Orhan Aur Anya Kavitayen
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‘आँधी में टूटकर गिरा हुआ मकान/तूफ़ान में सूखकर रेत हुई नदी/थककर गिरा हुआ आदमी/ज़्यादे भरोसे का होता है/अपनी-अपनी सम्भावनाओं में/समर्पित सफलता से/ज़्यादा मूल्यवान होती है/तनी हुई विफलता।’ श्रीप्रकाश शुक्ल के कविता-संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ में शामिल कविता ‘तनी हुई विफलता’ की ये पंक्तियाँ रचनाकार के पक्ष को स्पष्ट कर देती हैं। प्रत्येक सजग और समर्थ रचनाकार बार-बार निजी और सामाजिक अनुभवों को चेतना की कसौटी पर कसता है। इसे ‘पुन:पाठ’ कहें या ‘अर्थान्तर’ सच्चाई यही है कि हर शब्द एक अनुभव माँगता है और हर अनुभव एक जीवन। इस आन्तरिक प्रक्रिया से गुज़रकर जो कवि समय को व्यक्त कर रहे हैं, उनमें श्रीप्रकाश शुक्ल महत्त्वपूर्ण हैं।</p> <p>प्रस्तुत संग्रह को पढ़ते हुए यह लगना अनायास नहीं कि ‘बनारस’ इसकी केन्द्रीयता है। बनारस के अनेक प्रसंग, स्थान और स्वभाव कविताओं में निहित व निनादित हैं।...और एक ‘सनातन नगर’ के बहाने कवि ने आधुनिकता के श्वेत-श्याम आवासों को टटोला है। श्रीप्रकाश शुक्ल में यह कहने का साहस व सलीका भी है कि, ‘सब कुछ बहुवचन में नहीं सोचा जा सकता।’ अपने तरीक़े से सोचते हुए उन्होंने ‘ओरहन’, ‘एक कवि की तलाश में’, ‘हमारे समय का एक शोकगीत’, ‘एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती है’ व ‘छठ की औरतें’ जैसी कई उदाहरणीय कविताएँ रची हैं।</p> <p>इस संग्रह में ‘स्त्री’ को लेकर कुछ बेहद ख़ास कविताएँ हैं। बिना शब्दों का डमरू बजाए। निजी देसी मुहावरे में श्रीप्रकाश ‘लरिकोर’ जैसी अनूठी कविता लिखते हैं। भाषा के स्वीकृत विन्यास को सतर्क चुनौती देते हुए रची गई ये कविताएँ हमें संवेदनाओं के एक सघन संसार में ले जाती हैं, जहाँ अपेक्षित भाषाई मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर भी है जिसमें प्रकृति के साहचर्य से दूर जाते समाज की चालाकियों का पर्दाफ़ाश भी है।
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‘आँधी में टूटकर गिरा हुआ मकान/तूफ़ान में सूखकर रेत हुई नदी/थककर गिरा हुआ आदमी/ज़्यादे भरोसे का होता है/अपनी-अपनी सम्भावनाओं में/समर्पित सफलता से/ज़्यादा मूल्यवान होती है/तनी हुई विफलता।’ श्रीप्रकाश शुक्ल के कविता-संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ में शामिल कविता ‘तनी हुई विफलता’ की ये पंक्तियाँ रचनाकार के पक्ष को स्पष्ट कर देती हैं। प्रत्येक सजग और समर्थ रचनाकार बार-बार निजी और सामाजिक अनुभवों को चेतना की कसौटी पर कसता है। इसे ‘पुन:पाठ’ कहें या ‘अर्थान्तर’ सच्चाई यही है कि हर शब्द एक अनुभव माँगता है और हर अनुभव एक जीवन। इस आन्तरिक प्रक्रिया से गुज़रकर जो कवि समय को व्यक्त कर रहे हैं, उनमें श्रीप्रकाश शुक्ल महत्त्वपूर्ण हैं।</p>
<p>प्रस्तुत संग्रह को पढ़ते हुए यह लगना अनायास नहीं कि ‘बनारस’ इसकी केन्द्रीयता है। बनारस के अनेक प्रसंग, स्थान और स्वभाव कविताओं में निहित व निनादित हैं।...और एक ‘सनातन नगर’ के बहाने कवि ने आधुनिकता के श्वेत-श्याम आवासों को टटोला है। श्रीप्रकाश शुक्ल में यह कहने का साहस व सलीका भी है कि, ‘सब कुछ बहुवचन में नहीं सोचा जा सकता।’ अपने तरीक़े से सोचते हुए उन्होंने ‘ओरहन’, ‘एक कवि की तलाश में’, ‘हमारे समय का एक शोकगीत’, ‘एक स्त्री घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती है’ व ‘छठ की औरतें’ जैसी कई उदाहरणीय कविताएँ रची हैं।</p>
<p>इस संग्रह में ‘स्त्री’ को लेकर कुछ बेहद ख़ास कविताएँ हैं। बिना शब्दों का डमरू बजाए। निजी देसी मुहावरे में श्रीप्रकाश ‘लरिकोर’ जैसी अनूठी कविता लिखते हैं। भाषा के स्वीकृत विन्यास को सतर्क चुनौती देते हुए रची गई ये कविताएँ हमें संवेदनाओं के एक सघन संसार में ले जाती हैं, जहाँ अपेक्षित भाषाई मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर भी है जिसमें प्रकृति के साहचर्य से दूर जाते समाज की चालाकियों का पर्दाफ़ाश भी है।
Book Details
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ISBN9789349159211
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Pages160
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: ग़ालिब का एक शेर ज़़रा सी हेर-फेर के साथ पेश है- होगा कोई ऐसा भी जो कैफ़ी को न जाने शायर तो वो अच्छा है पे... ... ... और इस ‘पे’ (लेकिन) के बाद बहुत कुछ आ सकता है, वह भी जो ‘ग़ालिब’ ने कहा और उसके अलावा बहुत कुछ और भी। कैफ़ी आज़मी के मुआमले में इस ‘पे’ के बाद उनके एक और व्यक्तित्व का तज़्करा भी आ सकता है जिसके दर्शन आपको इस संकलन के पृष्ठों में होंगे। इसमें कोई शक नहीं कि कालमनिगार एक वाहियाततरीन काम है। वक़्ती घटनाओं पर वक़्ती तब्सरा करना कालमनिगार का काम होता है। और यही कारण है कि कालमनिगार का क़लम जब ठहरता है तो बहुत जल्द उसका पाठक उसे भुला भी देता है। लेकिन इसी के बीच इक्का-दुक्का मिसालें ऐसी मिलती हैं जिनमें एक कालमनिगार का जौहर वक़्त की सरहदों को पार करता नज़र आता है। ‘नई गुलिस्ताँ’ में कैफ़ी की रचनाएँ भी इसी श्रेणी में रखी जाने की चीज़ें हैं। कॉलम के रूप में कभी छपी इन रचनाओं में कैफ़ी की अपनी एक अलग ही शैली अपने पूरे तबो-ताब के साथ दिखाई देती है। कैफ़ी का हमज़ाद एक हिकायतनवीस इनमें से अधिकांश रचनाओं का ‘सूत्रधार’ है और किसी नीति-कथा, किसी ऐतिहासिक घटना या किसी लतीफ़े के माध्यम से अपने समय की राजनीति पर एक चुभता हुआ तब्सरा करता है। फिर जिस तरह जातक कथाओं में बुद्ध अन्त में एक नीति-वाक्य बोलते दिखाई देते हैं, उसी तरह इन रचनाओं में कैफ़ी अन्त में एक ‘राजनीतिक-वाक्य’ बोलते नज़र आते हैं। अधिकांश रचनाओं का अन्त कुछ अशआर पर या कुछ सुप्रचलित अशआर की पैरोडी पर होता है जो अपना ख़ुद का एक लुत्फ़ पैदा करते हैं। इसके अलावा इस पूरे संकलन को नज़्म (पद्य) में लिखी नस्र (गद्य) का नाम दें, जो तथाकथित नस्री नज़्म (गद्य-काव्य) से कहीं बहुत ऊँचे दर्जे की चीज़ है, तो कुछ ग़लत नहीं होगा। इस पूरे संकलन में शायद ही कोई ऐसा वाक्य आपको मिले जिसमें कैफ़ी ने अपनी शे’री फ़ितरत छोड़ी हो और क़ाफ़ियापैमाई न की हो। दूसरे अलफ़ाज़ में, कैफ़ी की नस्र भी बड़े ठस्से के साथ यह कहती हुई नज़र आती है कि मैं किसी नस्रनिगार की नहीं, शायर की रचना हूँ। नतीजा यह कि पाठक के लिए इस अच्छे-ख़ासे भारी संकलन में बोर होने का कहीं कोई मुक़ाम नहीं है।
Lava
- Author Name:
Javed Akhtar
- Book Type:

- Description: लावा कुछ बिछड़ने के भी तरीक़े हैं खैर, जाने दो जो गया जैसे थकन से चूर पास आया था इसके गिरा सोते में मुझपर ये शजर क्यों इक खिलौना जोगी से खो गया था बचपन में ढूँढ़ता फिरा उसको वो नगर-नगर तन्हा आज वो भी बिछड़ गया हमसे चलिए, ये क़िस्सा भी तमाम हुआ ढलकी शानों से हर यक़ीं की क़बा ज़िंदगी ले रही है अंगड़ाई पुर-सुकूँ लगती है कितनी झील के पानी पे बत पैरों की बेताबियाँ पानी के अंदर देखिए बहुत आसान है पहचान इसकी अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है जो मंतज़िर न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा कि हमने देर लगा दी पलटके आने में आज फिर दिल है कुछ उदास-उदास देखिए आज याद आए कौन न कोई इश्क़ है बाक़ी न कोई परचम है लोग दीवाने भला किसके सबब से हो जाएँ
Tulsidas "Nirala"
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
“तुलसीदास में स्वाधीनता की भावना का पूर्ण प्रस्फुटन हुआ है। भारत के सांस्कृतिक सूर्य के अस्त होने पर देश में किस तरह अन्धकार छाया हुआ है, इसका मार्मिक चित्रण करते हुए निराला ने दिखलाया है कि किस प्रकार एक कवि इस अन्धकार को दूर करने की चेष्टा करता है। तुलसीदास के रूप में निराला ने आधुनिक कवि के स्वाधीनता-सम्बन्धी भावों के उद्गम और विकास का चित्रण किया है। छायावादी कवि की तरह निराला के तुलसीदास को भी देश की पराधीनता का बोध प्रकृति की पाठशाला में ही होता है; किन्तु छायावादी कवि की तरह वे भी कुछ दिनों के लिए नारी-मोह में पड़कर उस भाव को भूल जाते हैं। अन्त में जो ज्ञान प्रकृति की पाठशाला में मिला था, उसका दीक्षांत भाषण उसी नारी के विश्वविद्यालय में सुनने को मिलता है, और भविष्यवाणी होती है कि :
देश-काल के शर से बिंधकर
यह जागा कवि अशेष छविधर
इसके स्वर से भारती मुखर होंगी।
इस तरह हिन्दी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है।”
—नामवर सिंह
Jeevan Karja Gadi Hai
- Author Name:
Avinash Das
- Book Type:

- Description: collection of ghazals
Selected Poems
- Author Name:
Atal Bihari Vajpayee
- Book Type:

- Description: Shri Atal Bihari Vajpayee has been a patriotic social activist since early childhood, when the country was still under British colonial rule. He started writing poetry during school days. He has always been a poet at heart, with a keen social sensitivity. He develops an intimate relationship with fellow human beings and with the nation, expressing intense feelings in his poetry. He is a critically acclaimed poet. Shri Atal Bihari Vajpayee has been an influence on Indian society. He, as an illustrious parliamentarian and an intellectual with a deep understanding of national and international affairs, has been an active participant in shaping India’s post-Independence domestic and foreign policies. He commands respect for his liberal worldview and commitment to democratic ideals. He was the Prime Minister of India through three democratic mandates. Arvind Shah is a poet, translator and children’s writer. His publications include children’s books, poems and translations. His translations reflect the poet's sentiments.
Kaun Hai Aisa Poojari Dair Mein
- Author Name:
Maikash Akbarabadi
- Book Type:

- Description: हिंदी पाठकों के लिए मयकश अकबराबादी के फ़ारसी और उर्दू कलाम का इन्तिख़ाब पहली बार प्रकशित हो रहा है. किताब के संपादक सुमन मिश्र हैं.
Chidiya Laut Aai Hai
- Author Name:
Pratap Rao Kadam
- Book Type:

-
Description:
मुनिश्री क्षमासागर हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं, एक अद्वितीय कवि। यह तथ्य उनके प्रत्येक काव्य-संग्रह के साथ और पुष्ट और गहरा होता गया। मुनिश्री की कविताएँ जितना बाहर की यात्रा कराती हैं, उससे कहीं अधिक भीतर अपनी पड़ताल करती हैं। संवेदना के दायरे में आई हर वस्तु असाधारण काव्यात्मक गरिमा से भर उठती है। वस्तुओं की वस्तुमयता और जीवों के जैविक गुण और क्रियाकलापों की स्वाभाविकता बनाए रख, उसे अपनी दृष्टि से इतना ट्रांसपेरेंट और व्यापक बना देते हैं कि हमें हमारी गाँठें स्वत: दिखाई पड़ने लगती हैं—‘वाह रे हम/अपनी प्यास/अपने लालच/और अपने दीवानेपन पर/हमें अपने से/कुछ नहीं कहना।’
जीवन और जगत् के प्रति उनकी सजग, सतर्क, संवेदनशील दृष्टि समूचे काव्य-जगत से झाँकती है। जड़ता हमारे समाज को चारों तरफ़ से घेर रही है, ऐसे में मानवीय संवेदना को जीवित और सुरक्षित रखना कवि की प्राथमिकता है—‘सवाल यह नहीं है/कि किसे कम मिला/और किसके हिस्से में/ज़्यादा आया है/मेरी पीड़ा/अपने ही/बँट जाने की है।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक वह, जिसके केन्द्र में प्रकृति है। दूसरा वह, जिसमें इहलोक झाँकता है और कर्म के लिए प्रेरित करता है। तीसरा वह, जिसमें अमूर्त व गूढ़ विषयों पर महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। बहुत सारे अवरोध तो उसके अपने ही हाथों खड़े किए गए हैं। चिड़िया भीग जाती है, नदी भर जाती है, धरती गीली हो जाती है, पर वह न भीग पाता है, न भर पाता है, न गीला हो पाता है। बचने की जुगत में रीता ही रह जाता है। भीगना, भरना, गीला होना व्यापक सन्दर्भ खोलते हैं। प्रकृति से यह दूरी उसे अधूरा ही रखती है—‘पर बहुत मुश्किल है/इस तरह/आदमी का/भीगना और/भर जाना/आदमी के पास/बचने के/उपाय हैं न।’
इन कविताओं में आकाश शामिल होता है चिड़िया की उड़ान में। चिड़िया की, घर पहुँचने की दृढ़ता को असीम सखा भाव से सहलाता है। प्रकृति से बड़ा कोई कलाकार नहीं और न ही प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक, सखा। प्रकृति न कोई भेदभाव करती है, न जाति-बिरादरी के आधार पर बँटवारा। कठघरे, घेरे तो हमारे अपने बनाए हैं—‘आकाश सबका/ दीवारें हमारी अपनी/नदी सबकी/गागर हमारी अपनी/धरती सबकी/आँगन हमारा अपना/बिराट सबका/सीमाएँ हमारी अपनी।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं से गुज़रकर चीज़ें वह नहीं रहतीं जो पूर्व में थीं। उन्हें देखने का नज़रिया अलहदा हो जाता है। इन कविताओं में ‘घर’ रह-रहकर आता है और घर एक समाधान, दिशा, दृष्टि की तरह आता है। वह दृष्टि, जो ‘मेरे घर’ को ‘अपना घर’ बनाती है—‘तुम मेरे घर/नहीं आती/अपने घर आती हो/पर अपने घर/आने के लिए/तुम्हारा मेरे घर आना/मुझे अच्छा लगता है/सचमुच/तुम्हारे घर ने/मेरे घर को/अपना घर बना दिया है।’ वहीं घर-1 व घर-2 कविताओं में घर भिन्न तरह से आता है, जहाँ ‘अपना घर’ कविता में सबके लिए गुंजाइश है। वह मेरे घर से अपना घर बनता है। पर यहाँ बड़ा घर होता है। अतीत, अनागत, वर्तमान के बावजूद। घर—1 कविता यही कहती है—‘चिड़ियों के लिए/और शायद/हम सभी के लिए/अतीत/अनागत/और वर्तमान का/इतना ही अर्थ है/कि हमें हर बार/रहने के लिए/एक घर बनाना है।’ एक छत की जद्दोजहद तो हमेशा रही है और सम्बन्धों के सगेपन को जीने की चाह भी और जहाँ यह हो, वहाँ तो घर होता ही है। ‘खिड़की’ कविता में व्याप्त घर इसी तरफ़ इशारा करता है।
ये कविताएँ कर्म के लिए उकसाती हैं। होश और जोश दोनों ही स्थितियों में कर्म की सीढ़ी बनाने की बात कहती हैं। इन कविताओं के केन्द्र में मनुष्य है। ये कविताएँ अपने-अपने ख़ुदाओं को बनानेवाले मनुष्य से मनुष्य बनने का आग्रह करती हैं—‘सवाल सिर्फ़/योग्यता का नहीं/हू-ब-हू होने का है/स्वयं को/भगवान मानने/मनवाने का नहीं स्वयं भगवान बन जाने का है/और फिर इस बार/ना सही भगवान/एक बेहतर/इनसान तो बन जाएँ।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताएँ, प्रकृति को इतना पारदर्शी बना देती हैं कि उसमें भूत-वर्तमान-भविष्य, सत्ता, नश्वरता, व्यवस्था और जनजीवन के जटिल सम्बन्धों की पहचान आसानी से हो जाती है। ये कविताएँ प्रकृति को इतना अर्थगर्भित और व्यापक बना देती हैं कि इसमें हमारे समय और समाज की आहट अनन्त सम्भावनाएँ उत्पन्न करती हैं। इन कविताओं से गुज़रना प्रकृति, कर्म और घर के नज़दीक होना है। चिड़िया की तरह अपने आकाश, पेड़, नदी, परिवेश को जीना है। कुल मिलाकर अपने नज़दीक आना है, चिड़िया की तरह लौट आना है।
—प्रताप राव कदम
Suraj Ko Angootha
- Author Name:
Jitendra Srivastava
- Book Type:

- Description: सूरज को अँगूठा दिखाते हुए ठहाके लगाने का साहस करती जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताओं का प्राणतत्त्व राजनीति और समाजनीति—दोनों के समान योग से निर्मित है। यही कारण है कि जितेन्द्र की कविताएँ इकहरी नहीं, बहुस्तरीय हैं। मनुष्य और मनुष्यता की चिन्ता करने के क्रम में यह कवि सत्ताकांक्षी राजनीति और वर्चस्ववादी सामाजिक संरचना की गहरी पड़ताल करता है। यह अकारण नहीं है कि वह बात करता है सपनों की, इच्छाओं की और चुप्पी के समाजशास्त्र की। पिछले तीन दशकों से हिन्दी कविता में निरन्तर सक्रिय, स्वीकृत और सम्मानित जितेन्द्र श्रीवास्तव गृहस्थ जीवन के सिद्ध और अद्वितीय कवि हैं। उनकी कविता से ही एक शब्द लेकर कहें तो पारिवारिक विन्यास के रास्ते जीवन की विविधता को प्रकट करने का कौशल उनकी कविताओं का जीवद्रव्य है। जितेन्द्र श्रीवास्तव की भाषा में अपूर्व और दुर्लभ आत्मीयता है। चिन्तन करते हुए, समस्याओं पर विचार करते हुए, दुःख बतियाते हुए, पत्नी से कुछ कहते हुए, छोटे भाई की शादी में माँ की चर्चा करते हुए, पिता को याद करते हुए, पुराने मित्र से मिलते हुए, बहुत दिनों के बाद अपनी पुश्तैनी खेती-बारी को निहारते हुए, आत्मबल को बटोरते हुए—आप कविताओं में विन्यस्त इन सभी रंगों से गुज़रते हुए पाएँगे कि जितेन्द्र की काव्य-भाषा में 'आत्मीयता' आश्चर्यजनक रूप से बनी रहती है। न कोई दिखावे की तल्खी, न नफ़रत का अतिरिक्त प्रदर्शन—फिर भी पक्षधरता में कोई विचलन नहीं। यह रक्त और विवेक में समाई हुई पक्षधरता है जिसे व्यक्त करने के लिए कवि को अलग से कोई उद्यम नहीं करना पड़ता। उम्मीद है उनका यह नया संग्रह हिन्दी कविता के पाठकों को एक नया आस्वाद देगा।
Maine Garha Hai Apna Purush
- Author Name:
Anupam Singh
- Book Type:

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Description:
अनुपम सिंह इक्कीसवीं सदी की सम्भावना पूर्ण स्त्री-कविता की प्रखर आवाज़ हैं। उनकी कविताओं में एक छोटी लड़की झाँकती है जो पूरे सजग भाव से अपने आसपास सब कुछ देख रही है लेकिन सम्भवत: चुप करा दी गई है। यह चुप्पी कविताओं में आकर खुलती है और पूरी बेबाकी के साथ अपने जीवन, परिवेश और व्यवस्था को तार-तार कर देती है।
अनुपम की कविताएँ गहरे दुख की कविताएँ हैं। दुख जो स्त्री-जीवन में शोकगीत बनकर बसा है; दुख, जिसे हर किसान, शोषित-पिछड़े वर्ग का व्यक्ति और स्त्रियाँ अपने जीवन का स्थायी भाव मान चुके हैं।
जीवन की त्रासदी के इस मानचित्र का एक बड़ा हिस्सा स्त्रियों और उनके अभिशप्त जीवन के नाम है। वे स्त्रियाँ जो कठिन श्रम करते हुए, अधिकारविहीन और निरानन्द जीवन जीती हैं और हर बार जिस परिवार, समाज में वे जीती आई हैं उससे बेदख़ल कर दी जाती हैं। अनुपम ने ऐसी कई नाइंसाफ़ियों को क़रीब से देखा और महसूस किया है। अपमान और अवहेलना के अनेक ऐसे अध्याय जिनको समाज ने सामान्यीकृत करके स्वीकार कर लिया, फिर चाहे त्वचा के रंग पर ताना देने का प्रचलन हो या परिवार में ही बच्चियों की पीठ पर हाथ फेरते पुरुषों की वासना। सब उस व्यवस्था में विन्यस्त है। ‘थोड़ा कहे को बहुत समझना’ के कौशल से इन कविताओं में एक परा-इतिहास की रचना हुई है। स्त्री-कविता की धार इसी से है कि उसने दूर देखने वाले बाइस्कोप का लेंस बदल दिया है। वह अपने आस-पास के छोट-बड़े आख्यानों से इतिहास को परा-इतिहास के रूप में पहचान रही है। एक समानांतर दुनिया।
अनुपम सिंह ने इन कविताओं में एक और वर्जित क्षेत्र में प्रवेश किया है। उन्होंने स्त्री देह के रहस्यों, उसकी इच्छा-आकांक्षा और यौनिकता के अनुभवों को बड़े करीने से काग़ज़ पर उतारा है। ऐसा करने के लिए भाषा को भी नए सिरे से साधना पड़ता है। अनुपम ने यह कठिन काम किया। उनकी भाषा लोक और शास्त्र के बीच आवाजाही करती हुई स्त्री-जीवन में यौन-अनुभवों के सुख और आनन्द को सहेजती है। इन कविताओं की सघन बिम्बात्मक प्रस्तुति उस अनुभव की उद्दामता को बचा ले जाती है। यहाँ दो स्त्रियों के प्रेम में होने के अनुभव को भी उसकी मुलायमियत और पूरे सम्मान के साथ रचा गया है। इस अर्थ में यौनिकता के सवाल स्त्री-अस्मिता की नए सिरे से शिनाख़्त करने की कोशिश है जहाँ मन और देह अलग नहीं हैं।
—रेखा सेठी
Main Kin Sapnon Ki Baat Karoon
- Author Name:
Shyam Sunder Tiwari
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- Description: Book
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