Nadi Ghar
Author:
Krishna KishorePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 236
₹
295
Available
यह जीवन के साथ एक सहयात्री की तरह चलती जीवन जैसी ही लम्बी कविता है। किसी बड़ी भीतरी या बाहरी घटना-दुर्घटना की प्रतिक्रिया से उपजी हुई नहीं, बल्कि जीवन के रोजमर्रा के साथ बतियाती हुई कविता।</p>
<p>लेकिन जीवन से आक्रांत कविता नहीं, न ही उसके हर ओर फैले विराट वैभव से भयभीत। एक धीमी बतकही की तरह यह अपनी आँख से अपने आसपास के संसार को, व्यक्ति को, उसके इर्द-गिर्द बुने गुए रिश्तों के संजाल को, भीड़ को, भीड़ के बीच भटकती व्यर्थता को देखती हुई, और इन सबके बारे में कुछ कहती-सुझाती-बताती हुई।</p>
<p>'प्रार्थनारत ज़िन्दगी मुझे क्रोधित नहीं करती। क्योंकि मैं जानता हूँ। ये मजबूर लोग जो कुछ माँग रहे हैं। बस वही इन्हें नहीं मिलना है।' कवि इस कविता में जैसे संसार के बीच अपने होने का ऋण चुकता करते हुए अनेक चीजों की तरफ इशारा करता है। प्रकृति में निहित आखिरी उम्मीद को भी हमारे ध्यान में लाता है और हमारे समाज के भीतर की नकारात्मकता को भी जिसके चलते कई बार हमारा पल-पल व्यथा का बिम्ब होकर रह जाता है।</p>
<p>कवि इस कविता के बारे में अपनी बात रखते हुए कहता है कि नदी घर एक ऐसी यात्रा पर निकलने का प्रयास है जो इस दुनिया को उन ताकतों से मुक्ति दे जिनके चलते घर कारागार हो गए हैं और हमारा अपना वजूद एक बोझ
ISBN: 9789390971718
Pages: 101
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Koyla Aur Kavitwa
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description: ला और कवित्व' में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की सन् साठ के बाद रची गई ऐसी कविताएँ हैं जो अपने आधुनिकता-बोध में पारदर्शी तो हैं ही, कला-विन्यास का श्रेष्ठ उदाहरण भी हैं। इस संग्रह में संकलित है एक विदुषी को लिखा गया कवि का गीत-पत्र–'कला फलाशा से युक्त होती है या वियुक्त और कोयले का उत्पादन बढ़ाने को यदि गीत लिखे जाएँ तो कैसा रहे?' यह गीत-पत्र मात्र पत्र नहीं, कवि के गहन चिन्तन का दस्तावेज़ भी है। और यह चिन्तन-ज़मीन अपनी सम्पूर्णता में इस संग्रह को विशिष्ट भी बनाती है, हमें अपने वर्तमान से जोड़ती भी है। 'कोयला और कवित्व' में संकलित कविताएँ अपने आकार में बहुत बड़ी न होकर भी अपनी प्रकृति में बहुत बड़ी हैं। एक बड़े कालखंड से जुड़ी ये कविताएँ परम्परा और अन्तर्विरोधों से गुज़रते हुए जिस संवाद का निर्वाह करती हैं, वह बहुत बड़ी सृजनात्मकता का प्रतीक है। हमारे मन और मस्तिष्क को उद्वेलित करनेवाली ये कविताएँ संग्रहणीय भी हैं, और अविस्मरणीय भ
Kachhar-Katha
- Author Name:
Harish Chandra Pandey
- Book Type:

-
Description:
कुछ ही कवि चेतना की चोट से अब तक की परिभाषाओं को धीरे-धीरे ढहाकर अपनी कविता का परिसर निर्मित कर पाते हैं। हिन्दी के हरीश चन्द्र पाण्डे उनमें से एक हैं। उनमें सायास लिखने की न तो बहुत उठाबैठक है, न अनायास लिखने का क्रीड़ा-विलास और निष्प्रयोजनीयता। बल्कि उनकी कविता की चौहद्दी से बाहर भी संवेदना की बहुत सारी हरी-हरी दूब मुलमुलाकर झाँकती मिलती है।
‘गले को ज्योति मिलना’ से लगायत ‘फूल को खिलते हुए सुनना’ जैसे तमाम प्रयोग हरीश चन्द्र पाण्डे के काव्य-संसार में पारम्परिक इन्द्रियबोध को धता बताकर सर्वथा नई तरह की अनुभूति का अहसास कराने में सक्षम हैं। आभासी दृश्यों के घटाटोप को भेदती हुई उनकी कविताएँ उन अनगिन आवाज़ों को ठहरकर सुनने का प्रस्ताव करती हैं जिनमें एतराज़, चीत्कार, हँसी और ललकार के अनेक कंठ ध्वनित होते हैं और ‘हर आवाज़ चाहती है कि उसे ग़ौर से सुना जाए’। क्योंकि हमारी दुनिया ‘अँधेरे के टापू’ में तब्दील होती जा रही है और भयावह अँधेरे को बेकाबू हाथी के अक्स में ढालती जा रही है।
कोई देखे या न देखे लेकिन एक ‘सूर गायक’ इसे यहाँ अपनी प्रज्ञाचक्षु से देख भी रहा है और उसे अपनी आवाज़ भी दे रहा है—एक ऐसी आवाज़ जिससे लोकगीत कहते हैं कि हमें अपना कंठ दें दो और निर्गुण कहते हैं कि हमें। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ ऐसी ही आवाज़ों की सम्पुंज हैं जो बादल छँटने की आवाज़ भी सुन सकती हैं जो एकदम बेआवाज़ हैं। यहाँ हमारे समय की वे बर्बरताएँ भी दर्ज हैं जहाँ कॉलेज जातीं, खुसुरफुसुर करतीं, चहचहातीं, पढ़ाई-लिखाई के दबाव झेलतीं और किशोरवय को सेलीब्रेट करतीं लड़कियों के आसपास ही कोई लड़का घात लगाए केमिस्ट की दुकान से एसिड की बोतल ख़रीद रहा है।
इस ब्रोकर समय में ज़मीन से आसमान तक बेच देने की हवस जिस तरह मनुष्यता के लिए ख़तरे की घंटी है, उसे कवि की उठी हुई तर्जनी सधे ढंग से लक्ष्य करती है। इसीलिए अपने नतोन्नत पहाड़ों पर खिलते बुरूंश के फूलों से लेकर गंगा-जमुना के अवतल कछारों तक पसरी हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ अपनी सौन्दर्यदृष्टि, प्रतिरोधी चेतना, भावाभिव्यक्ति और इन्द्रियबोध से कविता की तथाकथित मुख्यधारा से अलग उद्गम और सरणी निर्मित करती हैं। उनका प्रस्तावित नया संग्रह 'कछार-कथा' कोई मील का पत्थर नहीं बल्कि कवि के काव्य-परिसर को और आगे तक देखने का आमंत्रण है। —अष्टभुजा शुक्ल
Barf Aur Aag
- Author Name:
Nida Nawaz
- Book Type:

- Description: Poems
Kabir Granthawali : Parimarjit Paath
- Author Name:
Kabir
- Book Type:

-
Description:
कबीर-पंथियों में जो स्थान ‘बीजक’ का है, अकादमिक हलक़ों में वही स्थान श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर-ग्रंथावली’ का है। तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद आज भी कबीर के प्रामाणिक पाठ के लिए अध्येता ‘ग्रंथावली’ का ही सहारा लेते हैं।
ऐसे में अगर यह पता चले कि ‘ग्रंथावली’ में संकलित कबीर भले ही अन्य संग्रहों के मुक़ाबले ज़्यादा पूरे हों, लेकिन जो पाठ यहाँ प्रकाशित है, उसमें अनेक ऐसी भूलें हैं, जो अर्थ का अनर्थ ही नहीं कर रहीं, बल्कि कवि के मंतव्य को ही उलट दे रही हैं, तो क्या हो...
आश्चर्य नहीं कि लगभग एक सदी से अनेक संस्करणों में व्यवहृत ‘ग्रंथावली’ के इस पक्ष पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की निगाह रुकी और उन्होंने अपने विशद अध्ययन और कबीर के प्रति अपने असाधारण प्रेम के चलते इसके परिमार्जन का बीड़ा उठाया।
यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है। इस भूमिका में प्रो. अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की इस पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है।
पाठकों को ज्ञात ही है कि ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ (2009) में उन्होंने कबीर के बहाने उस मध्यकाल में भारत की आधुनिकता की पहचान की थी, जो औपनिवेशिक आधुनिकता से पहले ही भारत के लोकवृत्त में प्रकट हो चुकी थी।
‘कबीर-ग्रंथावली’ की इस प्रस्तुति में वे न सिर्फ़ कबीर की वाणी को शुद्धतम रूप में हमें दे रहे हैं, बल्कि कबीर-अध्ययन के इतिहास की गुत्थियों को सुलझाते हुए उन्हें ठीक से पढ़ने-जानने की समझ भी हमें प्रदान कर रहे हैं।
Nivedita
- Author Name:
Sheodam Singh Bhadoriya ‘Shiv’
- Book Type:

- Description: ‘निवेदिता’ डॉ. शिवदान सिंह भदौरिया ‘शिव’ का वाग्देवी को निवेदित कविता-संग्रह है। डॉ. शिव की कविताओं का विचारजगत व्यापक है, उसमें अगर एक तरफ़ देश और दुनिया की विविध समकालीन समस्याएँ हैं तो दूसरी तरफ़ मानव जीवन के विविध पहलुओं को छूनेवाले सार्वकालिक प्रश्न भी हैं। कविताओं के इस छोटे से संग्रह में अपने दिक्काल के बाहर और भीतर, पास और दूर को, उसके जीवनस्रोतों को एक साथ देखने और परखने की सफल कोशिश हुई है। अभी-अभी जन्मे विचार चूजों से लेकर झकझोरकर अशान्त कर देनेवाले साम्प्रदायिक धर्मोन्माद के सुनामी और उसके महाविनाश तक, काव्य दर्पण सम्मुख अपना कलेजा खोलकर उसे हू-ब-हू देखने से लेकर तर्क की कुल्हाड़ी से वाक्यों की डालियाँ गिराकर, फिर विवेक-रन्दा चलाकर गोल शहतीरों से महल बनाने तक, अनगिनत राहगीरों के पैरों की मार खानेवाले धूलकण से लेकर अपने तन की मिट्टी में न जाने कितने कुदालों की मार सह लहलहाती फ़सलें उगानेवाली औरत तक इन कविताओं का प्रसार है। कवि के वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अन्तःकरण तक झाँककर देखने की प्रवृत्ति और प्रश्नात्मक स्वभाव के चलते कविताओं में न केवल मौलिकता है, बल्कि उन्हें सर्वथा नवीन व्यक्तित्व मिला है। माँ कहकर रो पड़ती नवजात रचना, आकाश में बिखरे तारों के अन्दर से विद्युत चुम्बकीय तरंग बन बाहर निकलने की इच्छुक किरणें, अर्थ की खोज में घर की पौड़ी लाँघकर अनन्त की ओर निकलते शब्द, डायरेक्ट साहब मि. सूरज के आने का वक़्त होते ही महुए-सी झरकर बिछ गई रिसेप्शनिस्ट सुबह, जोंक की तरह चिपटती दवा की सिरिंज, हिन्दी कविता को नयापन देते कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं। ‘निवेदिता’ की कविताएँ कथ्य की तरह शिल्पगत विविधता के लिए भी उल्लेखनीय हैं। कविताएँ न केवल अपने आकार-प्रकार और प्रयोगशील शैली से बल्कि क्रियात्मक, चित्रात्मक और जीवन्त भाषा से भी हिन्दी कविता को धनी बनाती हैं।
Rasoi Ki Khidki Mein
- Author Name:
Sunita Jain
- Book Type:

- Description: Poems by Sunita jain
Dayare Hayaat Mein
- Author Name:
Kumar Nayan
- Book Type:

- Description: अपने एह्सासात से कारईन व सामईन को रफ़्ता-रफ़्ता मदहोश बना देनेवाले कुमार नयन की शायरी के कई रंग हैं। उनकी ग़ज़लें इश्क़ो-मुहब्बत से सराबोर हैं तो हालाते-हाजरा की मंज़रकशी करती हुई अवाम की दुखती रगों को छूती भी हैं। अपने वक़्त और समाज के तक़ाज़ों को पूरा करती हुई नाइंसाफ़ी, ज़ुल्मो-सितम, बन्दिशों के ख़िलाफ़ चुप्पी तोड़ने की शाइस्तगी से तरफ़दारी भी करती हैं। ग़ज़ल कहनेवालों की भीड़ में कुमार नयन अपनी ज़ुबान और शेरों के मफ़हूम से पहचाने जा सकते हैं। दरअस्ल इनकी ज़ुबान ख़ालिस हिन्दवी ज़ुबान है और शायर भी ख़ालिस गँवई हिन्दुस्तानी जिसका लहज़ा सरल व सहज होने के बावजूद अन्दाज़े-बयाँ क़ाबिलेतारीफ़ और ख़यालात दिलों में हलचल मचानेवाले हैं।
Chidambara
- Author Name:
Sumitranandan Pant
- Book Type:

-
Description:
‘चिदंबरा’ मेरी काव्यचेतना के द्वितीय उत्थान की परिचायिका है। उसमें ‘युगवाणी’ से लेकर ‘अतिमा’ तक की रचनाओं का संचयन है—सन् ’37 से ’57 तक प्राय: बीस वर्षों की विकास-श्रेणी का विस्तार।
‘चिदंबरा’ की पृथु-आकृति में मेरी भौतिक, सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक संचरणों से प्रेरित कृतियों को एक स्थान पर एकत्रित देखकर पाठकों को उनके भीतर व्याप्त एकता के सूत्रों को समझने में अधिक सहायता मिल सकेगी। इनमें मैंने अपनी सीमाओं के भीतर, अपने युग के बहिरन्तर के जीवन तथा चैतन्य को, नवीन मानवता की कल्पना से मंडित कर, वाणी देने का प्रयत्न किया है। मेरी दृष्टि में ‘युगवाणी’ से लेकर ‘वाणी’ तक मेरी काव्य-चेतना का एक ही संचरण है, जिसके भीतर भौतिक और आध्यात्मिक चरणों की सार्थकता, द्विपद मानव की प्रकृति के लिए, सदैव ही अनिवार्य रूप से रहेगी।
‘‘पाठक देखेंगे कि (इन रचनाओं में) मैंने भौतिक-आध्यात्मिक, दोनों दर्शनों से जीवनोपयोगी तत्त्वों को लेकर, जड़-चेतना सम्बन्धी एकांगी दृष्टिकोण का परित्याग कर, व्यापक सक्रिय सामंजस्य के धरातल पर, नवीन लोक-जीवन के रूप में, भरे-पूरे मनुष्यत्व अथवा मानवता का निर्माण करने का प्रयत्न किया है, जो इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता है?’’
—भूमिका से
Saket
- Author Name:
Maithlisharan Gupt
- Book Type:

-
Description:
‘साकेत’ राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की वह अमर कृति है जिसे वे अपने साहित्यिक जीवन की अन्तिम रचना के रूप में पूरी करना चाहते थे। उनकी इस इच्छा के अनुरूप ‘साकेत’ वास्तविक अर्थों में उनकी अमर रचना बन गई। यद्यपि ‘साकेत’ में राम, लक्ष्मण और सीता के वन गमन का मार्मिक चित्रण है, कि इस कृति में समस्त मानवीय संवेदनाओं की अनुभूति पाठक को होती है।
इस कृति में उर्मिला के विरह का जो चित्रण गुप्त जी ने किया है, वह अत्यधिक मार्मिक और गहरी मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं से ओत-प्रोत है। सीता तो राम के साथ वन गई, किन्तु उर्मिला लक्ष्मण के साथ वन न जा सकीं। इस कारण उनके मन में विरह की जो पीड़ा निरन्तर प्रवाहित होती है उसका जैसा करुण चित्रण राष्ट्रकवि ने किया है, वैसा चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। इस करुण चित्रण को पढ़कर पाठक के मन में करुणा की ऐसी तरंग उठना अनिवार्य है, कि आखें बरबस नम हो जाएँ और राष्ट्रकवि की साहित्यिक क्षमता को नमन कर उठें।
Hindnama : Ek Mahadesh Ki Gatha
- Author Name:
Krishna Kalpit
- Book Type:

- Description: हिन्दनामा’ एक महादेश की गाथा उसी तरह है जिस तरह प्रेमचन्द का ‘गोदान’ भारतीय किसान जीवन की गाथा है। ‘हिन्दनामा’ इतिहास है न काल्पनिक उपन्यास। यह एक धूलभरा दर्पण है जिसमें हमारे देश की बहुत सी धूमिल और चमकदार छवियाँ दिखाई देती हैं। ‘हिन्दनामा’ दरअसल हिन्दुस्तान के बारे में एक दीर्घ कविता है जिसमें कोई कालक्रम नहीं है। सब कुछ स्मृतियों की तरह गड्डमड्ड है, जहाँ प्राचीन और अर्वाचीन इस तरह मिलते हैं जैसे किसी नदी के घाट पर शेर और बकरी एक साथ अपनी प्यास बुझा रहे हों। इसकी कोई बिबलियोग्राफ़ी नहीं है—यह कबीर के करघे पर बुनी हुई एक रंगीन चादर है, जो शताब्दियों से शताब्दियों तक तनी हुई है। उग्र राष्ट्रवाद के इस वैश्विक दौर में अपने राष्ट्र को जानने की कोशिश निश्चय ही जोखिम का काम है, और यह कहने की शायद कोई ज़रूरत नहीं कि ‘हिन्दनामा’ हिन्दूनामा नहीं है। हिन्दुस्तान का इन्द्रधनुष जो सात रंगों से मिलकर बना है, उसकी ऐसी गाथा है जो कभी और कहीं भी ख़त्म नहीं होती—चलती ही जाती है। हिन्दी काव्य-जगत के लिए बरसों बाद हासिल एक उपलब्धि है ‘हिन्दनामा’।
Urvar Pradesh
- Author Name:
Anvita Abbi
- Book Type:

-
Description:
कवि भारतभूषण अग्रवाल उन थोड़े से वरिष्ठ कवियों में से थे जिनसे युवतम कवि भी बिना किसी हिचक या संकोच के मिल सकते थे। वे उनसे समानता और प्रसन्न गरमाहट का व्यवहार करने में कभी चूकते नहीं थे। भारत जी के आकस्मिक देहावसान के बाद जब कुछ मित्रों ने, उनकी पत्नी बिन्दु अग्रवाल की पहल और ज़िम्मेदारी पर, किसी वर्ष में प्रकाशित किसी युवा कवि की श्रेष्ठ कविता के लिए उनके नाम पर एक पुरस्कार स्थापित करने का निर्णय लिया तो उनकी युवतर कवियों से निकटता, उनके प्रति उत्साह और उनमें से कइयों के साथ उनकी सहज आत्मीयता को भी बराबर ध्यान में रखा गया था।
अब तक पुरस्कृत कवियों की पुरस्कृत कविताओं के अलावा उनके वक्तव्य और कुछ ताज़ा कविताएँ इस संचयन में शामिल हैं। उन्हें बहुत मनोयोग से भारत जी की बेटी और विख्यात भाषावैज्ञानिक अन्विता अब्बी ने एकत्र किया है। मंशा कुछ यह रही है कि तीस बरस बाद इसका कुछ आकलन हो कि युवा कवि, जिनमें कई अब लगभग वरिष्ठ हो चुके हैं, अपनी कविता और विचार में, भाषा और शिल्प में, मानवीय सच्चाई की अपनी खोज और आत्मसंघर्ष में, व्यापक कविता दृश्य में किस जगह और किस मुक़ाम पर पहुँचे हैं।
इस संचयन से स्पष्ट होता है कि हिन्दी कविता में विस्मयकारी बहुलता है। यह अनुभव करना उत्साहवर्द्धक और विचारोत्तेजक है कि युवा कवियों में किसी एक दृष्टि, एक शैली, एक विचारप्रवृत्ति का वर्चस्व नहीं है। हर स्तर पर बहुलता है जैसे कि हिन्दी भाषा, साहित्य और समाज में भी बहुलता है। यह बहुलता किसी तरह की पक्षहीनता, तटस्थता या उदासीनता का साक्ष्य नहीं है। उलटे प्रायः इन सभी कवियों में अपने आस-पास की ज़िन्दगी, उसकी विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों, उसमें गुँथे-फँसे अच्छे-बुरे अनुभवों के प्रति खुलापन है। दरअसल यह जटिल ज़िन्दगी ही इस सारी कविता का ‘उर्वर प्रदेश’ है।
Prapanchpanchshati
- Author Name:
Moolchandra Pathak
- Book Type:

- Description: प्रपंचपंचशती की परिकल्पना एवं रचना एक मुक्तक काव्य के रूप में की गई है। पाँच सौ पद्यों के विस्तार में रचित इस काव्य में प्रपंच रूप जगत् तथा उसके अंशभूत मानव समाज, विशेष रूप से भारतीय समाज की विविध सामयिक प्रवृत्तियों एवं सामान्य जनों के मनोभावों व विचारों का सार रूप में दिग्दर्शन व विवेचन किया गया है। काव्य में जिन विषयों का विचार किया गया है, वे हैं नीति, लोक, प्रकृति, नारी, राजनीति, शिक्षा, वाक्, धन, धर्म, जीवन व मृत्यु, काल आदि। मुक्तक काव्य होने के नाते इसके पद्यों में किसी भी विषय का सांगोपांग तथा शास्त्रीयता से पूर्ण विस्तृत विवेचन नहीं किया गया है। एक ही विषय को लेकर विभिन्न अवसरों पर रचित सभी पद्यों को एक ही विषयसूचक शीर्षक के अंतर्गत संकलित किया गया है। काव्य के नामकरण में प्रपंच शब्द का प्रयोग इसके शास्त्रीय अभिप्राय को लेकर नहीं, अपितु इसके लोक प्रचलित अर्थ को ही लेकर किया गया है। इसमें कहीं सामान्य रूप से वर्णनात्मक, कहीं व्याख्यात्मक तो कहीं व्यंग्यात्मक शैली का आश्रय लिया गया है। जिन विषयों व भावों को इसमें प्रकट किया गया है, वे लेखक की अपनी विचारणा, लोकदृष्टि व जीवनदृष्टि के सूचक हैं।
Gagan Neela Dhara Dhani Nahi Hai
- Author Name:
Keshav Sharan
- Book Type:

- Description: collection of ghazals
Kunwarvarti Kaise Bahe
- Author Name:
Dr. Rakesh Kabeer
- Book Type:

- Description: इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पता चलता है कि कवि राकेश का रचना-संसार अत्यंत समृद्ध एवं विस्तृत है। सामाजिक यथार्थों और विसंगतियों को समेटने और भेदने में उनकी काव्यदृष्टि सक्षम है। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के विभिन्न उपादानों और नदियों के विनाश से कवि का मन तकलीफ से भर उठता है। प्रकृति की लोकतांत्रिक मोहकता बेशक सबको आकर्षित करती है, परंतु हमारी उपेक्षा से उसमें निरंतर हृस हो रहा है। ‘कुँवरवर्ती’, ‘वापसी’ और ‘शहरी मेढक’ जैसी कविताओं में यही चिंता साफ दिखती है। संग्रह की कविताओं में जो सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि है, वह समकालीन घटनाओं की सख्ती से छानबीन करती है। संविधान और लोकतंत्र में गहरा विश्वास, सामाजिक न्याय का प्रबल समर्थन, जातीय भेदभाव के विरोध के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के सवालों से भी बड़ी संजीदगी से इस संग्रह की कविताएँ मुठभेड़ करती हैं। किसानों की रोजमर्रा की समस्याएँ, उनकी फसलों के वाजिब मूल्य, गरीबी और आत्महत्या के मुद्दों के बीच जीवन में हरियाली बोने की जिदवाली उम्मीद हमें आश्वस्त करती है कि अभी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है। लोकतंत्र की संस्थाओं पर भरोसा एवं सभी के अधिकारों का सम्मान करके ही हमारा विविधतापूर्ण देश एक सशक्त राष्ट्र बन सकता है। हमें अपने जीवन से अनेक तरह के अनुभव प्राप्त होते हैं। कवि मन ऐसे अनुभवों, और स्मृतियों को भी अपनी कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करता है।
Apne Jaisa Jeevan
- Author Name:
Savita Singh
- Book Type:

-
Description:
‘अपने जैसा जीवन’ एक नई तरह की कविता के जन्म की सूचना देता है। यह ऐसी कविता है जो मनुष्य के बाहरी और आन्तरिक संसार की अज्ञात–अपरिचित मनोभूमियों तक पहुँचने का जोखिम उठाती है और अनुभव के ऐसे ब्योरे या संवेदना के ऐसे बिम्ब देख लेती है, जिन्हें इससे पहले शायद बहुत कम पहचाना गया है। सविता सिंह ऐसे अनुभवों का पीछा करती हैं जो कम प्रत्यक्ष हैं, अनेक बार अदृश्य रहते हैं, कभी–कभी सिर्फ़’ अपना अँधेरा फेंकते हैं और ‘न कुछ’ जैसे लगते हैं। इस ‘न कुछ’ में से ‘बहुत कुछ’ रचती इस कविता के पीछे एक बौद्धिक तैयारी है, लेकिन वह स्वत:स्फूर्त ढंग से व्यक्त होती है और पिकासो की एक प्रसिद्ध उक्ति की याद दिलाती है कि कला ‘खोजने’ से ज़्यादा ‘पाने’ पर निर्भर है। प्रकृति के विलक्षण कार्यकलाप की तरह अनस्तित्व में अस्तित्व को सम्भव करने का एक सहज यत्न इन कविताओं का आधार है।
ऐसी कविता शायद एक स्त्री ही लिख सकती है। लेकिन सविता की कविताओं में प्रचलित ‘नारीवाद’ से अधिक प्रगतिशील अर्थों का वह ‘नारीत्व’ है जो दासता का घोर विरोधी है और स्त्री की मुक्ति का और भी गहरा पक्षधर है। इस संग्रह की अनेक कविताएँ स्त्री के ‘स्वायत्त’ और ‘पूर्णतया अपने’ संसार की मूल्य–चेतना को इस विश्वास के साथ अभिव्यक्त करती हैं कि मुक्ति की पहचान का कोई अन्त नहीं है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि सविता की ज़्यादातर कविताएँ स्त्रियों पर ही हैं और वे स्त्रियाँ जब देशी–विदेशी चरित्रों और नामों के रूप में आती हैं तब अपने दु:ख या विडम्बना के ज़रिए अपनी मुक्ति की कोशिश को मूर्त्त कर रही होती हैं। उनका रुदन भी एकान्तिक आत्मालाप की तरह शुरू होता हुआ सार्वजनिक वक्तव्य की शक्ल ले लेता है। सविता सिंह लगातार स्मृति को कल्पना में और कल्पना को स्मृति में बदलती चलती हैं। यह आवाजाही उनके काव्य–विवेक की भी रचना करती है, जहाँ यथार्थ की पहचान और बौद्धिक समझ कविता को वायवीय और एकालापी होने से बचाती है। मानवीय संवेगों को बौद्धिक तर्क के संसार में पहचानने का यह उपक्रम सविता की रचनात्मकता का अपना विशिष्ट गुण है। इस आश्चर्यलोक में कविता बार–बार अपने में से प्रकट होती है, अपने भीतर से ही अपने को उपजाती रहती है और अपने को नया करती चलती है।
Coffee Cafe
- Author Name:
Rashmi Tarika
- Book Type:

- Description: This book has no description
Beautiful Poem (Series-1)
- Author Name:
Dr.Sanjay Rout
- Book Type:

- Description: Beautiful Poem (Series-1) is a book written by Dr.Sanjay Rout published by ISL Publicaions. It is a collection of poetry based on the theme of 'Love'. It is helpful for all age group people who want to make their life more meaningful and meaningful through nature poetry.
Peepal Ke Ped Par Baithe Hue Giddh
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ
Sab kuchh Hona Bacha Rahega
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
- Book Type:

-
Description:
इस कविता-संग्रह में वह दृष्टि है जो समय को झरती हुई पत्तियों की जगह फूटती हुई कोंपलों में देखने का हौसला रखती है। विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ शब्दों को ध्वजा की तरह फहरानेवाली कविताएँ नहीं हैं। अनुभवों को हमारे पास छोड़कर स्वयं अदृश्य हो जानेवाली या अपने अद्भुत वाक्य-विन्यास की मौलिकता से स्वयं का दर्ज़ा प्राप्त कर लेनेवाली भाषा इन कविताओं की विशेषता है।... मंगल ग्रह सूना है। पृथ्वी के पड़ोस में सन्नाटा है। संकट में पृथ्वी के लोग कहाँ जाएँगे, कहकर उनकी कविताएँ हमारी संवेदना को जिन महत्तम आयामों से जोड़ती हैं, वह समकालीन कविता के लिए अभूतपूर्व है। जिस भाषा को राजनीतिज्ञों ने झूठा और कवियों ने अर्थहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, उसी से विनोद कुमार शुक्ल सच्चाई और जीवन में शेष हो चली आस्था की पुनर्रचना कैसे कर लेते हैं, यह एक सुखद आश्चर्य का विषय है। इसमें बच्चे हैं मज़दूरनियों के, जो दूध से पहले माँ के स्तनों पर आए पसीने का स्वाद चखते हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो यह कविता की दुर्लभ प्रजाति है जिसमें ऊबा हुआ पाठक ताज़गी से भरी कुछ गहरी साँसें ले सकता है।...इस पत्थर समय को मोम की तरह तराशते चले जाने की ताक़त और निस्संगता के स्रोत विनोद कुमार शुक्ल की ग़ैर-साहित्यिक पृष्ठभूमि और रुझानों में हैं। यह उनकी वैज्ञानिक समझ और संवेदना का दुर्लभ संयोग है और गहरी जीवनासक्ति कि पेड़, पत्थर, पानी, हवा हमें अपने पूर्वजों की तरह लगने लगते हैं (जो कि वे सचमुच हैं)।...एक अद्भुत आत्मीय संस्पर्श है इस दृष्टि में कि जिन चीज़ों पर वह पड़ती है, वे जीवित हो उठती हैं और अपने अधिकारों की माँग करने लगती हैं। इस तरह संग्रह की सम्पूर्णता में देखा जाए तो यही लगता है कि लाशों से भरे समय का सामना करती ये कविताएँ मृत्यु को न सिर्फ़ मनुष्य की नियति मानने से इनकार करती हैं बल्कि जीने के लिए ज़रूरी सामान भी जुटाती हैं।
—नरेश सक्सेना
Mera Ghar
- Author Name:
Trilochan
- Book Type:

-
Description:
style="font-weight: 400;">वयोवृद्ध त्रिलोचन इस समय हिन्दी के सम्भवतः सबसे गृहस्थ कवि हैं, इस अर्थ में कि हिन्दी भाषा अपनी जातीय स्मृतियों और असंख्य अन्तर्ध्वनियों के साथ, सचमुच उनका घर है। वे बिरले कवि हैं जिन्हें यह पूरे आत्मविश्वास से कहने का हक़ है कि ‘पृथ्वी मेरा घर है/अपने इस घर को/अच्छी तरह मैं ही नहीं जानता।’ इस घर में हुब्बी, पाँचू, टिक्कुल बाबा आदि सब रसे-बसे हैं। त्रिलोचन की कविता साधारण से साधारण चरित्र या घटना या बिम्ब को पूरे जतन से दर्ज करती है, मानो सब कुछ उनके पास-पड़ोस में है, कि ‘तारे सब सहचर हैं मेरे’।
इस संग्रह में त्रिलोचन की ऐसी कई कविताएँ पहली बार पुस्तकाकार संगृहीत हो रही हैं जो उनके किसी पिछले संग्रह में नहीं आ सकी थीं और इधर-उधर पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं। इस चयन में बिना चीख़-पुकार मचाए, ‘पीड़ा-संग्रह’ है और यह मानने की बेबाकी भी
कि—‘मुझे अपने मरने का
थोड़ा भी दु:ख नहीं
मेरे मर जाने पर
शब्दों से मेरा सम्बन्ध
छूट जाएगा।’
त्रिलोचन की कुछ अवधी कविताएँ इस संग्रह को ‘घर की बोली’ देती हैं। उनमें न सिर्फ़ ‘भाखा की महिमा’ प्रगट है, पर स्वयं त्रिलोचन का अत्यन्त स्पन्दित भाषा संसार भी—एक बार फिर। —अशोक वाजपेयी
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book