Ek Samvedansheel Rajneta : Shanta Kumar
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"एक संवेदनशील राजनेता शान्ता कुमार वस्तुतः हम जीवनी लिखने के लिए तभी प्रेरित होते हैं, जब हम किसी महापुरुष या भीड़ में अलग दिखाई देने वाले किसी ऐसे व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं, जिसमें आदर्श गुण झलकते हैं, जो जन-कल्याण में प्रवृत्त होता है, जो दूरदृष्टा एवं युगसृष्टा होता है, जो स्वार्थ से कहीं ऊपर होता है। महापुरुष भी हाड़-मांस के पुतले होते हैं। अतः उनके व्यक्तित्व में भी गुण-दोष विद्यमान रहते हैं, परंतु उनकी सदाशयता, उनका परमार्थ, उनका प्राणपन से समाज कल्याण, राष्ट्रहित में आजीवन समर्पित हो जाना उन्हें महान् बनाता है। शान्ता कुमार भी एक ऐसा ही विलक्षण व्यक्तित्व है, जो भीड़ में अलग दिखाई देता है, दिव्य एवं अन्य रश्मियों से मंडित है। सृजक शान्ता कुमार राजनीति में भी मानवीय संवेदनाओं का संवाहक है...तभी तो वह बार-बार ‘पृथु’ को याद करता है, ‘अंत्योदय’ शब्द का उल्लेख होने पर ही वह भाव-विह्वल हो जाता है। शान्ता कुमार एक धीर-गंभीर राजनेता तथा आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी लेखक हैं। निरंतर सृजन में तल्लीन होना उपन्यास, कहानी, कविता, जीवनी लेखन, निबंध, संस्मरण विधाओं में पुस्तकों का प्रकाशन उनकी लेखकीय जिजीविषा का प्रमाण है। समाज में महिलाओं की समस्याएँ...घर-परिवार, सैनिकों की विधवाएँ, रोजगार, वृद्धों की कठिनाइयों, व्यावहारिक सरोकार अनेक पक्षों से वह जन-जीवन को अपनी रचनाओं में उतारते हैं। एक संवेदनशील राजनेता का जिंदगीनामा है यह पुस्तक। "
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"एक संवेदनशील राजनेता शान्ता कुमार
वस्तुतः हम जीवनी लिखने के लिए तभी प्रेरित होते हैं, जब हम किसी महापुरुष या भीड़ में अलग दिखाई देने वाले किसी ऐसे व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं, जिसमें आदर्श गुण झलकते हैं, जो जन-कल्याण में प्रवृत्त होता है, जो दूरदृष्टा एवं युगसृष्टा होता है, जो स्वार्थ से कहीं ऊपर होता है।
महापुरुष भी हाड़-मांस के पुतले होते हैं। अतः उनके व्यक्तित्व में भी गुण-दोष विद्यमान रहते हैं, परंतु उनकी सदाशयता, उनका परमार्थ, उनका प्राणपन से समाज कल्याण, राष्ट्रहित में आजीवन समर्पित हो जाना उन्हें महान् बनाता है। शान्ता कुमार भी एक ऐसा ही विलक्षण व्यक्तित्व है, जो भीड़ में अलग दिखाई देता है, दिव्य एवं अन्य रश्मियों से मंडित है।
सृजक शान्ता कुमार राजनीति में भी मानवीय संवेदनाओं का संवाहक है...तभी तो वह बार-बार ‘पृथु’ को याद करता है, ‘अंत्योदय’ शब्द का उल्लेख होने पर ही वह भाव-विह्वल हो जाता है। शान्ता कुमार एक धीर-गंभीर राजनेता तथा आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी लेखक हैं। निरंतर सृजन में तल्लीन होना उपन्यास, कहानी, कविता, जीवनी लेखन, निबंध, संस्मरण विधाओं में पुस्तकों का प्रकाशन उनकी लेखकीय जिजीविषा का प्रमाण है। समाज में महिलाओं की समस्याएँ...घर-परिवार, सैनिकों की विधवाएँ, रोजगार, वृद्धों की कठिनाइयों, व्यावहारिक सरोकार अनेक पक्षों से वह जन-जीवन को अपनी रचनाओं में उतारते हैं।
एक संवेदनशील राजनेता का जिंदगीनामा है यह पुस्तक।
"
Book Details
-
ISBN9788177212242
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Book Type:

- Description:
रचनाक्रम की दृष्टि से ‘निरुपमा’ निराला का चौथा उपन्यास है। पहले के तीन उपन्यासों—‘अप्सरा’, ‘अलका’ और ‘प्रभावती’ की तरह इस उपन्यास का कथानक भी घटना-प्रधान है। स्वतंत्रता-आन्दोलन के दिनों में, ख़ासकर बंगाल में समाज-सुधार की लहर पूरे उभार पर थी। निराला का बंगाल से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा, इसलिए उनके उपन्यासों में समाज-सुधार का स्वर बहुत मुखर है। लेकिन इसे समाज-सुधार न कहकर सामन्ती रूढ़ियों से विद्रोह कहें तो अधिक उपयुक्त होगा। ‘निरुपमा’ में उन्होंने ऐसे ही विद्रोही चरित्रों की अवतारणा की है। जनवादी चेतना से ओतप्रोत नवशिक्षित तरुण-तरुणियों के रूप में कृष्णकुमार, कमल और निरुपमा के चरित्र, नन्दकिशोर नवल के शब्दों में, ‘‘सामन्ती रूढ़ियों को तोड़कर समाज के सम्मुख एक आदर्श रखते हैं। उनके मार्ग में बाधाएँ आती हैं, पर वे उनसे विचलित नहीं होते और संघर्ष करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।’’ कमल और निरुपमा के माध्यम से निराला ने नारी-जाति की मुक्ति का भी पथ प्रशस्त किया है।
सन् 1935 के आसपास लिखा गया निराला का यह उपन्यास हमारे लिए आज भी कितना नया और प्रासंगिक है, यह इसे पढ़कर ही जाना जा सकता है।
Mere Bete Ki Kahani
- Author Name:
Nadine Gordimer
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‘नोबेल पुरस्कार’ सम्मानित लेखिका नादिन गोर्डाइमर का उपन्यास ‘मेरे बेटे की कहानी’ दक्षिण अफ्रीका के नस्लवादी, रंगभेदवादी निरंकुश, अमानवीय शासन के निषेध-दर-निषेध की चक्की में पीसे जाते उन 87 प्रतिशत बहुसंख्य कालों, अश्वेतों तथा अन्यवर्णी जनों पर 13 प्रतिशत विशेष सुविधाभोगी गोरों के संवेदनहीन अत्याचार और शोषण-चक्र की स्मृतियाँ जगानेवाली कृति है। यहाँ से गुज़रना अँधेरी सुरंग की कष्टकर किन्तु अनिवार्य यात्रा की तरह है—एक ऐसी लम्बी, काली रात जिसकी कोई सुबह नहीं है। जैसे-जैसे हम पृष्ठ पलटते हैं एक भयानक बेचैनी जकड़ती चलती है, लेकिन हम उससे भाग नहीं सकते। हमारे अन्दर बैठा मनुष्य अपने नियतिचक्र का यह उद्वेलन अपनी हर शिरा में महसूस करना चाहता है—अगले संघर्ष की तैयारी के लिए, जो कहीं, कभी शुरू हो सकता है।
‘मेरे बेटे की कहानी’ एक ऐसे संसार में ले जाती है जहाँ मनुष्य होने के हर अधिकार को निषेधों और वर्जनाओं के बुलडोज़रों के नीचे कुचल दिया गया है। लेकिन इस दमनचक्र में पीसे जाने के बावजूद संघर्ष जीवित है।
उपन्यास में कथा कई स्तरों पर चलती है। पीड़ा भोगते अधिसंख्य जन, उन्हीं के बीच से उभरकर संघर्ष करनेवाले क्रान्तिबिन्दु किशोर और युवक, जो बड़ी बेरहमी से भून दिए जाते हैं। उनकी क़ब्रों पर श्रद्धांजलि अर्पित करने जुटी भीड़ पर फिर गोलियाँ बरसाई जाती हैं। हर रोज़, हर कहीं यही होता है। कथा का आरम्भ ऐसा आभास कराता है जैसे यह विवाहेतर अवैध काम सम्बन्धों की चटपटी कथा है। ‘दूसरी औरत’ के साथ अपने क्रान्तिकारी पिता को, जो हाल ही में जेल से छूटकर आया है, देखनेवाली किशोर बेटे की आँख इस सन्दर्भ को नए आयाम देती है। एक भयानक, विद्रूपित कंट्रास्ट की क्षणिक आश्वस्ति—और पाठक को लगता है वह क्षण-भर को खुलकर साँस ले सकता है। लेकिन अन्ततः यह किंचित् रोमानी स्थिति भी हमें बेमालूम तौर पर बहुत ऊँचाई से इस संघर्ष के भँवर में फेंक देती है, और हम अन्दर ही अन्दर उतरते चले जाते हैं। स्थितियों का यह प्रतिगामी विचलन एक नए शिल्प के तहत रचना के समग्र प्रभाव को और भी धारदार बना देता है।
Sara Aakash
- Author Name:
Rajendra Yadav
- Book Type:

- Description:
आज़ाद भारत की युवा-पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक़्शा। आश्वासन तो यह है कि सम्पूर्ण दुनिया और सारा आकाश तुम्हारे सामने खुला है—सिर्फ़ तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो—हाथ-पैरों में शक्ति हो...
मगर असलियत यह है कि हर पाँव में बेड़ियाँ हैं और हर दरवाज़ा बन्द है। युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता कि किधर जाए और क्या करे। इसी में टूटता है उसका तन, मन और भविष्य का सपना। फिर वह क्या करे—पलायन, आत्महत्या या आत्मसमर्पण?
आज़ादी के पचास बरसों ने भी इस नक़्शे को बदला नहीं—इस अर्थ में ‘सारा आकाश’ ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन भी।
बेहद पठनीय और हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासों में से एक ‘सारा आकाश’ चालीस संस्करणों में आठ लाख प्रतियों से ऊपर छप चुका है, लगभग सारी भारतीय और प्रमुख विदेशी भाषाओं में अनूदित है। बासु चटर्जी द्वारा बनी फ़िल्म ‘सारा आकाश’ (हिन्दी) सार्थक कलाफ़िल्मों की प्रारम्भकर्ता फ़िल्म है।
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