Ayodhya Mein Kalpurush
Author:
BodhisatwaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
कविता प्रकारांतर से हर दौर में सभ्यता-समीक्षा रही है। कवि बोधिसत्व की ये ताजा कविताएँ इस बेहद जटिल समय की महत्त्वपूर्ण गवाही रच रही हैं। कविता और समय के रिश्तों की यह पड़ताल, एक ऐसे दौर में जब अंधकार, हिंसा, उत्पीड़न, नियंत्रण, सन्देह, बेबसी और अनिश्चय से भरे संसार में मनुष्य होने के किसी सार-तत्त्व की खोज एक कठिन चुनौती है, रचनाकार की यह पेशकश बहुत मानीखेज है। यह नवाचार आज बहुत अर्थ रखता है। कवि ने मिथक कथाओं, जनश्रुतियों, और घोर वर्तमान के रिश्तों को जिस प्रकार से बुना है, उनमें स्थितियों और मनोभावों की आँच में सारे समय पिघलकर स्मृति के एक बीहड़ प्रदेश को रच रहे हैं। तीव्र गति से बीतते किसी तर्कातीत क्रम के भीतर दृश्य-खंड, दिशाएँ और गंतव्य सब यहाँ एक दूसरे में लिथड़े हुए हैं और समय बोध का एक विराट फलक उपस्थित हो रहा है। इस फलक पर व्यथाओं के अनचीह्ने इलाके और मनोभावों के नानाविध रूपाकार हमें उन सारे सन्दर्भों में ले जा रहे हैं जो दिखकर भी नहीं दिखते। चेतना के धुँधलाए से धरातलों पर उभरते हुए वहाँ बहुत से किरदार हैं, जो एक दूसरे में गड्डमड्ड हो एक ऐसे वृत्तान्त को रच रहे हैं जो अशान्त मन की विकलता से उपजा है; जो किसी डरावने सच को उकेर रहा है। महत्त्वपूर्ण यह कि इस नैरेटिव में कुछ भी सुनिश्चित, तार्किक, क्रमबद्ध और स्थाई नहीं, बल्कि यहाँ शक्ति-संरचनाओं की घेराबन्दी और उनमें जन्मता कोई दु:स्वप्न ही बचा रह गया है। अनर्गल शोर, तीव्रता, आकस्मिकताओं और छीना-झपटी से सना वह खौफनाक मंजर जिसमें अनसुने क्लेश, हाशिए पर छूट गए चीत्कारों और दबी हुई पीड़ाओं के कंपन हैं। एक कविता जो इस तरह समय के आर-पार जाती हुई सारी संहिताओं, हदबन्दी और जकड़नों को ध्वस्त करती है, गहन व्यथा के संकेतों को उकेर सकती है, वह प्रकारान्तर से सृजन के उस आदिम विश्वास को ही पाना चाहती है जो हमेशा से शक्ति-संरचनाओं का प्रतिपक्ष रहा है। यह वह जमीन है जहाँ हर रचनाकार को लौटना होता है—उस क्षत-विक्षत विश्वास की रक्षा की खातिर जो फिर भी कहीं सदा स्पन्दित होता रहता है। बोधिसत्व ने समकालीन कविता के बहुत से रूढ़ मुहावरों से बाहर निकलने की कोशिश की है। इन कविताओं का निश्चय ही भरपूर स्वागत किया जाएगा।</p>
<p>—विजय कुमार
ISBN: 9789360866013
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: "महाकाव्य विषयक लगभग सभी शास्त्र-सम्मत मानकों पर खरी उतरनेवाली, सोलह सर्गों में निबद्ध इस महनीय महाकाव्य-कृति ‘पं. रामप्रसाद बिस्मिल’, में महाकवि देव ने बिस्मिलजी के अग्निधर्मा व्यक्तित्व और उनके जुझारू, किंतु अत्यधिक संवेदनशील कृतित्व का सजीव चित्रण, अपनी पूरी क्षमता और प्राणवत्ता के साथ किया है। —प्रो. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ अंतरराष्ट्रीय कवि एवं साहित्यकार वस्तुतः देवजी प्रसिद्ध से पूर्व सिद्ध कवि और महाकाव्यकार हैं। ‘पं. रामप्रसाद बिस्मिल’ महाकाव्य उनकी आत्मा की अमंद राष्ट्र-ज्योति की अनर्घ प्रस्तुति है। —प्रो.भगवान शरण भारद्वाज प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद् क्रांति के अमर पुरोधा ‘पं. रामप्रसाद बिस्मिल’ का भौतिक स्मारक, मेरे लाख प्रयत्न करके भी सरकार तो नहीं बनवा सकी, किंतु प्रस्तुत महाकाव्य के रूप में उनका ‘साहित्यिक स्मारक’ आचार्य देवेंद्र देव ने मेरे जीवनकाल में ही रचकर मुझे दे दिया है। —डॉ. मदनलाल वर्मा ‘क्रांत’ कवि एवं साहित्यकार संपूर्ण महाकाव्य में भावों का अनुगमन करती भाषा, अलकनंदा की अजस्र जलधारा की भाँति मंथर गति से चित्त को बहाती चलती है। हिंदी-जगत् खड़े होकर इस महाकाव्य का करतल ध्वनि से स्वागत करेगा। —प्रो मंगला रानी विद्वान् शिक्षाविद्"
Ab Meri Bari
- Author Name:
Ankita Anand
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Description:
अब मेरी बारी की कविताएँ नए समय की उस नई स्त्री को सम्मुख लाती हैं जो प्रेम तो करना जानती है, लेकिन अपनी वैयक्तिक इयत्ता की क़ीमत पर नहीं। वह प्रेम में डूब जाना चाहती है, लेकिन इस आश्वस्ति के साथ कि प्रेम का दूसरा भागीदार भी उतना ही गहरे उतरे—दूसरे के साथ/न होना/ नहीं होता वफ़ादार होना/वफ़ादार होना होता है/
किसी के साथ/पूरी तरह होना!
प्रेम, पाठ, पहचान और परिवेश—इन श्रेणियों में विभक्त इस संग्रह की कविताएँ जीवन और समाज के अन्य हलक़ों को भी इतनी ही आत्म सजगता के साथ देखती हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि ये कविताएँ अपनी भाषा भी अलग ढंग से गढ़ती हैं। निहायत और ग़ैर-पारम्परिक बिम्बों और प्रतीकों का उपयोग करती हुई ये कविताएँ अपनी एक नई भाषा ईजाद करती हैं जिसके ऊपर काव्यास्वाद की स्वीकृत
पम्परा का भार लगभग नहीं है।
पुरुषों के घेरों के बीच अपने पूरे आप को लेकर खड़ी हुई औरतों की तरफ़ से कहा गया है—हम अट्टहास करें, भयावह दिखें, ऑक्टोपस बनें/शरीर से छोड़ें स्याही की पिचकारियाँ/उन पर साधे/जो संग होली खेलने को व्याकुल थे।
Bagh Upaakhyaan
- Author Name:
Gayatribala Panda
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Description:
बाघ को नहीं मालूम/इनसानों की दुनिया में/उसे लेकर कितनी घटनाएँ घटित होती हैं। कितनी कहानियाँ, कितनी किंवदंतियाँ/कितनी कल्पनाएँ...।
‘बाघ उपाख्यान’ शीर्षक के तहत ये पचपन कविताएँ सिर्फ़ बाघ की नहीं मनुष्यों के भीतर और उसके समाज में मौजूद बाघ-पन की कविताएँ हैं; उस हिंसा और अमानवीयता के अन्वेषण की कविताएँ जिनके सामने सचमुच के बाघ की प्राकृतिक भयावहता निरीह मालूम होने लगती है। उसे यह भी पता नहीं होता कि मनुष्य का समाज उसे कितने अच्छे ढंग से जान चुका है, और अपनी पूरी ताकत के बावजूद वह इतना कमज़ोर हो चला है कि अब मनुष्य ही उसके जीवन का संरक्षण चाहने लगा है। लुप्त होते उस जीव के लिए मनुष्य-समाज नारे लगा रहा है; योजनाएँ बना रहा है।
लेकिन उस बाघ का क्या, जो हमारे भीतर है जिसके पंजों के निशान हर जगह हैं, हर जगह जिसके ख़ौफ़ का अँधेरा पसरा हुआ है! वह बाघ जो हमारे पापों, दुष्कर्मों और छलों से बना है; हमारी महत्त्वाकांक्षाओं से, लालच से, लिप्सा और अबुझ वासना से, वह जो हमारे आसपास हर कहीं, हर समय उपस्थित है।
स्वयं रचनाकार के शब्दों में, ‘बाघ का बाघ-भाव और मनुष्य का बाघ-भाव—ये दोनों मुझे आलोड़ित, आन्दोलित...और आहत करते रहे लगातार।’ इसी मनस्थिति में उन्होंने बाघ को जानना शुरू किया जो उन्हें हर कहीं दिखा—मंचों पर, मंत्रणा-कक्षों में, सड़कों पर और घरों में। बाघ को पहचानने की इसी प्रक्रिया में ये कविताएँ जन्मीं हैं जो हमें अपने आसपास की दुनिया को एक नई और चकित निगाह से देखने को प्रेरित करती हैं।
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