Kavi Ki Preyasi
(0)
Author:
Ilachandra JoshiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
400
320 (20% off)
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‘कवि की प्रेयसी’ एक काल्पनिक उपन्यास है जिसमें प्रसिद्ध उपन्यासकार इलाचन्द्र जोशी ने अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से अपने ही एक परिचित मित्र के पूर्व जन्म की कहानी का चित्रण किया है। इसमें वर्णित प्रसंगों की सटीकता प्रमाणित करने के लिए किसी पुरातत्त्वेत्ता की दृष्टि को व्यर्थ प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। इस उपन्यास में पात्रों के मनोभावों को बड़ी सटीकता और सघनता से लिखा गया है जिससे कोई भी संवेदनशील पाठक अछूता नहीं रह सकता। अन्त:बाह्य जीवन के संघर्ष व रोमांचकता से परिपूर्ण सार्थकता को प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास पाठकों को शुरू से अन्त तक बाँधे रखने में सक्षम है।
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‘कवि की प्रेयसी’ एक काल्पनिक उपन्यास है जिसमें प्रसिद्ध उपन्यासकार इलाचन्द्र जोशी ने अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से अपने ही एक परिचित मित्र के पूर्व जन्म की कहानी का चित्रण किया है। इसमें वर्णित प्रसंगों की सटीकता प्रमाणित करने के लिए किसी पुरातत्त्वेत्ता की दृष्टि को व्यर्थ प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। इस उपन्यास में पात्रों के मनोभावों को बड़ी सटीकता और सघनता से लिखा गया है जिससे कोई भी संवेदनशील पाठक अछूता नहीं रह सकता। अन्त:बाह्य जीवन के संघर्ष व रोमांचकता से परिपूर्ण सार्थकता को प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास पाठकों को शुरू से अन्त तक बाँधे रखने में सक्षम है।
Book Details
-
ISBN9789352211067
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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काली अब निरे सामन्तीय सम्बन्धों से बाहर आकर जालन्धर के अर्ध–सामन्तीय, अर्ध–पूँजीवादी हालातों
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बाद के तीस वर्ष उन्होंने धर्मलाभ और पुण्यलाभ के निमित्त सारे संसार पर न्योछावर कर दिए।
उपन्यास के कथानक, उपन्यासों के पात्रों, राजनगरों, राजधानियों, राज्यशैलियों, प्रचलित परम्पराओं, पात्रों के नामों, सामाजिक स्थितियों, परिस्थितियों, सामान्य नागरिकों की मन:स्थितियों, यात्राओं, धर्मसभाओं, न्यायालयों, नारी जगत की संवेदनाओं, ईर्ष्याओं, वैर-बदलों, उपसर्गों, परीषहों, मन्दिरों, मदिरालयों आदि का अध्ययन करने पर लगता है कि मनस्वी डॉ. रत्नेश ने पचासों उपन्यासों को इस एक उपन्यास में महावीर को अपना कथानायक बनाकर लिखने की कोशिश की है। श्री रत्नेश अपनी प्रवाहमयी भाषा के लिए जाने जाते हैं। उस काल के अनुरूप संवादों और व्यवहारगत भाषा का ध्यान उन्होंने बराबर रखा है।
डॉ. राजेन्द्र रत्नेश की पुस्तक ‘वर्द्धमान’ का समग्र लेखन जैन आगम, जैन इतिहास, जैन पुराण और जैन मान्यताओं के अध्ययन तथा आधारभूमि पर है। डॉ. रत्नेश ने अपनी आयु का स्वर्णकाल एक जैन श्रमण या जैन मुनि के रूप में जिया है। उन्होंने साधु जीवन और मुनि जन्म का शैलीगत पालन किया है। आज वे एक सद्गृहस्थ और मेधावी पत्रकार तथा लेखक हैं। अपने दीर्घ अनुभव और अध्ययन से वे यदि 'वर्द्धमान' जैसा मात्र पठनीय ही नहीं, अपितु मननीय ग्रन्थ अपने समाज को सौंपते हैं तो यह बहुत सुखद फलित है।
Vama-Bodhini
- Author Name:
Navnita Devsen
- Book Type:

-
Description:
‘वामा-बोधिनी’ सिर्फ़ वामाओं में बोधोदय रचती है, ऐसा नहीं है। नवनीता देव सेन की यह उपन्यासिका, उसका व्यतिक्रम है जो आधुनिक बंगला साहित्य में, निस्सन्देह एक साधारण संयोजन है। उपन्यास का केन्द्र-बिन्दु, हालाँकि औरत ही है, लेकिन इसमें पुरुष-विरोधी हुंकार नहीं है, बल्कि उसके प्रति ममत्व-भाव है। सोलहवीं शती के मैमनसिंह की एक बंगाली महिला कवि की जीवनगाथा, बीसवीं शती की तीन अलग-अलग औरतों की कथा में घुल-मिल गई है। एक चिरन्तन मानवी की व्यथा-कथा; जिसमें रचे-बुने गए हैं, अतल मन की गहराइयों के अनगिनत अहसास!
हम सबकी ज़िन्दगी में परत-दर-परत अनगिनत युद्ध छिड़े हुए हैं—राजनीति बनाम नैतिक सच्चाई; प्रेम बनाम दायित्व; पांडित्य बनाम सृजनात्मक प्रतिभा; पुरुष शासित नीतिबोध बनाम जगत के भीतरी मूल्यबोध; सामाजिक सुनीति बनाम मानवीय आवेग—इन तमाम ख़तरनाक विषयों की लेखिका ने जाँच-परख की है। कमाल की बात यह है कि इसके बावजूद कहीं रस-भंग नहीं हुआ है, शिल्प ने कहीं भी जीवन के स्वाभाविक प्रवाह का अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि कथा-शैली में विलक्षण रूप से एक अभिनव तत्त्व का समावेश हुआ है।
अतीत और वर्तमान, अन्तर्जीवन और बाह्य जीवन, वक्तव्य और कथा-बयानी, गद्य और पद्य, यहाँ घुल-मिलकर एकमेक हो गए हैं। रिसर्च के दौरान लिए गए नोट्स, डायरी के पन्ने, प्रेमियों के ख़त, ग्रामीण बालाओं के गीत, नायिका की विचारधारा, सम्पादक का जवाब—इस सबको मिलाकर इस कथा में, बिलकुल नए रूप में, बेहद सख़्त लेकिन बहुमुखी सत्य का सृजन किया गया है, जो कथा के शिल्प में हीरे की तरह जड़ा हुआ है; हीरे ही की तरह शुभ्र-उज्ज्वल कठोर और अखंडित रूप में जगमगाता हुआ।
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