Jaankidas Tejpal Mansion

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जयगोविन्द 1970 के दशक में अमेरिका से पढ़कर कलकत्ता लौट आया एक कम्प्यूटर इंजीनियर है। वह अपना एक जीवन जयदीप के रूप में अपने अधूरे उपन्यास में जीता है, तो दूसरा जीवन नक्सलबाड़ी आन्दोलन से लेकर भारत के एक बड़े बाज़ार में बदलने या ‘नेशन स्टेट’ से ‘रीयल इस्टेट’ बनने के यथार्थ में। विडम्बना यह नहीं है कि जयगोविन्द का जीवन जयदीप से असम्पृक्त है; बल्कि यह है कि दोनों को अलग करना मुश्किल है। फ़र्क़ इतना भर है कि एक वस्तुनिष्ठ आत्मकथा लिखने की कोशिश में बार-बार अपने को बचाने की मुहिम चली आती है, जो अपने ही लिखे को नहीं मानती। इसी क्रम में आज़ादी के बाद इस देश की जवान हुई पहली पीढ़ी को मिले धोखे और नाकाम 'सिस्टम’ की दास्तानें अमेरिका के वियतनाम-युद्ध से लेकर विकीलीक्स के धोखे तक फैली हैं। ‘अमेरिका’ इस उपन्यास में एक ‘मोटिफ़’ की तरह है जिसमें विस्थापन के कई स्तर हैं—वहाँ कुछ साल बिताकर लौटा जयदीप है जो न इधर का है न उधर का; उसके एन.आर.आई. मित्र हैं जो इंफ़ेक्शन के डर से इंडिया नहीं आते; वे हैं जो लौटने के लिए तड़प रहे हैं; उसका बेटा रोहित है जो इंडिया को चिड़ियाघर कहता है। सड़क पर गुज़रती हर बस के साथ हिलता 'जानकीदास तेजपाल मैनशन’ एक नया अर्थ-संकेत है—पूरे देश का, जिसका ढहाया जाना तय है। राजनीति, प्रशासन, पुलिस और पूँजी के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमज़ोर को सबसे पहले बेदख़ल करने में लगा हुआ है।

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ISBN
9788126727735
Pages
184
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

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जयगोविन्द 1970 के दशक में अमेरिका से पढ़कर कलकत्ता लौट आया एक कम्प्यूटर इंजीनियर है। वह अपना एक जीवन जयदीप के रूप में अपने अधूरे उपन्यास में जीता है, तो दूसरा जीवन नक्सलबाड़ी आन्दोलन से लेकर भारत के एक बड़े बाज़ार में बदलने या ‘नेशन स्टेट’ से ‘रीयल इस्टेट’ बनने के यथार्थ में। विडम्बना यह नहीं है कि जयगोविन्द का जीवन जयदीप से असम्पृक्त है; बल्कि यह है कि दोनों को अलग करना मुश्किल है। फ़र्क़ इतना भर है कि एक वस्तुनिष्ठ आत्मकथा लिखने की कोशिश में बार-बार अपने को बचाने की मुहिम चली आती है, जो अपने ही लिखे को नहीं मानती। इसी क्रम में आज़ादी के बाद इस देश की जवान हुई पहली पीढ़ी को मिले धोखे और नाकाम 'सिस्टम’ की दास्तानें अमेरिका के वियतनाम-युद्ध से लेकर विकीलीक्स के धोखे तक फैली हैं।

‘अमेरिका’ इस उपन्यास में एक ‘मोटिफ़’ की तरह है जिसमें विस्थापन के कई स्तर हैं—वहाँ कुछ साल बिताकर लौटा जयदीप है जो न इधर का है न उधर का; उसके एन.आर.आई. मित्र हैं जो इंफ़ेक्शन के डर से इंडिया नहीं आते; वे हैं जो लौटने के लिए तड़प रहे हैं; उसका बेटा रोहित है जो इंडिया को चिड़ियाघर कहता है।

सड़क पर गुज़रती हर बस के साथ हिलता 'जानकीदास तेजपाल मैनशन’ एक नया अर्थ-संकेत है—पूरे देश का, जिसका ढहाया जाना तय है। राजनीति, प्रशासन, पुलिस और पूँजी के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमज़ोर को सबसे पहले बेदख़ल करने में लगा हुआ है।

Book Details

  • ISBN
    9788126727735
  • Pages
    184
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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