MUJHE UDNA HAI
Author:
Arjun Singh NegiPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 246
₹
300
Available
Collection of Poems
ISBN: 9789388799225
Pages: 128
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
पेट भरने के प्रबन्ध के बाद जो समस्या सामने आती है, वह है—सम्भोग की। यह समस्या उदित होती है किशोरावस्था में, और यौवन से प्रौढ़ावस्था के ढल जाने तक चलती है। इस समस्या के समाधान के लिए क्या किया जाए? जब तक सम्पन्नता एवं स्वस्थ मनोवृत्ति निर्मित नहीं होती है और सबका एक निवास-स्थल और पति-पत्नी के अलग नीड़ का प्रबन्ध नहीं होता है तब तक सरकार के नियंत्रण में स्त्री-पुरुषों की ऐसी संस्थाओं की स्थापना करना अनुचित न माना जाए, जहाँ प्रेम-प्रधान मनोविनोद एवं कलात्मक वातावरण रहे, ताकि सम्भोग की मूल प्रवृत्ति का मार्गान्तरीकरण हो सके। तब भी बलात्कार की घटनाएँ होती हों तो फिर दंड-विधान प्रभावी हो सकता है अन्यथा हर क्षण, हर एकान्त स्थली और हर व्यक्ति बलात्कार की सृष्टि के साधक हो सकते हैं। 'अहल्या’ में यही दिखाया गया है। स्त्री-पुरुष के मिलन की घटनाओं को राजकुमार राम की तरह अधिक तूल न देकर सहानुभूति से जाँचने की आवश्यकता है। किसी भी कारण सर्वसम्पन्न इन्द्र और कुलीन अहल्या का संयोग-वृत्त उन्हें अक्षम्य शाप-दंड की परिधि के अन्दर नहीं ले जाता है। राम के आदेश पर शाप-दंड दाता गौतम सबको क्षमा करता है। ठीक है, थाली में रखे भोजन को खाने से जूठा हो जाने की तरह नारी जूठी नहीं हो जाती है, वह केवल सम्भोग-सामग्री नहीं, पूज्य माँ है। राम अपने मुँह से 'माँ! उठो’, कहकर ही सबकी दृष्टि में उसका उद्धार करते हैं और गौतम उसे पाकर अपने को धन्य समझता है। अहल्या, जो कि इस काव्य की नायिका है, उसके माध्यम से नारी के पुरुष-सम्पर्क से उद्भूत समस्याओं का आकलन करना तथा उनका समाधान ढूँढ़कर उसे एक दिशा दिखाना मेरे इस काव्य का प्रमुख उद्देश्य है। काव्य-कर्ता को वस्तु की प्रबन्धात्मकता के औचित्य के अन्दर समाहित करने में काव्यशास्त्र का सहारा लेना पड़ता है। फलत: वस्तुगत सत्य और साहित्यिक सत्य में कुछ भिन्नता आ जाती है, अत: विद्वज्जन को मेरे काव्य में भिन्नता दिखाई देगी, हालाँकि मैंने अपनी ओर से विभिन्न स्रोतों में समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया है।
—'प्रस्तावना’ से
Lamhoon Ki Oot Se
- Author Name:
Richa Dixit
- Book Type:

- Description: "Lamhon ki Oot se" means expressions of feelings that have surpassed, felt hard and deep at heart, in the various moments (lamhe) in life by everyone or the other being…… It's a Hindi poetry and Shayari collection; the verses are emotions of Melancholy, love, sadness, life etc.; the poetry is in Hindi n coupled with some lovely words of Urdu, the verses symbolise pain, harmony, love, broken heart, and all such moments which some of the other time have been a part of everyone’s life or feelings that have come across every common heart. While reading, one feels relativity to some of the other feelings of theirs. People loving poetry should not miss this one. Richa Dixit is a Hindi poet who, although coming up with her first book, already has a good reader base on her Facebook pages, “writing is meditating” and “Lamhon Ki Oot Se”, from the last three years. However, she works in HR but also has a passion for poetry. Scratching some rough lines in childhood, to passionate poetry and shayri writer …. this is what made this “Lamhon ki Oot Se” get its presence. For her, it’s a small giving to the poetry lovers' world.
Ayodhya Mein Kalpurush
- Author Name:
Bodhisatwa
- Book Type:

-
Description:
कविता प्रकारांतर से हर दौर में सभ्यता-समीक्षा रही है। कवि बोधिसत्व की ये ताजा कविताएँ इस बेहद जटिल समय की महत्त्वपूर्ण गवाही रच रही हैं। कविता और समय के रिश्तों की यह पड़ताल, एक ऐसे दौर में जब अंधकार, हिंसा, उत्पीड़न, नियंत्रण, सन्देह, बेबसी और अनिश्चय से भरे संसार में मनुष्य होने के किसी सार-तत्त्व की खोज एक कठिन चुनौती है, रचनाकार की यह पेशकश बहुत मानीखेज है। यह नवाचार आज बहुत अर्थ रखता है। कवि ने मिथक कथाओं, जनश्रुतियों, और घोर वर्तमान के रिश्तों को जिस प्रकार से बुना है, उनमें स्थितियों और मनोभावों की आँच में सारे समय पिघलकर स्मृति के एक बीहड़ प्रदेश को रच रहे हैं। तीव्र गति से बीतते किसी तर्कातीत क्रम के भीतर दृश्य-खंड, दिशाएँ और गंतव्य सब यहाँ एक दूसरे में लिथड़े हुए हैं और समय बोध का एक विराट फलक उपस्थित हो रहा है। इस फलक पर व्यथाओं के अनचीह्ने इलाके और मनोभावों के नानाविध रूपाकार हमें उन सारे सन्दर्भों में ले जा रहे हैं जो दिखकर भी नहीं दिखते। चेतना के धुँधलाए से धरातलों पर उभरते हुए वहाँ बहुत से किरदार हैं, जो एक दूसरे में गड्डमड्ड हो एक ऐसे वृत्तान्त को रच रहे हैं जो अशान्त मन की विकलता से उपजा है; जो किसी डरावने सच को उकेर रहा है। महत्त्वपूर्ण यह कि इस नैरेटिव में कुछ भी सुनिश्चित, तार्किक, क्रमबद्ध और स्थाई नहीं, बल्कि यहाँ शक्ति-संरचनाओं की घेराबन्दी और उनमें जन्मता कोई दु:स्वप्न ही बचा रह गया है। अनर्गल शोर, तीव्रता, आकस्मिकताओं और छीना-झपटी से सना वह खौफनाक मंजर जिसमें अनसुने क्लेश, हाशिए पर छूट गए चीत्कारों और दबी हुई पीड़ाओं के कंपन हैं। एक कविता जो इस तरह समय के आर-पार जाती हुई सारी संहिताओं, हदबन्दी और जकड़नों को ध्वस्त करती है, गहन व्यथा के संकेतों को उकेर सकती है, वह प्रकारान्तर से सृजन के उस आदिम विश्वास को ही पाना चाहती है जो हमेशा से शक्ति-संरचनाओं का प्रतिपक्ष रहा है। यह वह जमीन है जहाँ हर रचनाकार को लौटना होता है—उस क्षत-विक्षत विश्वास की रक्षा की खातिर जो फिर भी कहीं सदा स्पन्दित होता रहता है। बोधिसत्व ने समकालीन कविता के बहुत से रूढ़ मुहावरों से बाहर निकलने की कोशिश की है। इन कविताओं का निश्चय ही भरपूर स्वागत किया जाएगा।
—विजय कुमार
Pani Ka Patthar
- Author Name:
Mangalesh Dabral
- Book Type:

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Description:
पहाड़, पत्थर और पानी की स्मृतियों को टटोलतीं और शहरी जीवन के मैदानी बीहड़ में मनुष्यता के चिन्हों को अंकित करतीं मंगलेश डबराल की ये कविताएँ उनके कवि-मन की श्रमशील रचनात्मकता की साक्षी हैं।
यह संग्रह उनके जाने के बाद संकलित किया गया है। जो कविताएँ इसमें शामिल हैं उनमें कई कविताएँ ऐसी हैं जिन पर वे अभी काम कर रहे थे, और कुछ शायद ऐसी जो पहली कौंध में अभी उतारना शुरू ही हुई थीं, जिन्हें वे अभी और विस्तार देते, लेकिन अपने मौजूदा स्वरूप में भी उन्हें सम्पूर्ण कहा जा सकता है।
भाषा के संयमित व्यवहार और विचार के पक्ष में अपनी जिस दृढ़ता के लिए उनकी कविताओं को जाना जाता है, उनका निर्वाह करते हुए ये कविताएँ उनकी राजनीतिक-सामाजिक पक्षधरता को भी रेखांकित करती हैं।
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यहाँ संग्रहित कविताओं-कवितांशों में मंगलेश जी की अपनी पहचान रहीं तमाम विशेषताओं के चिह्न मौजूद हैं, साथ ही ये संग्रह उनकी रचना-प्रक्रिया का भी कुछ पता हमें देता हैं। उनके होने न होने के अन्तराल में उनकी अनुपस्थिति को झुठलाती और उनके अवदान का साक्ष्य देती इन कविताओं की गूँज देर तक बनी रहती है।
Ek Aur Madhushala
- Author Name:
Dr. Suresh Prasad
- Book Type:

- Description: जिस शराब के प्रबल पक्षपाती विश्व के विभिन्न साहित्यों में फिट्जेरॉल्ड,उमर खैयाम और डॉ. हरिवंश राय बच्चन जैसे लब्धप्रतिष्ठों ने उसे साहित्यिक मान्यता प्रदान की,वहाँ प्रथमतः डॉ. सुरेश प्रसाद ने मदिरा के प्रतिपक्ष में विज्ञानपूर्ण विचार देकर लोगों को सबल ढंग से इस दुर्गुण से दूर रहने की सलाह दी है। डॉ. प्रसाद ने मदिरा के विरुद्ध काव्यात्मक आवाज उठाकर मद्यपों का मनोबल बहुत हद तक तोड़ा है। मद्यपान से छुटकारा दिलाने का यह प्रयास सराहनीय है। मदिरा पर आज तक मेरी दृष्टि से इस तरह का कोई दूसरा काव्य नहीं गुजरा है। यह कृति स्वाभाविक रूप से लोकप्रिय और चर्चित होगी तथा हिंदी-साहित्य-जगत् एवं लोक-मानस दोनों इसका आदर करेंगे, निःसंदेह ऐसा विश्वास है। डॉ. प्रसाद ने मदिरा की हर अदा को कातिल करार देते हुए प्रतिक्रिया-स्वरूप उस पर कातिलाना हमला बोल दिया है; उसके सारे काले चिट्ठे खोलकर रख दिए हैं दुनिया की आँखों के सामने। ‘मदपायी’ तथा ‘मदिरा-विक्रेता’ पर भी विनम्रता जताते हुए उन्हें मदिरा का साथ देने से मना किया है औचित्य बताते हुए।
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