Bedava : Ek Prem Katha
Author:
Tarun BhatnagarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 128
₹
160
Available
रोचक अन्दाज़ में लिखा गया उपन्यास 'बेदावा' आँखों से न देख पानेवालों, ट्रांसजेंडरों और दग़ाबाज़ों की अनदेखी दुनिया के इश्क़ का फ़साना है। हमारे दौर की मज़हबी नफ़रतों और दुश्वारियों से भिड़ते उन लोगों की कहानी है जो हार नहीं मानते। यह किताबों और रौशनियों की कहानी है। इश्क़ का ऐसा क़िस्सा है जो आदमी और औरत के इश्क़ से अलहदा इंसानियत के फ़लसफ़े को गढ़ता है। इसमें अत्याधुनिक कॉलेज के कैम्पस हैं तो जंगलों की अनजान दुनिया। स्पेन का कोई आधुनिक क़स्बा है तो हमारे यहाँ की भीड़ और शोर-शराबे से भरा कोई गली-मुहल्ला। यह प्यार को खोने और पा जाने के दरमियान की बेचैनियों, ख़्वाबों और उम्मीदों का एक शानदार वाक़या है।
ISBN: 9789389598117
Pages: 160
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘क़िस्सागो’ मारियो वार्गास ल्योसा के सबसे महत्त्वाकांक्षी उपन्यासों में से एक है। यह लातिन अमरीकी देश पेरु के एक प्रमुख आदिवासी समूह के इर्द-गिर्द घूमता है। आदिवासी जीवन-दृष्टि और हमारी आज की आधुनिक सभ्यता के बरक्स उसकी इयत्ता को एक बड़े प्रश्न के रूप में खड़ा करनेवाला यह सम्भवतः अपनी तरह का अकेला उपन्यास है। मिटने-मिटने की कगार पर खड़े इन समाजों के पृथ्वी पर रहने के अधिकार को इसमें बड़ी मार्मिक और उत्कट संवेदना के साथ प्रस्तुत किया गया है।
एक साथ कई स्तरों पर चलनेवाले इस उपन्यास में एक तरफ़ आधुनिक विकास की उत्तेजना में से फूटे तर्क-वितर्क हैं तो दूसरी तरफ़ नदी, पर्वत, सूरज, चाँद, दुष्ट आत्माओं और सहज ज्ञानियों की एक के बाद एक निकलती कथाओं का अनवरत सिलसिला है।
विषम परिस्थितियों से जूझते, बार-बार स्थानान्तरित होने को विवश, टुकड़ों-टुकड़ों में बँटे माचीग्वेंगा समाज को जोड़नेवाली, उनकी जातीय स्मृति को बार-बार जाग्रत् करनेवाली एकमात्र जीती-जागती कड़ी है ‘क़िस्सागो’ यानी ‘आब्लादोर’। यह चरित्र उपन्यास के समूचे फलक के आर-पार छाया हुआ है। इस उपन्यास का रचयिता स्वयं एक किरदार के रूप में उपन्यास के भीतर मौजूद है। वह और यूनिवर्सिटी के दिनों का उसका एक अभिन्न मित्र साउल सूयतास आब्लादोर की केन्द्रीय अवधारणा के प्रति तीव्र आकर्षण महसूस करते हैं, पर उसे ठीक-ठीक समझ नहीं पाते। वे एक दूसरे से अपने इस सबसे गहरे ‘पैशन’ को छुपाते हैं जो अन्ततोगत्वा उनके जीवन की अलग-अलग किन्तु आपस में नाभि-नाल सम्बन्ध रखनेवाली राहें निर्धारित करता है। एक उसमें अपने उपन्यास का किरदार तलाशता भटकता है तो दूसरा स्वयं वह किरदार बन जाता है। यह उपन्यास इस अर्थ में एक आत्मीय सहचर के लिए मनुष्य की अनवरत तलाश या भटकन की कथा भी
है।उपन्यास यथार्थ और मिथकीय, समसामयिक और प्रागैतिहासिक के ध्रुवीय समीकरणों को एक साथ साधने का सार्थक उपक्रम है। आज भारत में आदिवासी समाजों की स्थिति को लेकर चलती बहस के मद्देनज़र सम्भवतः यह उपन्यास हमारे लिए विशेष प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण हो उठता है।
Kandho Par Ghar
- Author Name:
Pragya
- Book Type:

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Description:
काँधों पर घर दूर-दराज़ के इलाकों से अपने सपनों की गठरी बाँधकर दिल्ली आए लोगों की अनेक कहानियाँ कहता उपन्यास है। एक जीवन में अनेक पहचानों और अनेक संघर्षों से जूझते लोग इसमें नज़र आएँगे।
पूनम इन्हीं में से एक है जो अपने सूरज का हाथ थामकर बदायूं से दिल्ली चली आई। शहर के जीवन ने पूनम को एक सपना सौंपा और साथ सौंपा उसके सपने को अपना मानने वाले लोगों का अटूट भरोसा। इस तरह एक सपने में अचानक कई-कई सपने झांकने लगे। जीवन के आंधी-तूफान में पूनम ने एक छोटा-सा सपना साकार किया पर सपने और हकीकत के बीच संघर्षों का दरिया तेज़ तूफान लिए था। इन लोगों के पांव तले जमीन कच्ची थी पर पूनम, फरीदा, सुगंधा, मुनमुन, नेचू, पंकज और सूरज का हौसला पक्का था। ये ऐसे ही ज़िन्दादिल लोगों की कहानी है जो एक से दो, दो से तीन और आगे बढ़ते-बढ़ते एक काफिला बनाते चलते गए। अपने खून-पसीने से जिन्होंने दूसरों के लिए स्वर्ग रचे। ऐसे लोग जो शहर को शहर बनाते हैं पर शहर का भरा-पूरा आसमान अक्सर ज़मीन के इन लोगों की तरफ देखता भी नहीं।
ये कहानी दिल्ली के उस यमुना पुश्ते की कहानी है जिसका अपना एक इतिहास रहा है। वे लाखों लोग पुश्ते से हटाकर कहीं और बसा दिए गए पर वीरान पुश्ते में दबी आवाज़ें उस पूरे संसार को सामने ले आती हैं जो जीवन के आरोह-अवरोह की जीवंत शरणस्थली था। इनका जीवन जैसे विस्थापन के एक चक्र में उलझा रहता है। एक विस्थापन समाप्त होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है।
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