Veerangana Jhalkari Bai
(0)
Author:
Mohandas NaimisharayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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Available
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वीरांगना झलकारी बाई का महत्त्वपूर्ण प्रसंग हमें 1857 के उन स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, जो इतिहास में भूले-बिसरे हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की प्रिय सहेलियों में से एक थी और झलकारी बाई ने समर्पित रूप में न सिर्फ रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया बल्कि झाँसी की रक्षा में अंग्रेजों का सामना भी किया। झलकारी बाई दलित-पिछड़े समाज से थीं और निस्वार्थ भाव से देश-सेवा में रहीं। ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना हमें जरूरी है। इस नाते भी कि जो जातियाँ उस समय हाशिये पर थीं, उन्होंने समय-समय पर देश पर आई विपत्ति में अपनी जान की परवाह न कर बढ़- चढ़कर साथ दिया। वीरांगना झलकारी बाई स्वतंत्रता सेनानियों की उसी शंृखला की महत्त्वपूर्ण कड़ी रही हैं। इस उपन्यास को लिखने के लिए लेखक ने सम्बन्धित ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों पर शोध कार्य के साथ स्वयं झाँसी जाकर झलकारी बाई के परिवार के लोगों, रिश्तेदारों आदि से भी मुलाकात की है।
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वीरांगना झलकारी बाई का महत्त्वपूर्ण प्रसंग हमें 1857 के उन स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, जो इतिहास में भूले-बिसरे हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की प्रिय सहेलियों में से एक थी और झलकारी बाई ने समर्पित रूप में न सिर्फ रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया बल्कि झाँसी की रक्षा में अंग्रेजों का सामना भी किया। झलकारी बाई दलित-पिछड़े समाज से थीं और निस्वार्थ भाव से देश-सेवा में रहीं। ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना हमें जरूरी है। इस नाते भी कि जो जातियाँ उस समय हाशिये पर थीं, उन्होंने समय-समय पर देश पर आई विपत्ति में अपनी जान की परवाह न कर बढ़- चढ़कर साथ दिया। वीरांगना झलकारी बाई स्वतंत्रता सेनानियों की उसी शंृखला की महत्त्वपूर्ण कड़ी रही हैं। इस उपन्यास को लिखने के लिए लेखक ने सम्बन्धित ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों पर शोध कार्य के साथ स्वयं झाँसी जाकर झलकारी बाई के परिवार के लोगों, रिश्तेदारों आदि से भी मुलाकात की है।
Book Details
-
ISBN9788183610148
-
Pages102
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मराठी में कादम्बरी यानी उपन्यास लेखन का अपना एक इतिहास रहा है। प्रसिद्ध लेखक रंगनाथ पठारे का यह चर्चित उपन्यास ‘ताम्रपट’ उन सब सम्भावनाओं को समेटे हुए है जिनकी अपेक्षा उपन्यास से की जाती है। अपने बृहद् कलेवर में ‘ताम्रपट’ की कथा का फलक भारतीय इतिहास के लगभग चार दशकों में फैला हुआ है—1942 से लेकर 1979 तक। अलग से कहना ज़रूरी नहीं कि यही वह दौर है जब देश ने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के उत्साह और अवसाद दोनों को झेलते हुए विश्व-पटल पर अपनी पहचान कराई। इस काल में हमने सत्ता के संघर्षों का विभिन्न रूप देखा, संस्थाओं का बनना और उनका भ्रष्ट होना भी देखा, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अनेक निर्मितियों और विध्वंसों को भी देखा; नागरिकों के नैतिक उत्थान-पतन से भी हम रूबरू हुए। ‘ताम्रपट’ के माध्यम से हम इस पूरी यात्रा से गुज़रते हैं। लेखक की विराट विश्वदृष्टि और अपने आसपास के यथार्थ का विश्वसनीय अभिज्ञान इस उपन्यास में अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ उपस्थित है।
Jungle Tantram
- Author Name:
Shrawan Kumar Goswami
- Book Type:

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Description:
सिंह बनाम राजनेता। मोर बनाम प्रशासक। नाग बनाम पूँजीपति और चूहा बनाम आम आदमी—‘जंगल तंत्रम’ के ये ख़ास घटक हैं। इन्हीं चार जन्तुओं के माध्यम से लेखक ने आज की राजनीति के तहत चलनेवाली लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली के जनविरोधी चरित्र को उजागर किया है।
सिंह, मोर और नाग किस तरह अपने-अपने निहित स्वार्थों के लिए पारस्परिक गठजोड़ किए हुए हैं, फ़ैंटेसीनुमा इस उपन्यास से यह बख़ूबी समझ में आ जाता है। चूहा इसे समझता भी है कि इसकी जोड़-तोड़ का असली शिकार तो मैं ही हूँ पर वह इससे उबर नहीं पाता। छोटे-छोटे प्रलोभनों, सुख-सुविधाओं की आस उसे बराबर कमज़ोर बनाए हुए है। संघर्ष के लिए वह खड़ा तो होता है, पर उसी की वर्गीय और परम्परागत दुर्बलताएँ उसकी पीठ का बोझ बनी हुई हैं।
वास्तव में सुपरिचित कथाकार श्रवण कुमार गोस्वामी का यह बहुचर्चित उपन्यास अपनी सार्थक प्रतीकात्मकता और धारदार भाषा-शैली के आद्योपान्त निर्वाह के कारण एक अनूठा प्रभाव छोड़ता है।
Amrit Aur Vish
- Author Name:
Amritlal Nagar
- Book Type:

- Description: शिकरमों और ऊँट-गाड़ियों के एक सदी पुराने ज़माने से लेकर आज तक के तेज़ी से बदलते हुए रोचक मार्मिक और सहज जन-जीवन के अन्तरंग जीवन्त चित्रों का वर्णन पढ़ते-पढ़ते आप यह भूल जाएँगे कि उपन्यास पढ़ रहे हैं, बल्कि यह अनुभव करेंगे कि आप स्वयं भी इस वातावरण के ही एक अभिन्न अंग हैं। इसकी रचना-शैली का अनूठापन औसत और प्रबुद्ध दोनों प्रकार के पाठकों को अपने-अपने ढंग से किन्तु समान रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखता है। लेखक ने सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय और दार्शनिक दृष्टि से जिस तन्मयता और गहराई से व्यक्ति और समाज का मनोरूप दर्शन यहाँ प्रस्तुत किया है, वह पाठकों के लिए आमतौर से अन्यत्र दुर्लभ है। पुस्तक एक बार हाथ में उठा लेने पर पूरा पढ़े बिना आप रह नहीं सकते। यही नहीं, आप इसे बार-बार पढेंगे और हर बार एक नई दृष्टि और नए रस-बोध की ताज़गी पाएँगे।
Vinayak
- Author Name:
Rameshchandra Shah
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Description:
...जो भी हो, इसका मतलब यही हुआ कि कुछ देना-पावना बचा था तुम्हारा मेरी तरफ़, जिसे तुम्हें मुझसे वसूल करना ही था।
...दूरबीन लगाकर देखा, तुम ख़ासे फल-फूल रहे हो। सेवानिवृत्ति की सरहद पर हो, फिर भी एक और लम्बी छलाँग लगाने को तैयार बैठे हो। ...इस सबके बीच तुम्हें घर की याद जैसी पिछड़ी और बासी-बूसी चिन्ता क्यों सताने लगी—मेरी समझ से बाहर है। देखता हूँ, तुम्हारे भीतर का वह कौतुकी-खिलंदड़ा बीनू अभी भी ज़िन्दा है। अभी भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा।
...उफ़! ऐसी भरी-पूरी और फलती-फूलती गिरस्ती के बीचोबीच यह कैसा बवंडर बो दिया तुमने! अजीब भँवर में डाल दिया है तुमने मुझे विनायक! तुम मेरे क़ाबू से बाहर हुए जा रहे हो। मैं क्या करूँ तुम्हारा अब? मेरी स्मृति भी मेरा साथ नहीं दे रही। ओह, अब याद आया। स्मृति नहीं, ‘प्रतिस्मृति’। जानते हो यह क्या होती है?
...पर, विनायक! अब यह मेरी ज़िम्मेदारी है, तुम्हारी नहीं। तुम्हें मैं जहाँ तक देख-सुन सकता था, दिखा-सुना चुका। जितनी दूर तक तुम्हारा साथ दे सकता था, दे चुका। अब तुम अपनी राह चलने को स्वतंत्र हो, और मैं अपनी।
यह एक ऐसा उपन्यास है जिसे इस लेखक के ही सुप्रसिद्ध और पहले-पहले उपन्यास ‘गोबरगणेश’ के नायक की उत्तरकथा की तरह भी पढ़ा जा सकता है और अपने-आप में मुकम्मल स्वतंत्र कृति की तरह भी। हाँ, जैसे उस विनायक का, वैसे ही इस विनायक का भी जिया-भोगा सब कुछ संवेदनशील पाठकों को ख़ुद अपनी जीवनानुभूति के क़रीब लगेगा : क्योंकि, यह किसी सिद्धिविनायक की नहीं, हमारे-आपके जैसे ही हर असिद्ध की व्यथा-कथा है, जिसमें अन्तर्द्वन्द्व और त्रास ही नहीं, उमंग और उल्लास भी कुछ कम जगह नहीं घेरते। चाहे चरितनायक हो, चाहे लच्छू-चन्दू-त्रिभुवन और हरीशनारायण सरीखे उसके नए-पुराने संगी-साथी हों, चाहे स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की अक्षय ऊष्मा और दुर्निवार्य उलझनों को साकार करनेवाले चरित्र—मालती, मार्गरेट और शकुन्तला उर्फ मिसेज़ दुबे हों—सभी के इस आख्यान में घटित होने की लय हमारे सामूहिक और व्यक्तिगत जीने की लय से अभिन्न है। लय, जो जितनी जीने के ‘सेंसेशन’ की है, उतनी ही सोचने-महसूसने और उस सोचने-महसूसने को कहने की ज़िन्दा हरकतों की भी।
अन्तर्बाह्य जीवन की सनसनी से भरपूर यह उपन्यास अपने ही ढंग से, अपने ही सुर-ताल में जीवन के अर्थ की तलाश में भी पड़ता है : अपने ही जिये-भोगे हुए का भरपूर दबाव उसे उस ओर अनिवार्यतः ठेलता है। जीवन क्या किसी का भी, महज़ सीधी लकीर नहीं, एक वृत्त, बल्कि वर्तुल है जो ‘अन्त’ को ‘आरम्भ’ से मिला के ही पूरा होता है? यह भी महज़ संयोग नहीं, कि उपन्यास का आरम्भ ‘माई डियर बीनू’ को लिखी गई एक चिट्ठी और एक ख़ुशबू से होता है और उपसंहार स्वयं इस चरितनायक को उसके रचयिता के सीधे सम्बोधन और ‘प्रतिस्मृति’ से।
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