Sulga Hua Raag
About the book
हिन्दी कविता का अधिकांश इन दिनों जिस प्रकार की नगरीय मध्यवर्गीयता से आक्रान्त होकर आत्मदया, हकलाहट, अन्तहीन रुदन और ऐसे ही नाना प्रपंचों को निचुड़े हुए मुहावरों में प्रकट करता दिखता है, उसके बरक्स ‘सुलगा हुआ राग’ में मनोज मेहता की कविताएँ सामर्थ्य भरे विकल्प की तरह आई हैं। इस संग्रह की कविताओं में समकालीन भारतीय समय और विडम्बनाओं से भरे उसके व्यापक यथार्थ की गहरी समझ है और उसी के साथ है उस यथार्थ की संश्लिष्ट संरचना से प्रसंगों, वस्तुओं, पात्रों और उनकी अन्तर्क्रियाओं को अचूक कौशल के साथ उठाकर अपना काव्यलोक रचने की अनूठी सृजनशीलता जो विस्मयकारी ढंग से कविता के सामान्य चलनवाले अतिपरिचित इलाक़ों के पार जाकर हमारे लिए गाँव-क़स्बों के मामूली मनुष्यों की एक विशाल दुनिया खोलती है। यह वह दुनिया है जहाँ ‘ढुलमुल गँवारू झोपड़ों में’ और ‘ढोल, मादल, बाँसुरी के सुरों में हमारा देश बसता है’। मनोज मेहता के काव्य-सामर्थ्य का एक ग़ौरतलब पहलू यह भी है कि लोकजीवन से उनकी संलग्नता उन्हें अपनी भाषा के अन्य बहुतेरे कवियों की तरह अतिशय रोमानीपन की ओर नहीं धकेलती। ‘सुलगा हुआ राग’ में जहाँ मनोज उपलब्ध जीवन को उत्सवित करते हैं, वहाँ भी उनका काव्य विवेक अपनी वस्तुपरकता को खोकर असन्तुलित नहीं होता और न ही वह अतिरिक्त ऐश्वर्य अर्जित करने के लिए शिल्प की कलावादी तिकड़मों का सहारा लेता है। यह एक ऐसा काव्य-विवेक है जो आवयविक अनुभवों को लेकर बेहद सादगी और धीरज के साथ अपने आशयों को स्पष्ट करता है और भीषण संकटों के मौजूदा दौर में जीवन-प्रसंगों की मानवीय आन्तरिकता को भाषा के आईने में कुछ यों ले आता है कि वह बार-बार अपनी अनोखी आकस्मिकता के नएपन से हमें एक दुर्लभ सौन्दर्यबोध की ज़मीन पर नए आविष्कार की तरह बाँध लेती है—मानो हमारे भीतर पहले कुतूहल और फिर सरोकारों का ख़ूब समृद्ध ताना-बाना निर्मित करती हुई। ‘सुलगा हुआ राग’ की अन्तर्वस्तु में सहज और आयासहीन जनोन्मुख प्रतिबद्धता है, आख्यान है और निरन्तर गूँजती एक लय है जिसमें क्रियाओं और ध्वनियों की आवाजाही और हलचलें शामिल हैं—पर इस सबके बावजूद कुछ भी स्फीत नहीं होता। यहाँ शामिल कविताओं में मनोज मेहता के अनुभव प्रान्तरों की ऐसी अन्तर्यात्रा के साक्ष्य हैं जिनमें हमारे सामूहिक मन की बेचैन दीप्तियाँ तो हैं ही, उसकी अपराजेय जिजीविषा का गान भी है। ‘सुलगा हुआ राग’ के एक से दूसरे छोर तक मनोज मेहता ने चाहे जितने भी स्वरों का संयोजन किया हो, यहाँ न तो कहीं किसी विवादी स्वर का खलल है और न ही कोई मुद्रा दोष। ‘सुलगा हुआ राग’ में यह सब सम्भव हो पाया है तो इसलिए कि इसकी निर्मिति में एक विनम्र किन्तु दृढ़ प्राणवत्ता बसी है। —पंकज सिंह
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About the Book
हिन्दी कविता का अधिकांश इन दिनों जिस प्रकार की नगरीय मध्यवर्गीयता से आक्रान्त होकर आत्मदया, हकलाहट, अन्तहीन रुदन और ऐसे ही नाना प्रपंचों को निचुड़े हुए मुहावरों में प्रकट करता दिखता है, उसके बरक्स ‘सुलगा हुआ राग’ में मनोज मेहता की कविताएँ सामर्थ्य भरे विकल्प की तरह आई हैं। इस संग्रह की कविताओं में समकालीन भारतीय समय और विडम्बनाओं से भरे उसके व्यापक यथार्थ की गहरी समझ है और उसी के साथ है उस यथार्थ की संश्लिष्ट संरचना से प्रसंगों, वस्तुओं, पात्रों और उनकी अन्तर्क्रियाओं को अचूक कौशल के साथ उठाकर अपना काव्यलोक रचने की अनूठी सृजनशीलता जो विस्मयकारी ढंग से कविता के सामान्य चलनवाले अतिपरिचित इलाक़ों के पार जाकर हमारे लिए गाँव-क़स्बों के मामूली मनुष्यों की एक विशाल दुनिया खोलती है। यह वह दुनिया है जहाँ ‘ढुलमुल गँवारू झोपड़ों में’ और ‘ढोल, मादल, बाँसुरी के सुरों में हमारा देश बसता है’।
मनोज मेहता के काव्य-सामर्थ्य का एक ग़ौरतलब पहलू यह भी है कि लोकजीवन से उनकी संलग्नता उन्हें अपनी भाषा के अन्य बहुतेरे कवियों की तरह अतिशय रोमानीपन की ओर नहीं धकेलती। ‘सुलगा हुआ राग’ में जहाँ मनोज उपलब्ध जीवन को उत्सवित करते हैं, वहाँ भी उनका काव्य विवेक अपनी वस्तुपरकता को खोकर असन्तुलित नहीं होता और न ही वह अतिरिक्त ऐश्वर्य अर्जित करने के लिए शिल्प की कलावादी तिकड़मों का सहारा लेता है। यह एक ऐसा काव्य-विवेक है जो आवयविक अनुभवों को लेकर बेहद सादगी और धीरज के साथ अपने आशयों को स्पष्ट करता है और भीषण संकटों के मौजूदा दौर में जीवन-प्रसंगों की मानवीय आन्तरिकता को भाषा के आईने में कुछ यों ले आता है कि वह बार-बार अपनी अनोखी आकस्मिकता के नएपन से हमें एक दुर्लभ सौन्दर्यबोध की ज़मीन पर नए आविष्कार की तरह बाँध लेती है—मानो हमारे भीतर पहले कुतूहल और फिर सरोकारों का ख़ूब समृद्ध ताना-बाना निर्मित करती हुई।
‘सुलगा हुआ राग’ की अन्तर्वस्तु में सहज और आयासहीन जनोन्मुख प्रतिबद्धता है, आख्यान है और निरन्तर गूँजती एक लय है जिसमें क्रियाओं और ध्वनियों की आवाजाही और हलचलें शामिल हैं—पर इस सबके बावजूद कुछ भी स्फीत नहीं होता। यहाँ शामिल कविताओं में मनोज मेहता के अनुभव प्रान्तरों की ऐसी अन्तर्यात्रा के साक्ष्य हैं जिनमें हमारे सामूहिक मन की बेचैन दीप्तियाँ तो हैं ही, उसकी अपराजेय जिजीविषा का गान भी है।
‘सुलगा हुआ राग’ के एक से दूसरे छोर तक मनोज मेहता ने चाहे जितने भी स्वरों का संयोजन किया हो, यहाँ न तो कहीं किसी विवादी स्वर का खलल है और न ही कोई मुद्रा दोष।
‘सुलगा हुआ राग’ में यह सब सम्भव हो पाया है तो इसलिए कि इसकी निर्मिति में एक विनम्र किन्तु दृढ़ प्राणवत्ता बसी है।
—पंकज सिंह
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2004
- Weight
- 302 grams
- ISBN-13
- 9788171198672
- Pages
- 119
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
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