Mornaach
Author:
Nida FazliPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
मोरनाच देवनागरी में आनेवाला निदा फ़ाज़ली का ऐसा संकलन है जिसमें उनकी अब तक की अधिकांश कविताएँ निरखी और परखी जा सकती हैं। इसमें पिछले पच्चीस बरसों की उनकी सोच-समझ और सरोकार का फैलाव है और अब तक आए तीनों मजमूओं में से ख़ुद लेखकीय चुनाव—इसीलिए एक अर्थ में यह निदा की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह भी कहा जा सकता है। इसमें ग़ज़लें भी हैं, नज़्में भी और कुछ गीत भी। शुरू का दौर भी है, बीच का भी और इधर का भी, लेकिन जो बात अव्वल से अब तक मुसलसिल बनी हुई है, वह है कवि का हर एक के लिए एक बेलौस लगाव—कुछ लोगों को यह सिनिसिज़्म की हदों को छूने वाला भी लग सकता है लेकिन शायद यह हर आधुनिक रचनाकार की मजबूरी है कि वह माँ, बाप, भाई, बहन, परिवार, स्त्री, प्रेम, समाज और देश—किसी को भी जस का तस स्वीकार नहीं करता। वह उन्हें सन्देह के कठघरे में धकेलकर सवाल करता है—ऐसे कि पहले वह सवाल पलटकर एक-एक कर ख़ुद उसका गिरेबान पकड़ ले और फिर अन्तत: समाज का होकर रह जाए। यही वह सच है जिसे अपने समय का हर सही रचनाकार अपने अनुभव की रोशनी में ही देखना और परखना चाहता है जैसाकि ख़ुद निदा फ़ाज़ली का ही एक दोहा है:
वो सूफ़ी का कौल हो, या पंडित का ज्ञान
जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान।
—शानी
ISBN: 9789360868765
Pages: 152
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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बीसवीं सदी के तीसरे दशक से लेकर नौवें दशक की शुरुआत तक कवि भवानी प्रसाद मिश्र की अनथक संवेदनाएँ लगातार सफ़र पर रहीं।
हिन्दी भाषा और उसकी प्रकृति को अपनी कविता में सँजोता और नए ढंग से रचता यह कवि न केवल घर, ऑफ़िस या बाज़ार, बल्कि समूची परम्परा में रची-पची और बसी अन्तर्ध्वनियों को जिस तरकीब से जुटाता और उन्हें नई अनुगूँजों से भरता है, वे अनुगूँजें सिर्फ़ कामकाजी आबादी की अनुगूँजें नहीं हैं, उस समूची आबादी की भी हैं जिसमें सूरज, चाँद, आकाश-हवा, नदी-पहाड़, पेड़-पौधे और तमाम चर-अचर जीव-जगत आता है। स्वभावत: इस सर्जना में मानव-आत्मा का सरस-संगीत अपनी समूची आत्मीयता और अन्तरंगता में सघन हो उठा है। कविता में मनुष्य और लोक-प्रकृति और लोक-जीवन की यह संयुक्त भागीदारी एक ऐसी जुगलबन्दी का दृश्य रचती है जिसे केवल निराला, किंचित् अज्ञेय और यत्किंचित् नागार्जुन जैसे कवि करते हैं।
कविता के अनेक रूपों, शैलियों और भंगिमाओं को समेटे यह कवि पारम्परिक रूपों के साथ-साथ नवीनतम रूपों का जैसा विधान रचता है, वह उसकी सामर्थ्य की ही गवाही देता है। मुक्त कविता, गीत-ग़ज़ल, जनगीत, खंडकाव्य, कथा-काव्य, प्रगीत कविता के साथ उसकी सीधी-सादी प्रत्यक्ष भावमयी शैली के साथ आक्रामक, व्यंग्य और उपहासमयी, सांकेतिक और विडम्बनादर्शी भंगिमाएँ भी यहाँ मौजूद हैं। कई एक साथी कवियों में जैसी एकरसता देखी जाती है, भवानी प्रसाद मिश्र ने उसे अपनी भंगिम-विपुलता और शैली-वैविध्य से बार-बार तोड़ा है।
Bhartrihari : Kavita Ka Paras Patthar
- Author Name:
Sudhir Ranjan Singh
- Book Type:

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ऋषियों की नैतिक दृढ़ता, कालिदास, भारवि और माघ की ऐन्द्रिकता और लालित्य, और भक्त कवियों की तन्मयता, और इन सबके साथ ही मानवीय अन्तर्विरोधों की गहरी पकड़—इतना कुछ एक कवि में और वह भी एकश्लोकीय कविता के द्वारा, यह अचम्भित करनेवाली बात है। भर्तृहरि क्लासिकी संस्कृत कविता की परम्परा के साथ भी हैं और उससे हटकर भी। इसलिए उनका अस्तित्व किसी एक व्यक्ति के रूप में भले न दिखाई पड़े और पहचान राजा और योगी जैसे कई व्यक्तियों के रूप में क्यों न होती रही हो, इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि हमारे यहाँ कविता की एक विशेष परम्परा रही थी जिसे भर्तृहरि नामक व्यक्ति से जोड़े बग़ैर ख़ुद कविता का व्यक्तित्व मुखर नहीं होता होगा।
भर्तृहरि सुभाषितों के कवि हैं—एकश्लोकीय कविता के कवि। जिन अनुभूतियों ने भर्तृहरि को सबसे अधिक संचालित किया है, उनमें आवेग का निर्णायक महत्त्व है।
कोसम्बी ने भर्तृहरि की दांते और गोएथे से तुलना करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण किन्तु विवाद योग्य निष्कर्ष निकाले हैं। वह कहते हैं कि दांते का निर्वासन उनकी नागरिक मान्यताओं के प्रति अटल विश्वास के कारण था। इसी के वजन पर भर्तृहरि के लिए कहा जा सकता है कि उनका वैराग्य कोरा आत्मनिर्वासन नहीं है, उसके पीछे उनकी सामाजिक स्वतंत्रता की भावना और उस पर अटल विश्वास है। उसका अपने समय की राजनीतिक, आर्थिक बनावट से तीखा विरोध है।
पराजय का स्वीकार दूर-दूर तक नहीं है भर्तृहरि में। काल अथवा मृत्यु का स्वीकार अवश्य है।
भर्तृहरि की कविता का महत्त्व समूची मानवजाति के लिए तो है ही, सबसे बढ़कर उसका महत्त्व हमारे कवियों के लिए है। विषय से भटके हुए हम जैसे कवियों के लिए भर्तृहरि की कविताएँ विषय हैं; और इस उलझन-भरे समय में सुलझी हुई दृष्टि हैं।
Tevar Saptak
- Author Name:
Rameshraaj
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- Description: तेवरी को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में श्री रमेशराज का नाम अनायास ही सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता। इसके लिए उनका अथक परिश्रम और संघर्ष का अनूठा इतिहास उनके द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका ' तेवरीपक्ष' से प्रारंभ होता है। “ तेवरी एक स्वतंत्र विधा है”, यह सिद्ध करने के लिए वे निरंतर अपने आलेखों के माध्यम से तेवरी के शिल्प पर प्रामाणिक चर्चा करते रहे हैं। तेवरी के पृथक रूप - रसरूप को समझाने के लिए एक नितांत मौलिक रस, ' विरोधरस ' की स्थापना भी उन्होंने की है। छंद के क्षेत्र में नए-नए छंदों के साथ तेवरियों का रचाव अंततः इस भ्रम को तोड़ने में सफल रहता है कि तेवरी ग़ज़ल की नक़ल न होकर अपना एक पृथक अस्तित्व रखती है। तेवरी को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने में उनका सद्यः प्रकाशित लंबी-लंबी तेवरियों का संग्रह -तेवर सप्तक उन सारी खूबियों को समाहित किए है, जिनके माध्यम से आसानी से यह सिद्ध किया जा सकता है कि तेवरी का अपना एक अलग नया और मौलिक काव्यशास्त्र है। “सप्तक” साहित्य के क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। रेख़्ता, हिंदवी शब्दकोशों के अनुसार, सप्तक शब्द के “एक ही प्रकार की सात वस्तुओं” या “कृतियों”, “संगीत में सात स्वरों” के समूह या सात कवियों के एक मंडल द्वारा संकलित कविता के संग्रह को “सप्तक” कहा जाता है। उपरोक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए साहित्य के जाने माने कवि श्री अज्ञेय द्वारा 1943 ईस्वी में नयी कविता के प्रणयन हेतु सात कवियों का एक मंडल बनाकर संकलित किया गया था “तार सप्तक”। यह संग्रह नयी कविता का प्रस्थान बिंदु रेखांकित किया गया। इस “तार सप्तक” के बाद देखते ही देखते, गीत सप्तक, ग़ज़ल सप्तक, कविता सप्तक, ग़ज़ल कविता सप्तक, दोहा सप्तक, सजल सप्तक आदि अनेक सप्तक प्रकाश में आए। जिनमें “गजल कविता सप्तक”, संपादक -जितेंद्र चौहान पार्वती प्रकाशन, इंदौर, तथा “ग़ज़ल सप्तक”, संपादक-राम निहाल गुंजन एवं मथुरा में हिन्दी सजल सर्जना समिति के तत्वावधान में प्रथम हिन्दी सजल महोत्सव, 2017 में पद्मश्री गोपालदास नीरज के कर कमलों से ‘‘सजल सप्तक ’’ का लोकार्पण हुआ। “सप्तक” की इन्हीं मान्यताओं या विशेषताओं को को ध्यान में रखते हुए श्री रमेशराज के इस “तेवर सप्तक” में भी सौ-सौ तेवर वाली सात लंबी तेवरियों को सात शतकों के रूप में एक साथ प्रस्तुत किया है। “तेवर सप्तक” के अंतर्गत शतक के रूप में इन सात लंबी तेवरियों को निम्न नामों से इस प्रकार रखा गया है - 1.घड़ा पाप का भर रहा, 2. अंतर आह अनंत अति, 3. ककड़ी के चोरों को फांसी, 4. मन के घाव नये न ये, 5. रावण कुल के लोग, 6. धन का मद गदगद करे 7. मेरा हाल सोडियम-सा है। सात तेवर शतकों के बना रमेशराज का तेवर सप्तक भी सुधी पाठकों के बीच है। अन्य सप्तकों की तरह इस सप्तक का भी साहित्य जगत में स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है। ~विनोद भारती ' व्यग्र'
Virah Ke Rang
- Author Name:
Seema Gupta
- Book Type:

- Description: Book
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