अन्तःक्रिया के साथ<strong>।</strong></p>
<p>इस पुस्तक में वैचारिक लेखों के आलावा ‘गोदान’ तथा अन्य ग्राम-उपन्यासों पर लिखे लेख तथा पुस्तक समीक्षाएँ भी शामिल हैं<strong>।</strong> लोक-साहित्य पर दो लेख और दो भाव-चित्र हैं जो आधुनिक और प्रगतिशील दृष्टि को ही अपना प्रस्थान-बिन्दु बनाते हैं<strong>।</strong> इस पुस्तक में मार्कण्डेय सर्वथा भिन्न रूप में पाठकों से रू-ब-रू होते हैं। मार्कण्डेय के साहित्य-संवाद का यह संस्करण ‘प्रगतिशील साहित्य की ज़िम्मेदारी’ पर खरा उतरता है।</p>
<p>—भूमिका से
ISBN: 9788180319976
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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भारतीय साहित्य की एक महान् परम्परा पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया है और वह है मित्रता के चित्रण की। ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ की मैत्रियाँ भी भारतीय मानवीयता का एक अनिवार्य तत्त्व हैं और बीसवीं शताब्दी में जिस वैश्विक मानवीय प्रतिबद्धता की बात की जाती है, उसके मूल में यही वह स्वाभाविक दोस्ताना है जो इनसानों में हमेशा मौजूद रहता है। मुक्तिबोध के बाद भगवत रावत आज के पहले हिन्दी कवि हैं जिनके यहाँ दोस्ती का जज़्बा, किसी मित्र की प्रतीक्षा, सखा के आने की ख़ुशी, बल्कि किसी भी राह चलते को दोस्त बनाने की चाहत इतनी शिद्दत से मौजूद है। जब हर अपने जैसा इनसान दोस्त है तो बेशक वसुधा भी कुटुम्ब है। यह आकस्मिक नहीं है कि भगवत रावत ने कुछ कविताएँ अपने कवि-कलाका र मित्रों पर भी लिखी हैं। दोस्ती का यह जज़्बा उस समय और भी सम्पूर्ण तथा सार्थक हो जाता है, जब भगवत रावत उसकी ज़द में प्रकृति और पर्यावरण को भी ले आते हैं।
भगवत रावत की ये कविताएँ भारतीय जीवन के ऐसे कई चित्र हिन्दी कविता में पहली बार लाती हैं जो शायद पहले कभी देखे नहीं गए। यदि प्रेमचन्द ने ‘क़फन’ में दलितों के मर्मांतक यथार्थ का चित्रण किया था तो ‘अतिथि कथा’ में भगवत रावत उसी बिरादरी का एक ऐसा स्निग्ध दृश्य उपस्थित करते हैं जो आत्मा को जगमगा जाता है। ‘यह तो अच्छा हुआ’, ‘सोच रही है गंगाबाई’, ‘मानव-संग्रहालय’ (जो निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ का समसामयिक संस्करण है) आदि में उनकी कविता संसार के सबसे बड़े सर्वहारा वर्ग—स्त्रियों की कथाएँ खोज लेती है। उनकी ‘कचरा बीननेवाली लड़कियाँ’ हिन्दी की इस तरह की बेहतरीन समूहपरक कविताओं में भी अपनी निगाह और वात्सल्य के लिए बेमिसाल स्वीकार की जानी चाहिए। यदि भगवत रावत की व्यापक आस्था और पक्षधरता को लेकर किसी भी दुविधा की गुंजाइश नहीं है तो यह भी सच है कि उसमें कोई अतिमानवीय, सुनियोजित, यंत्रचालित आशावाद तथा आत्माभिनन्दन भी नहीं है। कई कविताओं में पराजय की अकातर स्वीकृति है, अपनी और अपने जैसों की भूल-ग़लतियों, ख़ामियों और ग़फ़लतों का इक़बाल भी है। लेकिन इनमें आत्मदया और विलाप नहीं है, बल्कि उस तरह का मूल्यांकन है जो हर मुक़ाबले के बाद शाम को शिविरों में किया जाता है ताकि अगली सुबह फिर आगे बढ़ा जा सके। ‘मेरा चेहरा’, ‘सच पूछो तो’, ‘ठहरा हूँ जब-जब छाया के नीचे’, ‘क्या इसीलिए धारण की थी देह’, ‘मौत’ तथा ‘आग पेटी’ जैसी अत्यन्त निजी कविताओं में अपने एकान्त, पारिवारिक और सामाजिक जीवन से कई क़िस्म की मुठभेड़ें हैं, आत्म-स्वीकृतियाँ हैं, यथार्थ से निर्मम मुक़ाबले हैं लेकिन निराशा या पस्ती कहीं नहीं है।
भगवत रावत की काव्य-प्रौढ़ता का एक विलक्षण पहलू उनका शिल्प-वैविध्य है। ‘सम्भव नहीं’, ‘और अन्त में’ तथा ‘हम जो बचे रह गए’ सरीखी कविताएँ सिद्ध करती हैं कि छन्द पर भी उनका सहज अधिकार है जबकि कुछ लम्बी कविताओं में उन्होंने सिर्फ़ एक विचार-स्थिति को निबाहा है और कुछ में वे सफल कथा-निर्वाह कर ले गए हैं। छोटी रचनाओं को उन्होंने उक्ति, सुभाषित, शब्द-चित्र या व्यंग्य नहीं बना दिया है, बल्कि, उनमें जायज़ कविता मौजूद है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात शायद यह है कि इन कविताओं में अधिकांश में भगवत रावत भाषा की एक ऐसी विरल सादगी हासिल कर पाए हैं जो अपनी सम्प्रेषणीयता में किसी तंतुवाय से जगाए गए सुदूर लेकिन गहरे संगीत की तरह है। भाषा को शिल्प, और इन दोनों को कथ्य से अलग करके देखना हिमाकत है, इसलिए यह माने बिना काम नहीं चलता कि सच पूछो तो भगवत रावत की कविता अपने सारे आयामों में हिन्दी में ऐसी जगह बना चुकी है जिसकी उपेक्षा कविता की अपनी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगाकर ही की जा सकती है।
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शेफाली की साहित्यिक कल्पना उसकी आध्यात्मिक पिपासा से एकमेक है। और इस कारण, उसकी कविताएँ अक्षय वैभव का गीत हैं। प्रकृति उसके कानों में अपना रहस्य खोलती है और उसका ध्यानधीर आत्म हमें उन क्षणों के दर्शन को प्रेरित करता है।
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सूक्तियों की भूमिका अक्सर प्रेरक होती है। वे हमारी संवेदना और विचारों को स्पर्श कर परिष्कृत करने का काम करती हैं। वे किसी भी भाषा में लिखी गई हों, बोलचाल में इस तरह घुलमिल जाती हैं कि उद्देश्य हो या उपदेश उसकी पूर्व पीठिका की तैयारी में सहज ही उदाहरण बन व्यक्त हो जाती हैं, और बात की प्रामाणिकता तनिक बढ़ जाती है।
सूक्ति-संग्रह का रिवाज उर्दू में रहा है, मगर हिन्दी में यह यदा-कदा ही देखने को मिलता है। संस्कृत में भी एक समय सुभाषित-संचय की प्रथा ख़ूब बढ़ी थी। ऐसे शब्द-समूह, वाक्य या अनुच्छेदों को सुभाषित कहते हैं जिसमें कोई बात सुन्दर ढंग से या बुद्धिमत्तापूर्ण तरीक़े से कही गई हो। शायद इसी से प्रेरित हो कभी दिनकर जी ने भी कई सुभाषित रचे थे जो उनके ‘नये सुभाषित’ संग्रह में शामिल हैं। और दिनकर जी की मानें तो ‘वर्तमान संग्रह में नए सुभाषित से एक पंक्ति भी नहीं ली गई है। इस संग्रह की सभी सूक्तियाँ मेरे नाना काव्य-संग्रहों में से चुनी गई हैं।’ निस्सन्देह, ‘दिनकर की सूक्तियाँ’ एक राष्ट्रकवि की एक ऐसी कृति है जो विचारोत्तेजक और मार्गदर्शक तो है ही, प्रखर चिन्तन और मानवतावादी दर्शन का एक अनुपम संग्रह भी है।
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