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Bimal Mitra, Virendranath MandalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
1200
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‘ख़रीदी कौड़ियों के मोल’ बांग्ला का वृहत्तम और अन्यतम उपन्यास है। दीपंकर इस उपन्यास का नायक है : राष्ट्रीय और सामाजिक बवंडर में फँसी मानवता और युग-यंत्रणा का प्रतिनिधि। उसके अघोर नाना ने कहा था कि कौड़ियों से सब कुछ ख़रीदा जा सकता है। नाना के कथन का सबूत मिस्टर घोषाल, मिस्टर पालित, नयनरंजिनी, छिटे, फोटा, लक्ष्मी दी आदि ने देना चाहा, परन्तु दीपंकर का आदर्शबोध उनके मतवाद से टकराकर रह गया। दीपंकर के जीवन ने प्रमाण दिया कि पैसे से सुख नहीं ख़रीदा जा सकता। फिर भी दीपंकर का जीवन ऊपर से देखने में सुखी नहीं है। मामूली क्लर्क से वह रेलवे का बहुत बड़ा ऑफ़िसर बना, लेकिन अन्त तक उसे जीवन के जुलूस से कटकर अज्ञातवास है। इस ट्रेजेडी का कारण है कलयुग। इस युग में रामराज्य की स्थापना असम्भव है, और रावणराज्य की स्थापना स्वाभाविक। इसीलिए इस उपन्यास का रावण, मिस्टर घोषाल, जेल से निकलकर और अधिक शक्तिशाली बन गया और आवारा फोटा खद्दर ओढ़कर कांग्रेस का बड़ा नेता फटिक बाबू। सती मानवी आकांक्षा की मूर्ति है तो उसका पति सनातन बाबू सच्चाई और आदर्श का प्रतीक। परन्तु आज सच्चाई अपंग और आदर्श नपुंसक है। इसलिए सती का सर्वनाश होकर रहा। सीता का सर्वनाश वाल्मीकि नहीं टाल सके तो सती का सर्वनाश बिमल बाबू कैसे रोक पाते! बांग्ला का यह महान् उपन्यास हर हिन्दी पाठक के लिए पठनीय है। इसके अनुवाद की विशेषता यह है कि मूल को अविकल रखा गया है और बांग्ला उपन्यासों के हिन्दी रूपान्तर में प्राय: जो अर्थ का अनर्थ होता है, उससे यह सर्वथा मुक्त है।
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‘ख़रीदी कौड़ियों के मोल’ बांग्ला का वृहत्तम और अन्यतम उपन्यास है।
दीपंकर इस उपन्यास का नायक है : राष्ट्रीय और सामाजिक बवंडर में फँसी मानवता और युग-यंत्रणा का प्रतिनिधि। उसके अघोर नाना ने कहा था कि कौड़ियों से सब कुछ ख़रीदा जा सकता है। नाना के कथन का सबूत मिस्टर घोषाल, मिस्टर पालित, नयनरंजिनी, छिटे, फोटा, लक्ष्मी दी आदि ने देना चाहा, परन्तु दीपंकर का आदर्शबोध उनके मतवाद से टकराकर रह गया। दीपंकर के जीवन ने प्रमाण दिया कि पैसे से सुख नहीं ख़रीदा जा सकता। फिर भी दीपंकर का जीवन ऊपर से देखने में सुखी नहीं है। मामूली क्लर्क से वह रेलवे का बहुत बड़ा ऑफ़िसर बना, लेकिन अन्त तक उसे जीवन के जुलूस से कटकर अज्ञातवास है। इस ट्रेजेडी का कारण है कलयुग। इस युग में रामराज्य की स्थापना असम्भव है, और रावणराज्य की स्थापना स्वाभाविक। इसीलिए इस उपन्यास का रावण, मिस्टर घोषाल, जेल से निकलकर और अधिक शक्तिशाली बन गया और आवारा फोटा खद्दर ओढ़कर कांग्रेस का बड़ा नेता फटिक बाबू। सती मानवी आकांक्षा की मूर्ति है तो उसका पति सनातन बाबू सच्चाई और आदर्श का प्रतीक। परन्तु आज सच्चाई अपंग और आदर्श नपुंसक है। इसलिए सती का सर्वनाश होकर रहा। सीता का सर्वनाश वाल्मीकि नहीं टाल सके तो सती का सर्वनाश बिमल बाबू कैसे रोक पाते! बांग्ला का यह महान् उपन्यास हर हिन्दी पाठक के लिए पठनीय है। इसके अनुवाद की विशेषता यह है कि मूल को अविकल रखा गया है और बांग्ला उपन्यासों के हिन्दी रूपान्तर में प्राय: जो अर्थ का अनर्थ होता है, उससे यह सर्वथा मुक्त है।
Book Details
-
ISBN9788119133826
-
Pages1336
-
Avg Reading Time45 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इस कोश में अनेक नए शब्दों, प्रमुख पर्वतमालाओं, नद-नदियों, पशु-पक्षी की बोली, हिन्दुओं के प्रमुख देवी-देवता और उपयोगी संक्षेपणों के साथ उच्चारण तथा व्याकरण-प्रयोग...आदि महत्त्वपूर्ण संयोजन है, एक बेहद उपयोगी कोश।
Hamara Shahar Us Baras
- Author Name:
Geetanjali Shree
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आसान दीखनेवाली मुश्किल कृति ‘हमारा शहर उस बरस’ में साक्षात्कार होता है एक कठिन समय की बहुआयामी और उलझाव पैदा करनेवाली डरावनी सच्चाइयों से। बात ‘उस बरस’ की है, जब ‘हमारा शहर’ आए दिन साम्प्रदायिक दंगों से ग्रस्त हो जाता था। आगजनी, मारकाट और तद्जनित दहशत रोज़मर्रा का जीवन बनकर एक भयावह सहजता पाते जा रहे थे। कृत्रिम जीवन-शैली का यों सहज होना शहरवासियों की मानसिकता, व्यक्तित्व, बल्कि पूरे वजूद पर चोट कर रहा था। बात दरअसल उस बरस भर की नहीं है। उस बरस को हम आज में भी घसीट लाए हैं। न ही बात है सिर्फ़ हमारे शहर की। ‘और शहरों जैसा ही है हमारा शहर’—सुलगता, खदकता—‘स्रोत और प्रतिबिम्ब दोनों ही’ मौजूदा स्थिति का। एक आततायी आपातस्थिति, जिसका हल फ़ौरन ढूँढ़ना है; पर स्थिति समझ में आए, तब न निकले हल। पुरानी धारणाएँ फिट बैठती नहीं, नई सूझती नहीं, वक़्त है नहीं कि जब सूझें, तब उन्हें लागू करके जूझें स्थिति से। न जाने क्या से क्या हो जाए तब तक। वे संगीनें जो दूर हैं उधर, उन पर मुड़ीं, वे हम पर भी न मुड़ जाएँ, वह धूल-धुआँ जो उधर भरा है, इधर भी न मुड़ आए। अभी भी जो समझ रहे हैं कि दंगे उधर हैं—दूर, उस पार, उन लोगों में—पाते हैं कि ‘उधर’ ‘इधर’ बढ़ आया है, ‘वे’ लोग ‘हम’ लोग भी हैं, और इधर-उधर वे-हम करके ख़ुद को झूठी तसल्ली नहीं दी जा सकती। दंगे जहाँ हो रहे हैं, वहाँ ख़ून बह रहा है। सो, यहाँ भी बह रहा है, हमारी खाल के नीचे। अपनी ही खाल के नीचे छिड़े दंगे से दरपेश होने की कोशिश ही इस गाथा का मूल। ख़ुद को चीरफाड़ के लिए वैज्ञानिक की मेज़ पर धर देने जैसा। अपने को नंगा करने का प्रयास ही अपने शहर को समझने, उसके प्रवाहों को मोड़ देने की एकमात्र शुरुआत हो सकती है। यही शुरुआत एक ज़बरदस्त प्रयोग द्वारा गीतांजलि श्री ने ‘हमारा शहर उस बरस’ में की है। जान न पाने की बढ़ती बेबसी के बीच जानने की तरफ़ ले जाते हुए।
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