Dhol
(0)
Author:
M. Veerappa MoilyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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‘ढोल’ (तेम्बरे) कन्नड़ साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है जो कर्नाटक के तटीय इलाके में रहनेवाले सीमान्त समुदाय ‘पम्बद’ के जीवन की जटिल सांस्कृतिक प्रक्रिया—‘भूताराधना’ या नायकत्व की आराधना की गहरी छानबीन करता है। यह जटिल संस्कृति पम्बद की वंशगत वृत्ति के रूप में प्रचलित है। इस आराधना में, एक कठिन क्रिया के अन्तर्गत व्यक्तित्व का विखंडन होता है तथा सम्बन्धित व्यक्ति रूप बदलता है।</p> <p>उपन्यास में कथाकार ने इस अद्भुत और पारम्परिक वृत्ति को दो पम्बद भाइयों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है : एक इस परम्परा के खिलाफ विद्रोह करता है और आधुनिक शिक्षा प्राप्त करता है। दूसरा भूताराधना की इस पद्धति को सच्चे उत्साह के साथ पुनर्स्थापित करने में लग जाता है। उनकी एक बहन है, जो पहले भाई की तरह परम्परा के खिलाफ जाकर कानून की पढ़ाई करती है तथा अपनी जिन्दगी को स्त्री के अधिकारों के लिए समर्पित कर देती है।</p> <p>कथाकार ने परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व से भरी इस कथा को रोचकता के साथ वृत्तान्त शैली में प्रस्तुत किया है।</p> <p>कथाकार की सामुदायिक जिन्दगी में गहरी दिलचस्पी है। उसने पम्बद की जिन्दगी की इस सांस्कृतिक गतिशीलता को करीब से देखा है। राजनीतिक अनुभव और उनके न्याय के ज्ञान ने उनके अनुभव क्षेत्र का विस्तार किया है। दलित और स्त्री चेतना के प्रति भी इस उपन्यास में गहरी प्रतिबद्धता दिखलाई पड़ती है। कहना न होगा कि ये सारी बातें मिलकर इस उपन्यास को महत्त्वपूर्ण बनाती हैं तथा उसे एक वैश्विक धरातल पर नए सामाजिक यथार्थ के साथ उपस्थित करती हैं।</p> <p>—डॉ. बी.ए. विवेक राय</p> <p>पूर्व कुलपति, कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी (कर्नाटक)
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‘ढोल’ (तेम्बरे) कन्नड़ साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है जो कर्नाटक के तटीय इलाके में रहनेवाले सीमान्त समुदाय ‘पम्बद’ के जीवन की जटिल सांस्कृतिक प्रक्रिया—‘भूताराधना’ या नायकत्व की आराधना की गहरी छानबीन करता है। यह जटिल संस्कृति पम्बद की वंशगत वृत्ति के रूप में प्रचलित है। इस आराधना में, एक कठिन क्रिया के अन्तर्गत व्यक्तित्व का विखंडन होता है तथा सम्बन्धित व्यक्ति रूप बदलता है।</p>
<p>उपन्यास में कथाकार ने इस अद्भुत और पारम्परिक वृत्ति को दो पम्बद भाइयों के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है : एक इस परम्परा के खिलाफ विद्रोह करता है और आधुनिक शिक्षा प्राप्त करता है। दूसरा भूताराधना की इस पद्धति को सच्चे उत्साह के साथ पुनर्स्थापित करने में लग जाता है। उनकी एक बहन है, जो पहले भाई की तरह परम्परा के खिलाफ जाकर कानून की पढ़ाई करती है तथा अपनी जिन्दगी को स्त्री के अधिकारों के लिए समर्पित कर देती है।</p>
<p>कथाकार ने परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्व से भरी इस कथा को रोचकता के साथ वृत्तान्त शैली में प्रस्तुत किया है।</p>
<p>कथाकार की सामुदायिक जिन्दगी में गहरी दिलचस्पी है। उसने पम्बद की जिन्दगी की इस सांस्कृतिक गतिशीलता को करीब से देखा है। राजनीतिक अनुभव और उनके न्याय के ज्ञान ने उनके अनुभव क्षेत्र का विस्तार किया है। दलित और स्त्री चेतना के प्रति भी इस उपन्यास में गहरी प्रतिबद्धता दिखलाई पड़ती है। कहना न होगा कि ये सारी बातें मिलकर इस उपन्यास को महत्त्वपूर्ण बनाती हैं तथा उसे एक वैश्विक धरातल पर नए सामाजिक यथार्थ के साथ उपस्थित करती हैं।</p>
<p>—डॉ. बी.ए. विवेक राय</p>
<p>पूर्व कुलपति, कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी (कर्नाटक)
Book Details
-
ISBN9788126715848
-
Pages156
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘नकेल’ एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपने जीवन की एक अत्यन्त जटिल समस्या को न सिर्फ़ धैर्य, साहस और समझदारी के साथ हल करती है, बल्कि उसे एक मिसाल के तौर पर समाज के सामने स्थापित भी कर देती है। वह अपने प्रौढ़वय पति की शादी उसकी नौजवान प्रेमिका से कराती है और अपने लिए चुनती है उस वासनालोलुप पुरुष से स्थायी मुक्ति और अपने बच्चों की जिम्मेदारी। इस फ़ैसले को अंजाम देने के रास्ते में उसे घर–बाहर से विरोध भी झेलना पड़ता है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य और पति के निरंकुश आचरण को नियंत्रित करने के लिए वह दृढ़तापूर्वक इस पर क़ायम रहती है। और इस प्रकार एक ऐसी स्त्री की रूपरेखा उभरकर सामने आती है जो एक व्यक्ति की गरिमा से विभूषित भी है।
Itivritt
- Author Name:
Jagdamba Prasad Dixit
- Book Type:

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‘इतिवृत्त’ एक मार्मिक वृत्त है—सामान्य भारतीय ग्रामीण जीवन के उखड़ने, टूटने और बिखरने का। पूरा वृत्त एक व्यक्तिगत कथा के साथ-साथ एक व्यापक जनजीवन गाथा भी है। व्यक्तिगत त्रासदी को सामाजिक त्रासदी के एक अंग के रूप में देखा गया है। इस त्रासदी के मूल में एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जो भारी उद्योगों के हित में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की लगातार बलि देती जा रही है। सारा विवरण समाजशास्त्रीय, अर्थशास्त्रीय होते हुए भी नितान्त अनुभूतिप्रवण और मानवीय
है।हिन्दी कथा-साहित्य में ग्रामीण जीवन तो काफ़ी चित्रित हुआ है, लेकिन ‘इतिवृत्त’ बिलकुल अलग इसलिए है कि ग्रामीण जीवन के बिखराव और अन्त की कहानी इससे पहले इतने मार्मिक रूप में और कहीं नहीं आई है। इसमें शक नहीं कि ‘इतिवृत्त’ हिन्दी उपन्यासों में मील का पत्थर है। इसकी शैली बहुत ही सरल, रोचक और आंचलिक है। लेखक जगदम्बा प्रसाद दीक्षित के लिए यह महान उपलब्धि इसलिए भी है कि ‘कटा हुआ आसमान’ और ‘मुरदा-घर’ की महानगरीय जीवन-प्रणाली का चित्रण जिस अधिकार और गहरी पैठ के साथ किया गया है, उसी सूझबूझ और गहराई के साथ ग्रामीण जीवन का चित्रण भी हुआ है।
‘इतिवृत्त’ पढ़ने का मतलब है एक बेहद करुण, यथार्थ और जीवन्त अनुभव संसार से होकर गुज़रना।
Romeo Juliet Aur Andhera(LOK)
- Author Name:
Kunal Singh
- Book Type:

- Description: भाषा, जाति, धर्म, नस्ल और क्षेत्र को दरकिनार करके किया गया प्रेम एक ताजी, भव्य, सम्मोहक और रोशन दुनिया की कोंपल अपने भीतर रखता है, पर जब हम भीतर और बाहर रोशनी से भर रहे होते हैं तो ठीक हमारे पीछे अँधेरा अपने ज़ंग लगे नाख़ूनों में धार दे रहा होता है। रोशनी और अँधेरे के बीच का यह आदिम खेल सभ्यता के कथित विकास के साथ और भी बर्बर होता गया है। ‘रोमियो जूलियट और अँधेरा’ पढ़ते हुए हम जानते हैं कि हमारे कोमलतम और सपनीले दिनों में बर्बरता सबसे अधिक हमारी ताक में रहती है। यहाँ दो युवा दिलों की मुहब्बत पर तमाम हत्यारी साज़िशों की भुतहा छायाएँ गिर रही हैं। यहाँ भाषा, नस्ल और स्थानीय बनाम बाहरी के द्वन्द्व हैं जिनकी शतरंजी बिसात पर राजनीतिक गोटियाँ सेंकी जा रही हैं, जिनकी गिरफ़्त में आने के बाद पीड़ित लोग अपने ही जैसे दूसरे पीड़ितों के प्रति ज़हर से भर रहे हैं। यहीं, इसी जगह से उपन्यास में अँधेरा प्रवेश करता है। असम की राजनीति में जो ताक़तें और तत्व आज निर्णायक होकर राज कर रहे हैं, उन सबकी गहरी पदचापें इस उपन्यास में सुनी और देखी जा सकती हैं। और यह सब यहाँ एक ऐसी सम्पन्न भाषा में दर्ज हो रहा है जो स्वाद, रंग, गन्ध, ध्वनियाँ, मौसम, रोशनी और अँधेरा सब कुछ को साकार कर देती है। जिसमें आप किसी कली का चटकना या फूल का मुरझाना सुन और देख सकते हैं। जिसमें असम की धरती का ताप दर्ज हुआ है। पढ़ते हुए एक भीषण आह के साथ हम जानते हैं कि हर भाषा के अपने दुख, मातम और अँधेरे हुआ करते हैं।
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