Padmavat
(0)
Author:
Acharya Ramchandra ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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हिन्दी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित प्रस्तुत पुस्तक ‘पद्मावत’ एक प्रेमाख्यान है जिसमें प्रेम-साधना का सम्यक् प्रतिपादन किया गया है। इसमें प्रेमात्मक इतिवृत्ति की रोचकता है, गम्भीर भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति व उदास चरित्रों का विशद चित्रण है।</p> <p>सिंहल द्वीप के राजा गन्धर्वसेन की पुत्री पद्मावती परम सुन्दरी थी और उसके योग्य वर कहीं नहीं मिल रहा था। पद्मावती के पास हीरामन नाम का एक तोता था, जो बहुत वाचाल एवं पंडित था और उसे बहुत प्रिय था।</p> <p>पद्मावती के रूप एवं गुणों की प्रशंसा सुनते ही राजा रतनसेन उसके लिए अधीर हो उठे और उसे प्राप्त करने की आशा में जोगी का वेश धारण कर घर से निकल पड़े।</p> <p>सिंहल द्वीप में पहुँचकर राजा रतनसेन जोगियों के साथ शिव के मन्दिर में पद्मावती का ध्यान एवं नाम जाप करने लगे। हीरामन ने उधर यह समाचार पद्मावती से कह सुनाया, जो राजा के प्रेम से प्रभावित होकर विकल हो उठी। पंचमी के दिन वह शिवपूजन के लिए उस मन्दिर में गई, जहाँ उसका रूप देखते ही राजा मूर्च्छित हो गया और वह भली-भाँति उसे देख भी नहीं सका। जागने पर जब वह अधीर हो रहे थे, पद्मावती ने उन्हें कहला भेजा कि दुर्ग सिंहलगढ़ पर चढ़े बिना अब उससे भेंट होना सम्भव नहीं है। तदनुसार शिव से सिद्धि पाकर रतनसेन उक्त गढ़ में प्रवेश करने की चेष्टा में ही सबेरे पकड़ लिए गए और उन्हें सूली की आज्ञा दे दी गई। अन्त में जोगियों द्वारा गढ़ के घिर जाने पर शिव की सहायता से उस पर विजय हो गई और गन्धर्वसेन ने पद्मावती के साथ रतनसेन का विवाह कर दिया।</p> <p>विवाहोपरान्त राजा रतनसेन चित्तौड़ लौट आए और सुखपूर्वक रानी पद्मावती के साथ रहने लगे।</p> <p>दूसरी तरफ़ बादशाह अलाउद्दीन रानी पद्मावती के रूप-लावण्य की प्रशंसा सुनकर मुग्ध हो जाता है और विवाह करने को आतुर हो उठा।</p> <p>इसके बाद राजा रतनसेन से मित्रता कर छलपूर्वक उन्हें मरवा दिया। पति का शव देखकर रानी पद्मावती सती हो गईं।</p> <p>अन्त में जब अलाउद्दीन अपनी सेना के साथ चित्तौड़गढ़ पहुँचता है तो रानी पद्मावती की चिता की राख देखकर दु:ख एवं ग्लानि का अनुभव करता है।</p> <p>इस महाकाव्य में प्रेमतत्त्व-विरह का निरूपण तथा प्रेम-साधना का सम्यक् प्रतिपादन तथा सूक्तियों, लोकोक्तियों, मुहावरे तथा कहावतों का प्रयोग बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
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हिन्दी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित प्रस्तुत पुस्तक ‘पद्मावत’ एक प्रेमाख्यान है जिसमें प्रेम-साधना का सम्यक् प्रतिपादन किया गया है। इसमें प्रेमात्मक इतिवृत्ति की रोचकता है, गम्भीर भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति व उदास चरित्रों का विशद चित्रण है।</p>
<p>सिंहल द्वीप के राजा गन्धर्वसेन की पुत्री पद्मावती परम सुन्दरी थी और उसके योग्य वर कहीं नहीं मिल रहा था। पद्मावती के पास हीरामन नाम का एक तोता था, जो बहुत वाचाल एवं पंडित था और उसे बहुत प्रिय था।</p>
<p>पद्मावती के रूप एवं गुणों की प्रशंसा सुनते ही राजा रतनसेन उसके लिए अधीर हो उठे और उसे प्राप्त करने की आशा में जोगी का वेश धारण कर घर से निकल पड़े।</p>
<p>सिंहल द्वीप में पहुँचकर राजा रतनसेन जोगियों के साथ शिव के मन्दिर में पद्मावती का ध्यान एवं नाम जाप करने लगे। हीरामन ने उधर यह समाचार पद्मावती से कह सुनाया, जो राजा के प्रेम से प्रभावित होकर विकल हो उठी। पंचमी के दिन वह शिवपूजन के लिए उस मन्दिर में गई, जहाँ उसका रूप देखते ही राजा मूर्च्छित हो गया और वह भली-भाँति उसे देख भी नहीं सका। जागने पर जब वह अधीर हो रहे थे, पद्मावती ने उन्हें कहला भेजा कि दुर्ग सिंहलगढ़ पर चढ़े बिना अब उससे भेंट होना सम्भव नहीं है। तदनुसार शिव से सिद्धि पाकर रतनसेन उक्त गढ़ में प्रवेश करने की चेष्टा में ही सबेरे पकड़ लिए गए और उन्हें सूली की आज्ञा दे दी गई। अन्त में जोगियों द्वारा गढ़ के घिर जाने पर शिव की सहायता से उस पर विजय हो गई और गन्धर्वसेन ने पद्मावती के साथ रतनसेन का विवाह कर दिया।</p>
<p>विवाहोपरान्त राजा रतनसेन चित्तौड़ लौट आए और सुखपूर्वक रानी पद्मावती के साथ रहने लगे।</p>
<p>दूसरी तरफ़ बादशाह अलाउद्दीन रानी पद्मावती के रूप-लावण्य की प्रशंसा सुनकर मुग्ध हो जाता है और विवाह करने को आतुर हो उठा।</p>
<p>इसके बाद राजा रतनसेन से मित्रता कर छलपूर्वक उन्हें मरवा दिया। पति का शव देखकर रानी पद्मावती सती हो गईं।</p>
<p>अन्त में जब अलाउद्दीन अपनी सेना के साथ चित्तौड़गढ़ पहुँचता है तो रानी पद्मावती की चिता की राख देखकर दु:ख एवं ग्लानि का अनुभव करता है।</p>
<p>इस महाकाव्य में प्रेमतत्त्व-विरह का निरूपण तथा प्रेम-साधना का सम्यक् प्रतिपादन तथा सूक्तियों, लोकोक्तियों, मुहावरे तथा कहावतों का प्रयोग बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
Book Details
-
ISBN9789386863423
-
Pages481
-
Avg Reading Time16 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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संसार के किसी पर्वत की जीवन-कथा इतनी रहस्यमयी न होगी जितनी हिमालय की है। उसकी हर चोटी, हर घाटी हमारे धर्म, दर्शन, काव्य से ही नहीं, हमारे जीवन के सम्पूर्ण निश्रेयम् से जुडी हुई है। संसार के किसी अन्य पर्वत की मानव की संस्कृति, काव्य, दर्शन, धर्म आदि के निर्माण में ऐसा महत्त्व नहीं मिला है, जैसा हमारे हिमालय को प्राप्त है। वह मानो भारत की संश्लिष्ट विशेषताओं का ऐसा अखंड विग्रह है, जिस पर काल कोई खरोंच नहीं लगा सका।
वस्तुतः हिमालय भारतीय संस्कृति के हर नए चरण का पुरातन साथी रहा है। भारतीय जीवन उसकी उजली छाया में पलकर सुन्दर हुआ ये, उसकी शुभ्र ऊँचाई छूने के लिए उन्नत बना है और उसके हृदय से प्रवाहित नदियों में घुलकर निखरा है।
हमारे राष्ट्र के उन्नत शुभ्र मस्तक हिमालय पर जब संघर्ष की नील-लोहित आग्नेय घटाएँ छा गईं, तब देश के चेतना-केन्द्र ने आसन्न संकट की तीव्रानुभूति देश के कोने-कोने में पहुँचा दी।
धरती की आत्मा के शिल्पी होने के कारण साहित्यकारों और चिन्तकों पर विशेष दायित्व आ जाना स्वाभाविक ही था। इतिहास ने अनेक बार प्रमाणित किया है कि जो मानव समूह अपनी धरती से जिस सीमा तक तादात्म्य कर सका है, वह उसी सीमा तक अपनी धरती पर अपराजेय रहा है। आधुनिक युग के साहित्यकार को भी अपने रागात्मक उत्तराधिकार का बोध था। इसी से हिमालय के आसन्न संकट ने उसकी लेखनी को, ओज के शंख और आस्था की वंशी के स्वर दे दिये हैं।
Soorsagar Satik : Vols. 1-2
- Author Name:
Hardev Bahari
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Description:
सूरसागर का प्रस्तुत संस्करण दो भागों में प्रकाशित हो रहा है। प्रत्येक भाग में 1000 से कुछ अधिक पद होंगे। पदों की व्याख्या करना इसका उद्देश्य नहीं है। यह सम्भव है कि किन्हीं अंशों के एक से अधिक अर्थ निकलते हों, किन्तु स्थानाभाव के कारण अनेक अर्थ दे पाना सम्भव नहीं था। पदों में जो कठिन शब्द आए हैं, उन्हें अंग्रेज़ी अंक देकर संकेतित कर दिया गया है। इससे पाठकों को स्वतंत्र रूप से अर्थ चिन्तन की सुविधा रहेगी।
भूमिका में ‘सूरसागर’ के संकलनों और संस्करणों पर विचार करने के पश्चात् ‘सूरसागर’ के दर्शन, भक्तिपक्ष, भावप्रसार, अभिव्यंजना-कौशल, पद-शैली, भाषा आदि विषयों का विवेचन किया गया है जिससे ‘सूरसागर’ की आत्मा को समझने में सहायता मिलेगी। इस प्रकार ‘सूरसागर’ के प्रस्तुत संस्करण को यथासम्भव पूर्ण और उपयोगी बनाने की चेष्टा की गई है।
Jai Kanhaiyalal Ki
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Rameshraaj
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- Description: कवि ने प्रथम पृष्ठ पर ही शीर्षक के नीचे टिप्पणी दी है –“ कृष्ण-रूप में कंस जैसे हर शासक के प्रति “, जिससे मुख्य मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है ‘ करारे व्यंग्य – देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर ‘ | रमेशराज के व्यंग्यों की ख़ास बात यह है कि स्तरहीनता नहीं, कहीं अशिष्टता नहीं, न कहीं मर्यादा का उल्लंघन, फिर भी करारे प्रहार | जीवन का भोगा हुआ यथार्थ जैसे साकार सामने खड़ा हो | कैसी सहज-सरल अभिव्यक्ति, लक्ष्य की ओर दनदनाते-सनसनाते तीर की तरह – जन को न रोटी-दाल, जै कन्हैयालाल की नेताजी को तर माल, जै कन्हैयालाल की! नीति है कमाल की !! व्यंग्य को अधिक धारदार और मारक बनाने के लिए कवि ने उद्धव-गोपी प्रसंग को बड़ी होशियारी के साथ जोड़ दिया है- ऊधौ देश पर आप कर्ज विश्वबैंक का लाद-लाद हो निहाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कथ्य की सशक्तता के साथ कवि का कौशल भी प्रभावित करता है | इसे मैं उक्ति-वैचित्र्य का कमाल मानता हूँ, साथ ही वर्ण-मैत्री भी निर्दोष एवं प्रभावी है | प्रकृति से जो प्रतीक लिए गए हैं वे कवि के मन्तव्य को भी स्पष्ट करते हैं तथा उनसे काव्य में कलात्मक विम्ब-सौन्दर्य भी प्रभावित करता है | देखिये एक उदाहरण – खुशियों का मानसून अँखियों से दूर है सूख गए सुख-ताल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कवि ने अपने कथ्य को अधिक ग्राह्य बनाने के लिए पौराणिक इंगित भी दिए हैं | कहीं विरोधाभास से अपना मन्तव्य स्पष्ट किया है तो कहीं आधुनिक योजनाओं की विडम्बनाओं की ओर इंगित है – केवल अंगूठे नहीं मांगें आज द्रोण जी भील को करें हलाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
Mritti-Tilak
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Ramdhari Singh Dinkar
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