Infocorp Ka Karishma
Author:
Pradeep PantPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Unavailable
सिद्धान्त यह कि कोई सिद्धान्त नहीं। नीति यह कि अनीति भी उचित। नैकितता यह कि अनैतिकता से कोई परहेज़ नहीं। यदि सत्ता के लिए असत्य ही सत्य हो जाए तो उसका दंश समाज में हर किसी को झेलना पड़ता है। अव्यवस्था का पर्याय बनी राजनीतिक व्यवस्था को केवल अपनी चिन्ता रहती है, जिसके चलते सन्धियाँ-दुरभिसन्धियाँ उसकी प्राथमिकता बन जाती हैं। ऐसी ही सर्वग्रासी स्थितियों को रेखांकित करता है सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रदीप पंत का उपन्यास ‘इन्फोकॉर्प का करिश्मा’, जिसमें वे सब हैं जो अपने-अपने ढंग से सत्ता-व्यवस्था को नियंत्रित करते हैं अथवा नियंत्रित करने की कोशिश में लगे रहते हैं और अपने साथियों-समर्थकों के साथ मिलकर स्वार्थों की सफलता के लिए समवेत प्रार्थना करते हुए आगे बढ़ते हैं। लेकिन घात-प्रतिघात की कुटिल चालों में यहाँ केवल अपने प्रतिद्वन्द्वियों को ही नहीं, वक़्त-ज़रूरत अपने निकटस्थों को भी क्रूरतापूर्वक ध्वस्त करने की तत्परता दिखाई पड़ती है, क्योंकि यहाँ न कोई स्थायी मित्र है और न बन्धु-बान्धव।</p>
<p>उपन्यास का यथार्थ प्रायः रचनाकार की कल्पना, और कई बार अतिकल्पना, से उभरता है, किन्तु ‘इन्फोकॉर्प का करिश्मा’ महज़ कल्पना अथवा अतिकल्पना नहीं है। इस कृति में कल्पना और अतिकल्पना केवल उसी सीमा तक है, जिस सीमा तक यथार्थ को अधिकाधिक धारदार और विश्वसनीय बनाने की ज़रूरत है।</p>
<p>प्रदीप पंत के भाषिक विन्यास में एक अद्भुत खिलंदड़ापन है। यह खिलंदड़ापन उपन्यास की संरचना को एक निश्चित तेवर देते हुए पात्रों के चरित्र को पर्त-दर-पर्त उघाड़ता चलता है।</p>
<p>सम्पूर्ण उपन्यास में अनेक पात्र अपने-अपने रहस्यलोक में बैठे हुए अपने-अपने ढंग से षड्यंत्र रचते नज़र आते हैं और ये षड्यंत्र ऊपरी तौर पर भले ही एक-दूसरे के विरुद्ध हों, किन्तु अपनी सम्पूर्णता में जन-सामान्य के ख़िलाफ़ हैं। इसीलिए अन्त तक पहुँचते-पहुँचते नज़र आने लगता है कि उपन्यास का कथ्य अपनी समग्रता में कॉमिक से कहीं अधिक ट्रैजिक है। कहना न होगा कि एक सफल कामदी का अन्त त्रासदी से ही होता है। यही उसका निर्णायक मोड़ होती है और कथावस्तु की जीवन्तता, शिल्पगत और भाषायी वैभव तथा निरन्तर चलती क़िस्सागोई के उपकरणों से प्रदीप पंत ने यही किया है—एक करिश्मे के आख्यान की रचना। ऐसा आख्यान जो केवल सत्ता-विमर्श ही नहीं, वरन् सत्ता का मर्सिया भी है।
ISBN: 9788126711338
Pages: 351
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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दो-दो बार वसन्त आता है इसमें, दो-दो बार खिलती हैं आकाश चम्पा की कलियाँ–जिन्दगी की तरह। एक बार जो जीवन जिया उसमें कितना कुछ जीने से रह गया, जिस-जिस मोड़ पर मुड़ना था, नहीं मुड़े, जहाँ पलटकर पीछे देखना था नहीं देखे, जहाँ ठहरना था, नहीं ठहरे। सो, आकाश चम्पा उन भूलों को सुधारती है, पहली बार जिन डालों में फूल नहीं आये होते, दूसरी बार उन डालों पर भी फूल खिलते हैं।
गहन अनुभूतियों की बारीक बुनावट से रचा गया संजीव का यह नवीनतम उपन्यास मनुष्य की इस आदिम आकांक्षा का ऐसा मार्मिक आख्यान है, जिसमें व्यक्ति-जीवन के कोण से इतिहास, नियति, रिश्ते और संघर्ष के उन तमाम सवालों की पड़ताल की गई है, जो हमारे समय के विमर्श के केन्द्र में हैं। इन अर्थों में यह उपन्यास महज आख्यान नहीं रह जाता, बल्कि अपने समय से एक दुर्धर्ष टकराहट के रूप में पृष्ठ-दर-पृष्ठ ध्वनित होता है। संजीव ने इस उपन्यास में अपने दिक्काल का ऐसा निर्मम विवर्तन किया है, जिसे अन्यत्र देख पाना कठिन है।
विवर्तन की प्रक्रिया में लेखक की नजर निरन्तर इतिहास के अन्दर विलम्बित और निलम्बित पड़े सवालों और इतिहास के बाहर छूटे हुए लोगों तक जाती है। सामाजिक अवक्षय ने भले ही मनुष्य को हताश कर दिया हो, पर इस स्थिति में भी उसके हृदय के कोने में यह आकांक्षा अपनी पंखुड़ियाँ खोलने से नहीं चूकती कि क्या भूलों का फिर से संशोधन हो सकता है? इस तरह संजीव नियति नहीं नियन्ता की कथा कहते हैं, उस नियन्ता मनुष्य की जिसने अपनी जिजीविषा को आत्मसंघर्ष की ताकत से मूर्त किया है और अपने मुक्तिस्वप्न को एक ही जीवन में दो बार सम्भव किया है। उपन्यास की आनुषंगिक उपलब्धि है एक वर्जित पर मार्मिक प्रेम प्रसंग, जिसकी स्निग्धता और सुरभि उपन्यास में एक नया आयाम जोड़ती है।
Krantikakka Ki Janm-Shatabdi
- Author Name:
Ravindra Verma
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Description:
यह उपन्यास जिस समय में अवस्थित है, वह 1857 की डेढ़ सौवीं जयन्ती के आस-पास है। इसी समय क्रान्ति कक्का की जन्म-शताब्दी भी है। युवा कक्का झाँसी में चन्द्रशेखर आज़ाद के क्रान्ति के हेडक्वार्टर के सदस्य थे जब आज़ाद काकोरी कांड के बाद इस शहर में कुछ बरस भूमिगत रहे। शिक्षक कक्का रिटायर होकर अपने दूर के भतीजे के साथ आ गए थे। झाँसी का यह मध्यवर्गीय घर इस भूमंडलीकृत समय में मध्यवर्गीय विडम्बनाओं का केन्द्र बन जाता है : इसके एक छोर पर क्रान्ति कक्का हैं जिनकी स्मृति में अपने क्रान्तिकारी दल के नौजवानों की यह शर्त है कि कौन पहले देश पर क़ुर्बान होगा; दूसरे छोर पर कक्का का प्यारा पोता है जिसके दिल्ली के पास स्थित पानी के कारखाने की बोतलों पर झाँसी की रानी की तस्वीर है—इस तस्वीर में घोड़े पर बैठी रानी का चेहरा अभिनेत्री रानी मुखर्जी का बिकाऊ चेहरा है! इसी नव-उदारवादी प्रपंच में कक्का का दूसरा पोता दिल्ली में ही अपनी नौकरी खो देता है, क्योंकि वह जिस पुरानी कपड़े की मिल में काम करता है, वह सोने के भाव बिक जाती है ताकि उस ज़मीन पर मॉल खड़ा हो सके। इसी बेकार बाप का इकलौता पुत्र अमरीका पहुँचकर स्वायत्त हो जाता है।
यह इस भूमंडलीकृत दौर में एक पुराने मध्यवर्गीय परिवार के टूटने का आख्यान है, जैसे कोई आज़ादी का शीराज़ा बिखर रहा हो। यहाँ इसी दौर की नव-औपनिवेशिक त्रासदी की आहें और कराहें हैं।
यह भारतीय नव-उदारवाद की आभ्यन्तरीकृत कथा है।
Godan
- Author Name:
Premchand
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Description:
‘गोदान’ का नायक होरी है।
ज़मींदार और महाजन में भेद करते हुए वह बताता है—“ज़मींदार तो एक ही है; मगर महाजन तीन-तीन हैं, सहुआइन अलग, मँगरू अलग और दातादीन पंडित अलग।” पाँच साल हुए होरी ने मँगरू साह से साठ रुपए उधार लिए थे बैल लाने के लिए। उसमें से वह साठ दे चुका था; परन्तु वह साठ रुपए अब भी बने हुए थे। दातादीन पंडित से उसने तीस रुपए लिए थे आलू बोने के लिए। दुर्भाग्य से आलू चोर खोद ले गए परन्तु उन तीस रुपयों के तीन सौ हो गए। दुलारी विधवा सहुआइन नोन-तेल-तमाखू की दुकान करती थी; इकन्नी रुपया का ब्याज लेती थीं। इनके भी सौ रुपए हो गए थे। फ़सल होते ही माल सब महाजनों को तौल देना पड़ता और ब्याज फिर बढ़ने लगता। तमाशा यह कि एक समय होरी ने भी महाजनी की थी जिससे लोग समझते थे कि उसके पास अब भी दबा हुआ रुपया है।...
—डॉ. रामविलास शर्मा
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