Andhera Kona
Author:
Uma Shankar ChoudharyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
हर चर्च में एक क्वायर होता है। लड़के-लड़कियों का, स्त्रियों और पुरुषों का, जो आस्थावान और बे-आस्था सबको अपने धीमे गायन से आध्यात्मिक दुनिया की ऐसी गलियों में लिए चलता है कि मन भीग जाता है। ‘अँधेरा कोना’ पढ़ते हुए एक ऐसा ही धीमा दुःख मन को जकड़ने लगता है और फिर उसकी गिरफ्त से छूटना खासा मुश्किल हो जाता है। यह उपन्यास...एक नृशंस समय का रेखांकन है, एक हताशा और निराशा के बीच झूलते समाज का यथार्थवादी चिन्तन है।</p>
<p>उमा शंकर चौधरी एक जागरूक पर्यवेक्षक की तरह हमें उन गायब जगहों पर ले जाते हैं जहाँ पात्रों का एक क्वायर कुछ गा रहा है। आप यदि नजदीक जाकर सुनने की कोशिश करेंगे तो सुन लेंगे बखूबी उनका हलाक हो जाने वाला गीत। इस गीत में एक पूरा समय और समाज है, एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की उखड़ती परतें हैं, प्रेम है, निस्तार है, अभाव है और सब कुछ खत्म हो जाने के पहले कुछ विचार करने और बचा लेने की गुहार है।</p>
<p>अत्यन्त चुस्त भाषा, कथ्य की रवानगी, राजनीति और समाज पर मजबूत पकड़ के दिलचस्प वाकयों से भरा यह उपन्यास कोई जादुई यथार्थवाद का आख्यान नहीं है। यह तेतरी गाँव और पटौना स्टेशन का आज का सच है। बिहार के किसी जिले का सच। वहाँ की छीजती भाषा और संस्कृति का सच। स्त्री मुक्ति के शहरी आडम्बर का गँवई, पिछड़ा और दुखद सच। मोहब्बत के नाश का सच। प्रकृति से अलगाव का सच। लोकतंत्र के प्राण-पखेरू उड़ने की आशंका का सच। जो प्रीतिकर नहीं उसे ओझल कर देने का सच। उन अँधेरे कोनों का सच जो पारम्परिक रूप से पुरानी और बेकाम हो गई चीजों को फेंकने से पहले कुछ देर छिपा देने के लिए हुआ करते थे। लेकिन आज लोकतंत्र ने अपने तईं ऐसी व्यवस्था कर दी है कि हम सबने अपनी सुविधानुसार, अपने घरों, मोहल्लों के अलावा सार्वजनिक इस्तेमाल के स्पेसेस में भी वे अँधेरे कोने ‘डंपिंग ग्राउंड’ तैयार कर लिए हैं जहाँ हम बहुत आसानी से बेमोल चीजों को फेंक कर आ सकते हैं।</p>
<p>ऐसे में गायब हो गए विदो बाबू को कैसे ढूँढ़े नागो, गोकि उसे फरियाद करनी है और फरियाद करने का माद्दा तो सिर्फ उस साहसी बूढ़े के पास था—यही सच है आज का—देखिए न यह जादुई विकास का कैसा अद्भुत खेल है कि हमने अपने एक्टिविस्टों, समाज सुधारकों, को ही अँधेरे कोने में डाल दिया है।</p>
<p>—वन्दना राग
ISBN: 9788119092000
Pages: 16
Avg Reading Time: 1 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Vaikukam Mohammad Bashir
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- Description: ''क्या तुमने अपने आप कोई काम करके उसके सुख का अनुभव नहीं किया है? खेती करना...कम-से-कम एक पौधा रोपकर उसका फूल और फल देखना, कोई नई चीज़ तैयार करना, प्यासे भटकते कुत्ते को पानी पिलाना, भूखे आदमी को खाना खिलाना, ऐसा कोई काम...।'' ''आप तो जानते हैं, मैंने सिर्फ़ आदमियों को गोली मारी है। आदमियों का ख़ून पिया है और एक बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी।'' ''फिर?'' ''अच्छा, अब वह भी बता दूँ! मैं इसी रात यहीं से चला जाऊँगा।'' ''कहाँ?'' ''यह मेरा जन्म-स्थान है न! मैं माँ-बाप को ढूँढने की कोशिश करूँगा। हर घर में जाकर, हर औरत से पूछूँगा—'क्या तुम मेरी माँ हो? क्या तुम्हीं ने मुझे मेरे पैदा होते ही चिथड़ों में लपेटकर चौराहे के अँधेरे में डाल दिया था?' मरने के बाद भी मैं भयंकर प्रेत बनकर रात में हर घर में जाकर, आँखें फाड़कर दरवाजा खटखटाऊँगा।'' —इसी पुस्तक से
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