Shahanshah Akbar : Ek Anmol Virasat
Author:
Pradeep GargPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 520
₹
650
Available
यह उस शख़्स की कहानी है जिसके बारे में छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने पत्र में मुग़ल बादशाह औरंगजेब को लिखा था : साम्राज्य का वह शिल्पकार जिसने सभी धर्मों के लिए सद्भाव की सुलह-कुल नीति अपनाई; उसके उदारचेता हृदय की चाहत थी सभी लोगों का पोषण करना व उन्हें सुरक्षा देना। लिहाजा वह जगत गुरु के नाम से मशहूर हुआ।</p>
<p>जिस शख़्स के बारे में मुंशी प्रेमचन्द ने लिखा : यह उसके प्रयासों का ही का सुफल था कि हिन्दू-मुसलमान कई शताब्दियों तक बहुत ही मेल-मिलाप के साथ रहे।</p>
<p>जिस शख़्स का ज़िक्र करते हुए महापंडित राहुल सांकृत्यायन यह दावा करते हैं : अशोक और गांधी के बीच में उनकी जोड़ी का एक ही पुरुष हमारे देश में पैदा हुआ—वह अकबर था।
ISBN: 9788119996537
Pages: 632
Avg Reading Time: 21 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: ‘आग्नेय वर्ष’ फ़ेदिन की प्रसिद्ध उपन्यास-त्रयी के पहले उपन्यास ‘पहली उमंगें’ के पात्रों से हम जहाँ विदा लेते हैं, उसके कई वर्ष बाद, अक्टूबर क्रान्ति के भी दो वर्ष बाद, हमारी मुलाक़ात फिर उन्हीं पात्रों से एकदम नए परिवेश में होती है—‘आग्नेय वर्ष’ उपन्यास में। उपन्यास की शुरुआत में एक रूसी सैनिक जर्मन युद्धबन्दी शिविर से भागकर रूस पहुँचता है जहाँ क्रान्ति के बाद गृहयुद्ध की आग धधक रही है। लौटनेवालों में इज्वेकोव और रागोजिन भी हैं। सरातोव में उनकी मुलाक़ात पुराने दोस्तों और दुश्मनों से होती है। युद्ध और क्रान्ति के गुज़रे हुए दिनों ने सबके जीवन पर अलग-अलग ढंग से अमिट छापें छोड़ी हैं। उपन्यास में रागोजिन और इज्वेकोव—एक मज़दूर और एक बुद्धिजीवी बोल्शेविक का अन्तर्भेदी चित्रण प्रस्तुत किया गया है। दोनों ही एक शक्तिशाली ऐतिहासिक आन्दोलन की उपज हैं और नेता भी। दोनों ऐसे इंसान हैं जिनकी गहन-गम्भीर आन्तरिक दुनिया का उन अभूतपूर्व सामाजिक कार्यभारों के साथ पूरा सामंजस्य है, जो उनके सामने खड़े हैं। उपन्यास कला की दुनिया के उन बुद्धिजीवी सदस्यों का भी जीवन्त चित्र उपस्थित करता है जो स्वयं को वर्ग-पूर्वाग्रहों से मुक्त करते हैं और नए रूस के जीवन में भागीदारी करते हैं।
Line Paar
- Author Name:
Jean Dreze +1
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Description:
अनिल सिंह लन्दन में रहते हैं और पेशे से बैंकर हैं। उनकी एक महिला मित्र है पैट, जो लम्बे समय से भारत जाने की ख़्वाहिश पाले हुए है। एक दिन उन्हें ख़बर मिलती है कि उनके चाचा की मौत हो गई है, जो उत्तर भारत स्थित पालनपुर नाम के गाँव में रहते थे। अब वे ही उनकी जायदाद के इकलौते वारिस हैं। पैट के आग्रह पर अनिल भारत जाने का फ़ैसला कर लेते हैं। उनके मन में जमीन-जायदाद अपने नाम करवाने के साथ-साथ उस देश को भी थोड़ा अच्छे से जान लेने की इच्छा है जहाँ से उनके माता-पिता आए थे। फ़ोटोग्राफ़ी के शौक़ीन अनिल अपने साथ अपना कैमरा भी ले जाते हैं। उनके मन में खेती करने का ख़याल भी घुमड़ रहा होता है। गाँव के रास्ते में अनिल को पता चलता है कि उनके चाचा की तो हत्या हुई थी और पुलिस ने इस जुर्म में उनकी नौकरानी को गिरफ़्तार किया है। उसका नाम नीतू है और वह दलित है। यहाँ से खुलने वाली आगे की कहानी का एक सिरा इसी हत्या की गुत्थी में है। पालनपुर में अपने प्रवास के दौरान वे उत्तर भारतीय समाज की तमाम जटिलताओं के साथ दो-चार होते हैं, मसलन विभिन्न जाति-समूहों (ठाकुर, मुराव, दलित) की आपसी राजनीति, भ्रष्टाचार, जलनखोरी, लालफीताशाही, ग़रीबी, लैंगिक भेद, सत्ता-संघर्ष और एक बँटे हुए गाँव की तमाम उथल-पुथल।
‘लाइन पार’, जातियों में बँटे हुए एक भारतीय गाँव का यथार्थवादी, तीखा और मनोरंजक पोर्ट्रेट है। इसमें सौ साल के ग्रामीण जीवन की व्यथा-कथा है। इस कहानी में ऐतिहासिक तथ्य हैं, तो निजी अनुभव भी हैं। यह एक सनसनीखेज अपराध कथा भी है और ग्रामीण जीवन का मर्मस्पर्शी दस्तावेज़ भी जिसमें आज़ादी से पहले और बाद के ग्रामीण भारत की विविध रंगी तस्वीरें दिखती है।
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