Pakistani Urdu Shayari Vol. 4
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‘पाकिस्तानी उर्दू शायरी’ के इस खंड में बारह शायरों की रचनाएँ शामिल हैं। नज़्मों, ग़ज़लों और फुटकर शे’रों के अलावा कुछ रचनाकारों के गीत और क़तआत भी आपको इसमें मिलेंगे।</p> <p>इस पुस्तक शृंखला में शायरों का परिचय, जिसे सम्पादकों ने काफ़ी खोजबीन के बाद तैयार किया, अपने आप में संग्रहणीय सामग्री है। इसे पढ़ते हुए हमें पाकिस्तान में उर्दू काव्य-संसार का भी परिचय मिलता चलता है। उससे हमें मालूम होता है कि जिस तरह भारत में, उसी तरह पाकिस्तान में भी अकसर शायरों-लेखकों का जीवन चुनौतीपूर्ण रहा है। वहाँ के लोगों का और भी ज़्यादा क्योंकि पाकिस्तानी क़लम के ऊपर कठमुल्लापन और शासन की भी तीख़ी निगाह टिकी रही।</p> <p>इस शृंखला में अब तक शामिल शायरों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इसके बावजूद कभी अपने स्वर को मद्धम नहीं होने दिया। इसी खंड में प्रकाशित हमीद जालंधरी का यह क़तआ इसका प्रमाण है : ‘कितने ठाठ-बाट से आए आख़िर को बदनाम गए / नाज़ी बनकर आनेवाले गए तो नाफ़रजाम गए / हिटलर, मुसोलिनी और नासिर, इसकंदर, यह्या, अय्यूब / बोल रही है दुनिया, आमिर सबके सब नाकाम गए।’</p> <p>इसी तेवर और साफ़गोई से अपनी बात कहनेवाली अनेक नज़्में-ग़ज़लें इस ग्रन्थ-शृंखला को एक दस्तावेज़ बनाती हैं, हमारी नज़र से ओझल पाकिस्तान के शायरों को सामने लाने का काम तो ये पुस्तकें करती ही हैं।
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‘पाकिस्तानी उर्दू शायरी’ के इस खंड में बारह शायरों की रचनाएँ शामिल हैं। नज़्मों, ग़ज़लों और फुटकर शे’रों के अलावा कुछ रचनाकारों के गीत और क़तआत भी आपको इसमें मिलेंगे।</p>
<p>इस पुस्तक शृंखला में शायरों का परिचय, जिसे सम्पादकों ने काफ़ी खोजबीन के बाद तैयार किया, अपने आप में संग्रहणीय सामग्री है। इसे पढ़ते हुए हमें पाकिस्तान में उर्दू काव्य-संसार का भी परिचय मिलता चलता है। उससे हमें मालूम होता है कि जिस तरह भारत में, उसी तरह पाकिस्तान में भी अकसर शायरों-लेखकों का जीवन चुनौतीपूर्ण रहा है। वहाँ के लोगों का और भी ज़्यादा क्योंकि पाकिस्तानी क़लम के ऊपर कठमुल्लापन और शासन की भी तीख़ी निगाह टिकी रही।</p>
<p>इस शृंखला में अब तक शामिल शायरों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इसके बावजूद कभी अपने स्वर को मद्धम नहीं होने दिया। इसी खंड में प्रकाशित हमीद जालंधरी का यह क़तआ इसका प्रमाण है : ‘कितने ठाठ-बाट से आए आख़िर को बदनाम गए / नाज़ी बनकर आनेवाले गए तो नाफ़रजाम गए / हिटलर, मुसोलिनी और नासिर, इसकंदर, यह्या, अय्यूब / बोल रही है दुनिया, आमिर सबके सब नाकाम गए।’</p>
<p>इसी तेवर और साफ़गोई से अपनी बात कहनेवाली अनेक नज़्में-ग़ज़लें इस ग्रन्थ-शृंखला को एक दस्तावेज़ बनाती हैं, हमारी नज़र से ओझल पाकिस्तान के शायरों को सामने लाने का काम तो ये पुस्तकें करती ही हैं।
Book Details
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ISBN9788119989331
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Pages216
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
यह जीवन के साथ एक सहयात्री की तरह चलती जीवन जैसी ही लम्बी कविता है। किसी बड़ी भीतरी या बाहरी घटना-दुर्घटना की प्रतिक्रिया से उपजी हुई नहीं, बल्कि जीवन के रोजमर्रा के साथ बतियाती हुई कविता।
लेकिन जीवन से आक्रांत कविता नहीं, न ही उसके हर ओर फैले विराट वैभव से भयभीत। एक धीमी बतकही की तरह यह अपनी आँख से अपने आसपास के संसार को, व्यक्ति को, उसके इर्द-गिर्द बुने गुए रिश्तों के संजाल को, भीड़ को, भीड़ के बीच भटकती व्यर्थता को देखती हुई, और इन सबके बारे में कुछ कहती-सुझाती-बताती हुई।
'प्रार्थनारत ज़िन्दगी मुझे क्रोधित नहीं करती। क्योंकि मैं जानता हूँ। ये मजबूर लोग जो कुछ माँग रहे हैं। बस वही इन्हें नहीं मिलना है।' कवि इस कविता में जैसे संसार के बीच अपने होने का ऋण चुकता करते हुए अनेक चीजों की तरफ इशारा करता है। प्रकृति में निहित आखिरी उम्मीद को भी हमारे ध्यान में लाता है और हमारे समाज के भीतर की नकारात्मकता को भी जिसके चलते कई बार हमारा पल-पल व्यथा का बिम्ब होकर रह जाता है।
कवि इस कविता के बारे में अपनी बात रखते हुए कहता है कि नदी घर एक ऐसी यात्रा पर निकलने का प्रयास है जो इस दुनिया को उन ताकतों से मुक्ति दे जिनके चलते घर कारागार हो गए हैं और हमारा अपना वजूद एक बोझ
Dhruv Tara Jal Mein
- Author Name:
Vivek Nirala
- Book Type:

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आज की हिन्दी कविता को जिन लोगों ने सम्भव किया है, उनमें विवेक निराला सर्वाधिक महत्त्व के अधिकारी हैं। सर्वथा नई काव्यभूमि का अर्जन और भाषा की अनूठी भंगिमाओं का सृजन विवेक की कविताओं को एक पृथक् पहचान देते हैं। विवेक अपने काव्य-सन्धान में सुदूर ‘महाभारत’ तक जाते हैं और साथ ही साथ बिलकुल सामने की गली में चल रहे जीवन-व्यापार को भी उसी तन्मयता और कलागत सौष्ठव से चित्त में उतार लेते हैं। इसी प्रशस्त जीवन-चाप के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं 'जूठा-झूठा' जैसे मार्मिक चित्र। बहुत कम कवियों के पास ऐसा विराट कथ्य-वृत्त मिलता है।
विवेक ने बड़े अपनापे के साथ साधारण लोगों का चित्रण किया है। गहरी करुणा और प्रेम से उनके संघर्षों, जिजीविषा और जीवट को उद्घाटित किया है। विवेक की बहुत बड़ी ख़ूबी है उनके स्वर का सन्तुलन। अत्यन्त भावाविष्ट क्षणों में भी उनका स्वर संयत और उद्वेगहीन रहता है यानी तरंगें ताल में नहीं बल्कि पाठक के अन्तस में उठती हैं। ऐसा आत्म-नियंत्रण, वस्तुनिष्ठता और आसक्ति से भरी अनासक्ति दुर्लभ है।
विवेक गहरे और वास्तविक अर्थों में राजनीतिक कवि हैं। कई बार उनकी कविताएँ सपाट और मुँहफट भी लग सकती हैं लेकिन यह भी कवि की रणनीति ही है। वह जो कुछ करते हैं, वह सोची-समझी कला-नीति का परिणाम होता है। 'दिल्ली में एक दिन की राष्ट्रीय समस्या' एक अद्भुत राजनीतिक कविता है। इसका शिल्प भी बेजोड़ है। लेकिन शिल्प की दृष्टि से जो कविता स्वयं विवेक की पिछली सारी कविताओं को पीछे छोड़ देती है वह है ‘नई वर्णमाला’। सम्भवत: ऐसी कविता आज तक लिखी ही नहीं गई। इसी से लगता है कि विवेक कविता की नई वर्णमाला रच रहे हैं और कवि को सभी काव्य-रूपों पर अधिकार प्राप्त है। चाहे वह गद्य कविता हो या छन्दोबद्ध, चाहे लघुकाय हो अथवा लम्बी। ‘स्वर्णयुगों पर शोकगीत’ और ‘विरासत का सवाल’ काफ़ी लम्बी कविताएँ हैं और यहाँ भी कवि ने उसी नियंत्रण और शैल्पिक तथा वास्तु-प्रवीणता का परिचय दिया है।
ऐसा संग्रह कभी-कभी ही बन जाता है। आशा है कि हिन्दी के चारु, सहृदय पाठक इसको अंगीकार करेंगे।
—अरुण कमल
Nazir Banarasi Ki Shayari
- Author Name:
'Nazeer' Banarasi
- Book Type:

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यह ‘कविता की दुनिया में उर्दूमुखी हिन्दी और हिन्दीमुखी उर्दू के अकेले कवि के रूप में सबसे अधिक’ जाने-पहचाने और, ‘राष्ट्रीयता और आपसी भाईचारे अर्थात् भारतीयता के प्रतिनिधि कवि-शायर’ नज़ीर बनारसी की प्रतिनिधि रचनाओं का संग्रह है।
‘नज़ीर’ की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी भाषा की जन-सम्प्रेषणीयता है। भाषा और ग़ज़ल की विशेषता पर स्वयं नज़ीर का दृष्टिकोण एकदम साफ़ था। उनका कहना था—“शायर होने के नाते ग़ज़ल मेरा मिज़ाज है, ग़ज़ल को मैं दीगर असनाफ़े सुखन (रचना-विधा) के मुक़ाबले में मुश्किल समझता हूँ। मेरा विचार है कि ग़ज़ल में इस बात की सम्पूर्ण योग्यताएँ विद्यमान हैं कि वह सम्पूर्ण विचार और तसव्वुरात को अच्छी तरह और आसानी से पेश कर सके, क्योंकि इसका दामन काफ़ी फैला हुआ है।”
ज़ाहिर है कि इस किताब में उनकी उन सभी ग़ज़लों को ले लिया गया है, जिन्हें वे ख़ुद भी अहम मानते थे और उनके चाहनेवाले भी। इसके अलावा वे नज़्में भी यहाँ दे दी गई हैं, जिनसे उनका वैचारिक पक्ष साफ़ होता है।
गंगा प्रदूषण, आतंकवाद और फ़िरकापरस्ती आज भी ज्वलन्त समस्याएँ हैं। इन पर उनका नज़रिया ‘गंगा प्रदूषण’, ‘कैसे-कैसे ज़ेहन को फ़िरक़ापरस्ती खा गई’, ‘फ़िरक़ापरस्ती का चैलेंज’ और ‘फ़िरक़ापरस्ती के चैलेंज का जवाब’ में देखा जा सकता है। वाराणसी में बुनकरों की अलग तरह की समस्या है। ‘इस कटौती की मैयत उठाएँगे हम’ तथा ‘कटौती का दसवाँ’ के माध्यम से इस समस्या पर भी जिस तरह से चर्चा की गई है, उससे समाधान भी दिखाई देता और नज़ीर का एक्टीविस्ट चेहरा भी सामने आता है।
राष्ट्रीयता और आपसी भाईचारे का सन्देश तो क़दम-क़दम पर मिलता ही है। यही नज़ीर का वास्तविक चेहरा है, यही उनकी चिन्ता भी है और चिन्तन भी।
Yah Aakanksha Samay Nahin
- Author Name:
Gagan Gill
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कोई भी कविता अपने समय से गुज़रकर ही सार्थकता अर्जित करती है, यह बात गगन गिल की कविता भी प्रमाणित तो करती है, लेकिन इस तरह नहीं कि समय उनके यहाँ कविता का कोई घोषित विषय हो। ये कविताएँ निस्सन्देह नितान्त निजी अनुभूतियों की कविताएँ हैं। लेकिन यदि कवयित्री इन नितान्त निजी अनुभूतियों और अपने स्वर-वैशिष्ट्य को अक्षत रखते हुए भी युग-संवेदन को व्यंजित कर पाती है, तो इसकी वजह यही है कि समय उसकी काव्योक्तियों में नहीं बल्कि उसके स्थापत्य में, उसकी लय-संरचना में विन्यस्त होता है। यही कारण है कि गगन गिल की कविता को एक दृश्य की तरह देखें तो वह एक शान्त, निरावेग झील का आभास देती है, लेकिन उसे स्पर्श करें तो समय के सभी तनावों-दबावों की थरथराहट महसूस होती है। अक्सर यह कविता शब्दों में नहीं, उनके बीच के अन्तराल में सम्भव होती है। गगन गिल की कविता में शब्द और शब्द के बीच जिस तनाव का अनुभव होता है, उसे सिर्फ़ संगीत की तरह महसूस किया जा सकता है, उसका वक्तव्य नहीं हो सकता।
इसलिए इस बात का महत्त्व एक हद तक ही है कि ये कविताएँ प्रेम के बारे में हैं, वैराग्य के बारे में अथवा स्त्री की स्थिति आदि के बारे में। 'जल के भीतर सूख रहे जल', 'गूँगे के कंठ में याद आया गीत' अथवा 'पिछले जन्म में अधबनी रह गयी थी रोटी तुम्हारे नाम की' ऐसी निजी अनुभूतियों को व्यंजित करते शब्दों के बीच के अन्तराल को विन्यस्त करती एक सम्पीडक-कॉम्प्रेस्ड- लय न केवल समय की जटिलता और विकलता की ध्वन्याकृति हो जाती है, बल्कि इसी कारण अपनी ही एक भाषा की तलाश भी। इसलिए इन काव्यानुभूतियों से गुज़रते हुए रॉबर्तो हुआरोज़ की इस उक्ति का स्मरण आना अस्वाभाविक नहीं है कि कविता भाषा के तल में अस्तित्व का विस्फोट है।
—नन्दकिशोर आचार्य
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