Sadi Patthron Ki
Author:
Narendra MauryaPublisher:
Shivna PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 160
₹
200
Available
Book
ISBN: 9789390593354
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: वासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन
Hare Ko Harinaam
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: ‘केवल कवि ही कविता नहीं रचता, कविता भी बदले में कवि की रचना करती है' जैसी अनुभूति को आत्मसात् करनेवाले दिनकर की विचारप्रधान कविताओं का संकलन है 'हारे को हरिनाम', जिसमें उनके जीवन के उत्तरार्द्ध की दार्शनिक मानसिकता के दर्शन होते हैं। इसमें परम सत्ता के प्रति छलहीन समर्पण की आकुलता से भरी ऐसी कविताओं की अभिव्यक्ति हुई है जिनमें मनुष्य मन की विराटता है। हम कह सकते हैं कि ओज और आक्रोश से भरी राष्ट्रीय कविताओं के सर्जक दिनकर की भक्ति-भावनाओं से विह्वल रचनाओं का यह संग्रह संवेदना और आस्था के विरल आयामों से जोड़ने का एक सफल उपक्रम है। और संग्रह का नाम ‘हारे को हरिनाम’ से कुछ मित्रों के चौंकने पर सच स्वीकार करने की साहस-भरी वह मनुष्यता भी, जिसे राष्ट्रकवि दिनकर अपने इन शब्दों में व्यक्त करते हैं–“...किन्तु पराजित मनुष्य और किसका नाम ले? मैंने अपने आपको क्षमा कर दिया है। बन्धु, तुम भी मुझे क्षमा करो। मुमकिन है, वह ताज़गी हो। जिसे तुम थकान मानते हो। ईश्वर की इच्छा को न मैं जानता हूँ, न तुम जानते हो।”
Antas Ki Khurchan
- Author Name:
Yatish Kumar
- Book Type:

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Description:
‘यतीश कुमार की कविताओं को मैंने पढ़ा। अच्छी रचना से मुझे सार्वजनिकता मिलती है। मैं कुछ और सार्वजनिक हुआ, कुछ और बाहर हुआ, कुछ अन्य से मिला, उनके साथ हुआ और उनके साथ चला।’
—विनोद कुमार शुक्ल
यतीश की कविता का कुनबा काफ़ी बड़ा है, जिसमें आवाँ जितने पात्र भरे पड़े हैं। इनका वैविध्य उनकी संवेदना की परिधि को कहीं व्यापक बनाता है तो कहीं भरमाता है। इस विचलन को हुनर में बदल देने की सम्भावना और भरपूर क्षमता उनके कवित्व में मौजूद है, जिसका प्रमाण हैं इस संकलन की कविताएँ।
—अष्टभुजा शुक्ल
Prithavi Ke Liye To Ruko
- Author Name:
Vijayshankar Chaturvedi
- Book Type:

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Description:
विजयशंकर चतुर्वेदी ऐसे कवि हैं जो अपने को आज के सूर्योदय के साथ-साथ उस सुबह से भी जोड़कर देखते हैं जो निर्माणाधीन सृष्टि की पहली सुबह रही होगी। इतने विराट समय में अपनी निरंतरता को देखना कवि की अद्भुत विशेषता है, जो ध्यान खींचे बिना नहीं रहती। प्राकृतिक विपत्तियों से लड़ते, सीखते मनुष्य की कूवत कैसे-कैसे अपने को अभिव्यक्ति के लायक तरासती रही है और कैसे उन सारे द्वंद्वों से मनुष्य ने एक निर्द्वंद्व सभ्यता के लिए अपने को संघर्षरत रखा है; इस तरह के तमाम संधि-समयों से गुजरते हुए कैसे वह मनुष्य आज तक के समय में पहुंचा है—कवि अपनी उस युद्धगाथा को एक बार फिर से कहने की बेचैनी से भरा हुआ दिखता है।
इस सांस्कृतिक यात्रा और यातना में मनुष्य ने कितने असुंदर के बदले कितना सुंदर गंवाया है—उस भूल-चूक भरे अंधकार को कवि ने अपनी अभिव्यक्ति के विस्फोटक उजालों से भर दिया है। सामाजिक दिक् और काल के बीच इस ब्रह्मांड के शंख को सुनने की शक्ति हमें कवि की बिम्बपूर्ण भाषा से मिलती है। कुछ लोगों ने इस पृथ्वी को एक परिवार की जगह सिर्फ़ बाज़ार और कार्यालय की मेज़ बनाकर रख दिया है। कवि इस पृथ्वी पर एक मनुष्योचित सूर्योदय की प्रतीक्षा में है। अपनी सुंदर, प्यारी और वैचारिक पृथ्वी को कवि रसातल में जाने से रोकना चाहता है। यही चिंता और संघर्ष इन कविताओं के केंद्र में है।
विजयशंकर की कविता में माइथोलॉजी और टेक्नॉलॉजी, दोनों का अंगीकार दिखता है। यह बात तब और साफ हो जाती है जब कवि कहता है कि 'शोकाकुल परिजन ले जायें तो ले जायें, मैं जलूंगा नहीं।' पर विज्ञापन का दंश कवि की चेतना का पीछा वहां भी नहीं छोड़ता।
स्त्री के तीन रूप विजय की कविताओं में अक्सर आते हैं—बेटी, स्त्री और मां। स्त्री के तीनों रूप इन कविताओं में ख़तरों से घिरे हुए दिखते हैं।
विजयशंकर को मैं उनके पहले कविता-संग्रह के प्रकाशन के अवसर पर हार्दिक बधाई देता हूं क्योंकि उनकी इन कविताओं को देखकर उनके विकास और बदलाव की प्रबल संभावनाएं अपनी ओर खींचती हैं। विजयशंकर अपने भीतर के संदेहशील कवि को निरंतर खोजते और तराशते जा रहे हैं इसलिए उनकी यात्रा निश्चय ही अर्थपूर्ण और लंबी होगी।
—लीलाधर जगूड़ी
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