Barkha Rachai
Author:
Asghar WajahatPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 360
₹
450
Available
विमर्शों के इस दौर में भी असग़र वजाहत जीवन को समझने के लिए उसे टुकड़ों में नहीं बाँटते और न किसी फ़ॉर्मूले के अन्तर्गत सुझाव और समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे जीवन को उसकी पूरी जटिलता और प्रवाह के साथ सामने लाते हैं। उनका मानना है कि जीवन को समग्रता में ही समझा जा सकता है। इस तरह प्रस्तुत उपन्यास ‘बरखा रचाई’ किसी विमर्श का ठप्पा लगाए बिना ठोस जीवन से जुड़ी बहुत-सी समस्याओं को सामने लाता है।</p>
<p>उपन्यास में एक ऐसे जीवन के दर्शन होते हैं जो लगातार प्रवाह में है। उनके रूपों, रंगों, कोणों से इस जीवन को देखने और समझने का प्रयास ही इसे महत्त्वपूर्ण बनाता है।</p>
<p>उपन्यास का फलक बहुत व्यापक है। दिल्ली के राजनीतिक जीवन की झलकियों के साथ पत्रकार जीवन की झाँकियाँ, मध्यवर्गीय समाज में स्त्री की स्थिति, महानगर के बुद्धिजीवियों की ऊहापोह, गाँव के बदलते सम्बन्ध, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिलता, विवाह और विवाहेतर सम्बन्ध, छोटे शहरों का बदलता जीवन और वहाँ राजनीति तथा अपराध की बढ़ती भूमिका जैसे प्रसंग उपन्यास में आए हैं।</p>
<p>उपन्यास में न तो वैचारिक पूर्वग्रह और न किसी विशेष ‘शिल्प कौशल’ का दबाव स्वीकार किया गया है। पात्र स्वयं अपनी वकालत करते हैं। लगता है, पात्रों की गति और प्रभाव इतना अधिक हो गया है कि वे उपन्यास के समीकरण को खंडित कर देंगे, पर यह सब बहुत स्वाभाविक ढंग से सामने <br />आता है।</p>
<p>असग़र वजाहत अपनी ‘क़िस्सागोई’ के लिए विख्यात हैं। उन्होंने दास्तानों और कथाओं से जो कुछ हासिल किया है, उसका भरपूर इस्तेमाल अपनी कथाओं में किया है। जिस तरह क़िस्सा सुनानेवाला अपने श्रोता की अनदेखी नहीं कर सकता, उसी तरह वजाहत अपने पाठक की अनदेखी नहीं <br />करते।</p>
<p>‘बरखा रचाई’ केवल घटनाओं का पिटारा नहीं है। यह जीवन को समझने की एक कोशिश भी है। सत्ता, समाज और व्यक्ति के त्रिकोण की गहन व्याख्या भी पाठक को प्रभावित करती है।
ISBN: 9788126717361
Pages: 232
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘शेखर : एक जीवनी’ को कुछ वैचारिक हलक़ों में आत्म-तत्त्व के बाहुल्य के कारण आलोचना का शिकार होना पड़ा था। साथ ही अपने समय के नैतिक मूल्यों के लिए भी इसे चुनौती की तरह देखा गया था। लेकिन आत्म के प्रति अपने आग्रह के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि ‘शेखर’ समाज से विलग, या उसके विरोध में खड़ा हुआ कोई व्यक्ति है। अगर ऐसा होता तो शेखर अपने समय-समाज के ऐसे-ऐसे प्रश्नों से नहीं जूझता जो उस समय स्वाधीनता आन्दोलन के नेतृत्वकारी विचारकों-चिन्तकों के लिए भी चिन्ता का मुख्य बिन्दु नहीं थे, मसलन—जाति और स्त्री से सम्बन्धित प्रश्न।
जैसा कि स्वयं अज्ञेय ने संकेत किया है, शेखर अपने समय से बनता हुआ पात्र है। वह परिस्थितियों से विकसित होता हुआ और परिस्थितियों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखता हुआ पात्र है।
उपन्यास के प्रथम भाग में जिस तरह से शेखर का मनोविज्ञान, उसके अन्तस्तल के निर्माण की प्रक्रिया उद्घाटित हुई है, उसी आवेग और सघनता के साथ इस दूसरे भाग में शेखर के वास्तविक जीवनानुभवों का वर्णन किया गया है। कहना न होगा कि 'शेखर एक जीवनी’ की बुनावट में ‘पैशन’ की वैसी ही उच्छल धारा प्रवाहित है जैसी, हमारे जीवन में होती है। अपने औपन्यासिक वितान में ‘शेखर : एक जीवनी’ इसीलिए एक कालजयी कृति के रूप में मान्य है।
Andha Ullu
- Author Name:
Sadegh Hedayat
- Book Type:

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ईरान के ही नहीं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिने जाने वाले उपन्यास ‘अन्धा उल्लू’ का लेखन इसके लेखक ने बम्बई में अपने भारत प्रवास के दौरान किया था।
एक हताश व्यक्ति के भीतरी अँधेरे और उसे चारों तरफ़ से भींचकर रखे रहने वाली दुनिया के प्रति उसका क्षोभ इस उपन्यास के शब्द-शब्द में बिंधा है जिसे सुपरिचित कथाकार नासिरा शर्मा ने बड़े मनोयोग से मूल फ़ारसी से हिन्दी में प्रस्तुत किया है।
अपने असंगत अतियथार्थ में यह उपन्यास जहाँ हमें ख़ुद से दूर की कोई चीज़ लगता है, वहीं अपने उन्हीं विवरणों और प्रतिक्रियाओं में अपने बहुत क़रीब भी लगता है। संवेदनहीन ज्यामितिक आकृतियों से घिरे हमारे आधुनिक मनोजगत का वह स्याह विस्तार इसमें अंकित हुआ है, जहाँ पाँव रखने का साहस हम अक्सर नहीं कर पाते।
अथाह निराशा, भयावह दुःस्वप्नों, घोर अकेलेपन और मृत्युबोध के हौलनाक चित्रण के चलते ईरान में इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध भी लगा जिसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि इसे पढ़ने के बाद कुछ पाठकों ने अपना जीवन समाप्त करने के प्रयास भी किए। लेकिन इस उपन्यास में अभिव्यक्त सचाई को नकार पाना कभी सम्भव नहीं हुआ और समय के साथ ‘अन्धा उल्लू’ हरेक सजग संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक अपरिहार्य पाठ के तौर पर अधिक से अधिक मान्य होता गया।
Sukhi Mrityu
- Author Name:
Albert Camus
- Book Type:

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एक लोकप्रिय लेखक होने के साथ-साथ कामू एक महान चिन्तक भी थे। जीवन-भर वे अपनी आत्मा और प्रतिभा की पूरी शक्ति से, विचार के पूर्ण प्रयास तथा अन्तरात्मा की वेदना से अपने समय की जटिल व यातनाप्रद समस्याओं में उलझे रहे। उनकी रचनाओं में मानव की आत्मा के विद्रोह, सच्चे सुख के रहस्य की खोज और सत्य का मूल रूप जानने की चिर-अतृप्त जिज्ञासा बहुत गम्भीरता से व्यक्त हुई है। ‘सुखी मृत्यु’ उपन्यास भी जीवन-सुख और उसी में निहित मृत्यु-सुख को समझने के प्रयास का विवरण है।
जीवन में सुख प्राप्त करना जिससे कि मृत्यु भी एक सुखद अनुभव रहे; ऐसा सम्पूर्ण सुख कैसे मिले? यही इस उपन्यास की केन्द्रीय समस्या है। उपन्यास का पहला भाग जीवन की इस समस्या का अदीप्त, अस्पष्ट पहलू हमारे सामने रखता है जब नायक के पास न तो मानसिक परिपक्वता है, न आर्थिक क्षमता और न ही समय। दूसरा भाग उसके मन के सुख, शान्ति और आन्तरिक आनन्द को प्रस्तुत करता है।
कहा जाता है कि कामू के अत्यन्त चर्चित उपन्यास ‘अजनबी’ का अंकुर ‘सुखी मृत्यु’ उपन्यास में ही संहत है।
Sunner Pande Ki Patoh
- Author Name:
Amarkant
- Book Type:

- Description: प्रसिद्ध उपन्यासकार अमरकान्त का यह उपन्यास पति द्वारा परिव्यक्त राजलक्ष्मी नाम की उस स्त्री की कहानी है जो न केवल नर-भेड़ियों से भरे समाज में अपनी अस्मत बचा के रखती है, बल्कि कुछ लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। विवाह होते ही उसका निजत्व तिरोहित हो जाता है और नया नाम मिलता है—सुन्नर पांडे की पतोह। सुन्नर पांडे की पतोह का पति झुल्लन पांडे एक दिन उसे छोड़कर कहीं चला जाता है और फिर लौटकर नहीं आता। अन्तहीन प्रतीक्षा के धुँधलके में जीती राजलक्ष्मी के पास पति की निशानी सिन्दूर बचा रहता है। औरत की इच्छाओं, हौसलों और अधिकारों से वंचित होने पर भी उसे सिन्दूर ही औरत होने का गर्व और गरिमा देता है। वस्तुतः पहले सिन्दूर का मतलब था पति, बाद में पति का मतलब सिन्दूर हो गया। लेकिन एक रात जब उसने अपनी सास-ससुर की बातें सुनीं तो जैसे पाँवों-तले की ज़मीन ही खिसक गई। जब घर में ही स्त्री की अस्मत असुरक्षित हो तो कोई स्त्री क्या करे! वह अन्ततः गाँव-घर, देवी-देवता, चिरई-चुरंग, नदी-पोखर सबको अन्तिम प्रणाम कर अनजानी राह पर चल पड़ी...। निम्नमध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनाओं और एक परित्यक्त स्त्री की जिजीविषाओं का बेहद प्रभावशाली और अन्तरंग चित्रण से लबरेज़ यह उपन्यास अपने जीवन्त मानवीय संस्पर्श के कारण एक उदात्त भाव पाठकों के मन में भरता चलता है। लोकजीवन के मुहावरों और देशज शब्दों के प्रयोग से भाषा में माटी का सहज स्पर्श और ऐसी सोंधी गन्ध महसूस होती है जो पाठकों को निजी लोक के उदात्त क्षेत्रों में ले आती है। निश्चय ही यह कृति पाठकों के मन में देर तक और दूर तक रची-बसी रहेगी।
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