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Jidhar Kuchh Nahin

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‘जिधर कुछ नहीं’ की विशिष्टता यह नहीं है कि यह हिन्दी की सबसे लम्बी कविताओं में एक है बल्कि यह कि यह एक नई तरकीब से लिखी गई है और वैकल्पिक नागरिकता को आविष्कृत करने के लिए एक दुष्कर और लम्बी अन्तर्यात्रा पर निकली हुई है। यह वैकल्पिक सृष्टि को खोजना तो है लेकिन इसके लिए भारतीय पृथ्वी के कोलाहल, वैषम्य और क़ैद से गुज़रने से कोई निज़ात नहीं है। दरअस्ल, जो शोर, दिग्भ्रम, अमर्ष, धुंध और अँधेरा मौजूद है, उसी के पीछे और नीचे वैकल्पिक नागरिकता छिपी हुई है। तो खोज का प्रश्न राजनीतिक प्रबोध और बड़ी समाजार्थिक परिकल्पना से जुड़ा हुआ है। देवी एक ऐसी सामाजिक सुरंग से गुज़रने और पाठक को गुज़ारने का चयन करते हैं जिसके कितने ही स्टेशन और अड्डे ढहा दिये गये हैं या जला दिये गये हैं। यह कठिन समय में लिखी गई कविता है जब राज्य के चरित्र को बदल दिया गया है, जब उत्तर-सत्य का बोलबाला है, जब बड़ी संकल्पनाएँ नष्ट की जा रही हैं, जब ज्ञान की जगह अंधी आस्था को स्थापित किया जा रहा है, जब अपराध को वैधता दी जा रही है, जब सामाजिक रचना के लिए मानवीय अन्तर्दृष्टि की जगह घृणादृष्टि ले रही है, जब ज्ञान को संदेहास्पद बनाया जा रहा है और इतिहास का विभाजक पाठ तैयार किया जा रहा है। उजाड़ने का यह काम भले ही बहुत क्रूर तरीक़े से किया गया दिख रहा हो, इस अमानवीय और नागरिकता विरोध की दीर्घ और सत्तात्मक परंपरा है। इस रौशनी में देखने पर यह साफ़ होगा कि यह कविता किसी भी तरह से प्रतिक्रियात्मक संरचना भर नहीं है बल्कि एक दस्तावेज़ी और ऐतिहासिक कामकाज है जिसकी प्रासंगिकता असमाप्य है क्योंकि ताक़त का दुरुपयोग ख़त्म होता नहीं दिखता। इस कविता में देवी कहन का अप्रतिम हुनर दिखाते हैं, हिन्दवी की तमाम प्रविधियों से लेन-देन शुरू कर देते हैं और इस कारोबार की अनायासता में एक नयी काव्य तकनीक हासिल कर लेते हैं। वह अनुभव की विपुलता से गुज़रते हुए कितनी ही बार रेटरिक को काव्यात्मक विज़न और परानुभूति की बड़ी सूझ में बदल देते हैं। इस महाकविता का पाठ उतना कठिन नहीं है जितना वह अपनी संरचना में दिखता है जो भले ही समकालीनता के कोने में किये गये एकांतिक दुस्साहस का नतीजा हो या किसी फक्कड़ के हाथ लग जाने वाली मौलिकता की जादुई भभूत। वैकल्पिक की खोज में भटकती कविता की परिकल्पना और संरचना दोनों अपूर्व हैं जो भारतीय और विश्व कविता के बीच गर्दन बहुत ऊँची करके खड़ी हो सकती हैं। किताब के अन्त में आता उत्तर कथन इस कविता के आलोक में राजकीय दमन और रचना के बीच के जटिल सम्बन्ध को जिस तरह से देखता है, हिन्दी विचार जगत में वह विरल है।’

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‘जिधर कुछ नहीं’ की विशिष्टता यह नहीं है कि यह हिन्दी की सबसे लम्बी कविताओं में एक है बल्कि यह कि यह एक नई तरकीब से लिखी गई है और वैकल्पिक नागरिकता को आविष्कृत करने के लिए एक दुष्कर और लम्बी अन्तर्यात्रा पर निकली हुई है। यह वैकल्पिक सृष्टि को खोजना तो है लेकिन इसके लिए भारतीय पृथ्वी के कोलाहल, वैषम्य और क़ैद से गुज़रने से कोई निज़ात नहीं है। दरअस्ल, जो शोर, दिग्भ्रम, अमर्ष, धुंध और अँधेरा मौजूद है, उसी के पीछे और नीचे वैकल्पिक नागरिकता छिपी हुई है। तो खोज का प्रश्न राजनीतिक प्रबोध और बड़ी समाजार्थिक परिकल्पना से जुड़ा हुआ है। देवी एक ऐसी सामाजिक सुरंग से गुज़रने और पाठक को गुज़ारने का चयन करते हैं जिसके कितने ही स्टेशन और अड्डे ढहा दिये गये हैं या जला दिये गये हैं। यह कठिन समय में लिखी गई कविता है जब राज्य के चरित्र को बदल दिया गया है, जब उत्तर-सत्य का बोलबाला है, जब बड़ी संकल्पनाएँ नष्ट की जा रही हैं, जब ज्ञान की जगह अंधी आस्था को स्थापित किया जा रहा है, जब अपराध को वैधता दी जा रही है, जब सामाजिक रचना के लिए मानवीय अन्तर्दृष्टि की जगह घृणादृष्टि ले रही है, जब ज्ञान को संदेहास्पद बनाया जा रहा है और इतिहास का विभाजक पाठ तैयार किया जा रहा है। उजाड़ने का यह काम भले ही बहुत क्रूर तरीक़े से किया गया दिख रहा हो, इस अमानवीय और नागरिकता विरोध की दीर्घ और सत्तात्मक परंपरा है। इस रौशनी में देखने पर यह साफ़ होगा कि यह कविता किसी भी तरह से प्रतिक्रियात्मक संरचना भर नहीं है बल्कि एक दस्तावेज़ी और ऐतिहासिक कामकाज है जिसकी प्रासंगिकता असमाप्य है क्योंकि ताक़त का दुरुपयोग ख़त्म होता नहीं दिखता। इस कविता में देवी कहन का अप्रतिम हुनर दिखाते हैं, हिन्दवी की तमाम प्रविधियों से लेन-देन शुरू कर देते हैं और इस कारोबार की अनायासता में एक नयी काव्य तकनीक हासिल कर लेते हैं। वह अनुभव की विपुलता से गुज़रते हुए कितनी ही बार रेटरिक को काव्यात्मक विज़न और परानुभूति की बड़ी सूझ में बदल देते हैं। इस महाकविता का पाठ उतना कठिन नहीं है जितना वह अपनी संरचना में दिखता है जो भले ही समकालीनता के कोने में किये गये एकांतिक दुस्साहस का नतीजा हो या किसी फक्कड़ के हाथ लग जाने वाली मौलिकता की जादुई भभूत। वैकल्पिक की खोज में भटकती कविता की परिकल्पना और संरचना दोनों अपूर्व हैं जो भारतीय और विश्व कविता के बीच गर्दन बहुत ऊँची करके खड़ी हो सकती हैं। किताब के अन्त में आता उत्तर कथन इस कविता के आलोक में राजकीय दमन और रचना के बीच के जटिल सम्बन्ध को जिस तरह से देखता है, हिन्दी विचार जगत में वह विरल है।’

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2022
Weight
140 grams
ISBN-13
9789393768452
Pages
112
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
16 × 22 cm
Language
Hindi

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