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प्रस्तुत पुस्तक ‘झरना’ में प्रेम के विविध अनुभवों का जीवन्त वर्णन है। ‘प्रेम’ से उत्पन्न निराशा, बेवफाई की वेदना, वियोग की तड़प आदि के अलावा ‘झरना’ में लोक मंगल की भावना और दीन-दुखी और दलितों के दुःख के अन्त में कामना भी है जो प्रेम को उदार बनाती है। यह सूफियों अथवा विवेकानन्द की प्रेम सम्बन्धी अवधारणाओं की भाँति कविताओं के देश का विस्तार भी है।
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प्रस्तुत पुस्तक ‘झरना’ में प्रेम के विविध अनुभवों का जीवन्त वर्णन है। ‘प्रेम’ से उत्पन्न निराशा, बेवफाई की वेदना, वियोग की तड़प आदि के अलावा ‘झरना’ में लोक मंगल की भावना और दीन-दुखी और दलितों के दुःख के अन्त में कामना भी है जो प्रेम को उदार बनाती है। यह सूफियों अथवा विवेकानन्द की प्रेम सम्बन्धी अवधारणाओं की भाँति कविताओं के देश का विस्तार भी है।
Book Details
-
ISBN9788197509698
-
Pages79
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Vishnu Khare
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- Description: यह कहकर कि विष्णु खरे हिन्दी में बिलकुल अलग ढंग की कविता लिखते थे (उनकी ख़ास अपने रंग की कविता की बात है यह, उन कुछेक कविताओं की नहीं जो उनकी उतनी ख़ास नहीं हैं), हम ज़रूर एक बड़ी बात कहते हैं। पर उनका अपना रंग क्या है, यह बताए बग़ैर बात अधूरी है। पहली ही नज़र में उन्हें अलग दिखा देनेवाली चीज़ है उनकी कविता का बाना; ऐसा बाना जिसमें से 'कवितापन’ के निशान मानो चुन-चुनकर हटा दिए गए हैं—भावनात्मकता, लयात्मकता, आवेग और बहाव, लगाव और आत्मीयता, सहानुभूति और करुणा तक...। पहली नज़र में वे कविता होने का दावा करनेवाली गद्यात्मक कहानियाँ मालूम होती हैं। उनका कहानीपन भी वर्णनात्मक लगता है, कथात्मक नहीं, मानो जान-बूझकर लयहीन, गद्यात्मक, मनमाने तौर पर लम्बी या छोटी पंक्तियों में कुछ चीज़ों के बारीक वर्णन में घटना या पात्र जोड़ दिए गए हैं; आप कविता से जुड़ी अपनी अपेक्षाएँ, रुचियाँ, आदतें लेकर उनके पास जाते हैं और निराश होते हैं; आप कहानी की तरह उसे पढ़ना चाहते हैं तो पाते हैं कि जिन तत्त्वों (सूक्ष्म निरीक्षण, मानसिक या घटनागत मोड़, आश्चर्य इत्यादि) को आप कहानी पढ़ने के बाद खोजते या निकालते, वे ढाँचे की तरह—मांस-मज्जा-मोटापे से रहित—आपके सामने हैं, पूरी कहानी नहीं। कविता के रूप में आप जिस ताप, आवेग और शब्दों की मितव्ययिता चाहते हैं, वह नहीं है। कविता के रूप में उक्त तत्त्वों को जिन आवरण-आच्छादनों के साथ चाहते हैं, वे आवरण-आच्छादन भी नहीं हैं। कहानी की दृष्टि से शब्दों की कंजूसी, कविता की दृष्टि से शब्दों की इफ़रात। ‘अकेला आदमी’, ‘कोशिश’ और ‘दोस्त’ जैसी कविताएँ आपको तब भी अपनी संस्कारगत काव्य-रुचियों के क़रीबतर जान पड़ती हैं। इससे बरबस आप विष्णु खरे की दूसरी कविताओं को समझने की, उनमें ‘कवितापन’ खोजने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी यह कोशिश लगातार चलती है; होते-होते आप कवि के मुरीद भी हो जा सकते हैं। समय इन कविताओं में एक तरह से सर्वव्याप्त आयाम है जिसमें देश या स्थान भी समाहित है। 'टेबिल’ में वह चार पीढ़ियों का क़िस्सा बनता है। ‘हँसी’ में वह हमारा अपना ज़माना है, जब पुरस्कृत बालक भूखा, पैदल, थका, शील्डों के बोझ से दबा घर पहुँचता है, जहाँ ख़ुद ही उसे ताला खोलना है; समारोह में विशेष स्वागत अतिथियों का है, सड़क पर पुलिस की घुड़क है, दूसरे दिन स्कूल में क़तार में वह निरीह इकाई मात्र है। एक संवेदनहीन, मूल्यहीन, क्रूर समाज का समय। 'गर्मियों की शाम’ में वह हमारी यौन-नैतिकता, अच्छाई, किशोर-मन की कसमसाहट का समय है। ‘स्वीकार’ और ‘डरो’ में, ‘दूरबीन’ और ‘वापस’ में और ‘कार्यकर्ता’ और ‘कोमल’ में हमारे समय का समाज-संगठन, व्यक्ति-सत्ता, व्यंग्य, तल्ख, विडम्बना, अक्सर दुरदुराए जाते आम इनसान संकेतित हैं। समय पर यही आँख ‘मुक़ाबला’ में प्रागैतिहासि फ़ैंटेसी को समेट लाती है। बचपन, कैशोर्य, जवानी, बुढ़ापा; सफलता, रोग, दैन्य, छोटे शहरों की उदासी और उदास आकर्षण, बड़े शहरों का दृश्य (‘वापस’) उनमें तरह-तरह से आता है। समय के लिए विष्णु खरे काल या महाकाल जैसे प्रत्यय नहीं अपनाते, और इस नुक्ते में उनकी काव्य-चेतना के दो रुझान स्पष्ट हैं। ‘समय’ शब्द हमारे समय में अंग्रेज़ी के ‘टाइम’ का प्रत्ययान्तर है, और प्रचलित आधुनिकतावाद में वह प्रगति, इतिहास, उत्तरोत्तर आगे बढ़नेवाला, रैखिक विकास का अर्थ लिए हुए है; व्यतीत हो जानेवाला समय है, ‘कालो न यात:’ वाला, आवर्तित, चक्राकार काल नहीं। लेकिन विष्णु खरे इसको ‘अर्थ’ और ‘अव्यक्त’ जैसी कविताओं में ‘एक प्रवहमान अनन्त लीला’ से जोड़ते हैं। आधुनिकता के विश्लेषणात्मक, वैज्ञानिक, विषयी-निरपेक्ष विषय-केन्द्रित दृष्टि के उपकरणों का उपयोग क्या वे अपनी मूल भारतीय दार्शनिक अवधारणाओं की पड़ताल करने में कर रहे हैं? सर्वातीत, लीला, स्थावर-जंगम जैसे शब्द उनके यहाँ बार-बार हैं, और केवल शब्द ही नहीं, उनके अर्थ को स्वीकार करनेवाली चेतना भी। यह चेतना—शक होता है कि—सचेत रूप से अपनाई हुई नहीं है, बल्कि उनमें ख़ुद-ब-ख़ुद है, इस देश-प्रदेश में पलने, बढ़ने के कारण। उसकी पुष्टि तरह-तरह के अध्ययनों से, हालाँकि भारतीय अवधारणा से कुछ भिन्न रूपोंवाले स्रोतों से होती है—दॉन हुआन, बोर्खेस के हवाले द्रष्टव्य हैं। तर्क से चलकर अतर्क्य तक पहुँचना इसीलिए सम्भव है। क्षणवाद को इस तरह वे विजित करते दीखते हैं। अस्तित्ववादी अकेलेपन और संत्रास की धारणाओं का आतंक इसीलिए उन पर नहीं दीखता। अन्तत: निष्कृति का द्वार उन्हें सहज ही पता है।
Harf Dar Harf
- Author Name:
Kailash Manhar
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- Description: तुम्हारा खून तुम्हीं को पिलाया जाता है/तुम्हारा गोश्त तुम्हीं को खिलाया जाता है॥/काट कर टैक्स खज़ाने को भरा जाता है।/और फिर उसको ही विकास कहा जाता है॥/तुम्हारी खेतियाँ सरकार की अमानत हैं।/ तुम्हारे हाथों की मेहनत यहाँ जमानत हैं॥ /तुम्हारे पाँवों के सफर की कहाँ मंजि़ल है। /तुम्हारा दर्द सुने किसके पास वह दिल है॥ /तुम्हारी वोट से ज़्यादा कोई औकात नहीं। /वायदों से बड़ी मिलती कोई सौगात नहीं॥ /हरेक तरह की शहादत तुम्हीं को देनी है। /और बदले में बस फाकापरस्ती लेनी है॥/तुम भी हो मुल्क के बासिंदे तो उन्हें क्या?/तुम्हारे गम की लीडरों को भला क्या चिन्ता?/ये सियासत ही है आपस में तुम्हें लड़वाये।/ तुम कमाओ तो उसे भी ये सियासत खाये॥/ये जो जम्हूरियत की झूठी बातें करते हैं।/तुम ही मरते हो फसादी ये कहाँ मरते हैं॥/तुम अगर बात को समझो तो कोई बात बने।/तुम अगर होश में आओ तो कोई बात बने॥/ उठो इन्साफ की आवाज़ को बुलन्द करो।/नफरतों से भरे माहौल को अब बंद करो॥/उठो कि इंकलाब! जि़ंदाबाद बोलो तुम।/उठो कि फितरतों की सारी पोल खोलो तुम॥
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