Bahati Ganga
(0)
Author:
Shivprasad Mishra 'Rudra'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
250
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'बहती गंगा' अपने ढंग की अनूठी रचना है। यह अकेली रचना इसके लेखक शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ काशिकेय को अक्षय कीर्ति दे गई है। भिन्न-भिन्न शीर्षकों से सत्रह अध्यायों में विभक्त यह कृति आख्यान और किंवदंतियों का एक अद्भुत मिश्रण वाला उपन्यास है। अलग-अलग अध्याय अपने आप में पूर्ण एक कथा होने के साथ-साथ किसी चरित्र के माध्यम से विकसित होकर परवर्ती अध्याय की कथा से जुड़ते दिखाई पड़ते हैं। परम्परागत अर्थों में किसी केन्द्रीय चरित्र या कथानक की जगह सारे चरित्र और सभी आख्यान बनारस की भावभूमि, उसके इतिहास, भूगोल, उसकी संस्कृति और उत्थान-पतन की महागाथा बनते हैं। अध्यायों के शीर्षक ही नहीं, भाषा, मानवीय व्यवहार और वातावरण का चित्रण बेहद सटीक और मार्मिक है। सबसे बड़ी बात यह है कि रचनाकार यथार्थ और आदर्श, दंतकथा और इतिहास मानव-मन की दुर्बलताओं और उदात्तताओं को इस तरह मिलाता है कि उससे जो तस्वीर बनती है वह एक पूरे समाज, की खरी और सच्ची कहानी कह डालती है।
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'बहती गंगा' अपने ढंग की अनूठी रचना है। यह अकेली रचना इसके लेखक शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ काशिकेय को अक्षय कीर्ति दे गई है। भिन्न-भिन्न शीर्षकों से सत्रह अध्यायों में विभक्त यह कृति आख्यान और किंवदंतियों का एक अद्भुत मिश्रण वाला उपन्यास है। अलग-अलग अध्याय अपने आप में पूर्ण एक कथा होने के साथ-साथ किसी चरित्र के माध्यम से विकसित होकर परवर्ती अध्याय की कथा से जुड़ते दिखाई पड़ते हैं। परम्परागत अर्थों में किसी केन्द्रीय चरित्र या कथानक की जगह सारे चरित्र और सभी आख्यान बनारस की भावभूमि, उसके इतिहास, भूगोल, उसकी संस्कृति और उत्थान-पतन की महागाथा बनते हैं। अध्यायों के शीर्षक ही नहीं, भाषा, मानवीय व्यवहार और वातावरण का चित्रण बेहद सटीक और मार्मिक है। सबसे बड़ी बात यह है कि रचनाकार यथार्थ और आदर्श, दंतकथा और इतिहास मानव-मन की दुर्बलताओं और उदात्तताओं को इस तरह मिलाता है कि उससे जो तस्वीर बनती है वह एक पूरे समाज, की खरी और सच्ची कहानी कह डालती है।
Book Details
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ISBN9788171194780
-
Pages164
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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श्रीमती शान्ति कुमारी बाजपेयी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की वरिष्ठ अध्यापिका हैं। उनका चित्त संवेदनशील है। उनमें गुरु की गम्भीरता और भावुक की सहृदयता दोनों ही हैं। अपने समाज में और परिवार में आए दिन व्यक्तियों का जो संघर्ष हुआ करता है और अप्रत्याशित रूप से मानस-ग्रन्थियाँ बनती रहती हैं, उनसे अनेक प्रकार की पारिवारिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। श्रीमती बाजपेयी ने इन समस्याओं का अध्ययन गम्भीरता के साथ किया है।
‘नदी लहरें और तूफ़ान’ उनका दूसरा उपन्यास है। इसमें एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार का बड़ा ही सजीव चित्रण है। दादी इस परिवार की केन्द्रीय शक्ति हैं। उन्हीं के इशारे पर सबको चलना पड़ता है। परन्तु उनमें स्नेह और ममता इतनी अधिक है कि उनके बच्चे स्नेह के बल पर अपने मन की मनवा लेते हैं। दादी का चरित्र बहुत ही जीवन्त होकर उभरा है। वे पुरानी रूढ़ियों और परम्पराओं से आक्रान्त हैं लेकिन ख़ानदान की मर्यादा की रक्षा के लिए सदा जागरूक हैं।
इस उपन्यास के नारी पात्र अधिक सशक्त हैं। लक्ष्मी का चरित्र तो अविस्मरणीय है। अपमान, उपेक्षा के बीच में स्थिर दीप-शिखा की तरह वह जलती रहती है और कठिन अवसरों पर परिवार को कठिन समस्याओं से उबारने का मार्ग भी दिखाती है। लक्ष्मी का पति उत्तम, नायक उतना नहीं है जितना नेय है। वह अपनी प्रथम पत्नी पार्वती से प्रेम करता है, उसे वचन भी देता है कि उसके जीवन में और कोई नारी पत्नी रूप में नहीं आ सकती। लेकिन दादी के दबाव से लक्ष्मी से फिर विवाह करता है। विवाह भी करता है लेकिन उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने में समर्थ भी नहीं होता। बाद में जब लक्ष्मी की ओर उन्मुख भी होता है तो अकारण उत्पन्न मानसिक ग्रन्थियों से बिदक जाता है। इस प्रकार वह शुरू से अन्त तक कमज़ोर चरित्र का पात्र बना रहता है।
लक्ष्मी और दादी इस उपन्यास के बहुत सशक्त पात्र हैं। कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में धैर्य और विवेक रखनेवाली लक्ष्मी सचमुच गृह-लक्ष्मी है।
—डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
Pahachan Ke Naam Par Hatyaye
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Description:
‘‘प्रत्येक युग में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो यह मानते हैं कि हर व्यक्ति की एक प्रमुख निष्ठा होती है जो हर तरह से औरों से इतनी उत्कृष्ट होती है कि उसे न्यायिक रूप से उसकी पहचान मान लिया जाता है। कुछ के लिए यह उनका राष्ट्र होता है, कुछ औरों के लिए धर्म या वर्ग। किन्तु सारी दुनिया में चारों तरफ़ फैले तरह-तरह के झगड़ों, विवादों पर नज़र दौड़ाने के बाद यह समझने में देर नहीं लगती कि कोई भी एक निष्ठा पूरी तरह सर्वोपरि नहीं होती।
वहाँ जहाँ लोगों को अपने धर्म के प्रति ख़तरा महसूस होता है, वहाँ उनकी धार्मिक आस्था उनकी सम्पूर्ण पहचान बन जाती है। लेकिन अगर उनकी मातृभाषा या जातीय समुदाय को ख़तरा हो तो वे अपने सधर्मियों से जमकर क्रूरता से लड़ाई करते हैं। तुर्की और खुर्द दोनों ही मुसलमान हैं, हालाँकि उनकी भाषाएँ अलग-अलग हैं; क्या उनके झगड़े कोई कम रक्तरंजित होते हैं? हुतु और टुट्सी दोनों समान रूप से कैथोलिक हैं और एक ही भाषा बोलते हैं, लेकिन यह उन्हें एक-दूसरे का संहार करने से रोक पाता है? चैक और स्लोवेक दोनों कैथोलिक हैं, क्या इसके सहारे वे साथ रह पाते हैं?’’
ऐसे कई प्रश्न हैं जिन पर प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी संजीदगी से विचार किया गया है। लेखक ने जीवन और समाज के कुछ मूलभूत मुद्दों को रेखांकित किया है। दृष्टिकोण वैश्विक है और उद्देश्य मानवता की प्रतिष्ठा। यह कहना उचित होगा कि प्रस्तुत पुस्तक पाठकों को संकीर्णताओं से मुक्त चिन्तन के लिए प्रेरित और निमंत्रित करती है।
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Paschat Mere Haath
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- Description: लिखना तो काफी पहले शुरू कर दिया था, कलम ने चौदह साल का वनवास गुजारा और तब उसे एक पहचान मिली, संसार के एक कोने से आ रही एक पुकार के रूप में। आज की तारीख में मेरे तीन कहानी संग्रह आपके सामने आ गए हैं और दो कविता संग्रह की शुरुआत मैं पश्चात मेरे हाथ से कर रहा हूँ। मेरी कविताओं के आठ संग्रह तैयार हो गए थे लेकिन मैंने दो-दो संग्रह के एक संग्रह बनाकर उन्हे निकालने की सोची है। पश्चात मेरे हाथ संग्रह को मैं नया या कि पहली रचना नहीं कह सकता, जिस तरह से कहानियों के बारे में कहता हूँ लेकिन इनमे से कई कविताएं एक दौर की शुरुआत जरूर थे, एक धीमी शुरुआत। कविताओं में ये सब लक्षित होता है। ज़्यादातर कवितायें व्यक्ति के लिए हैं कुछ राजनैतिक रंग भी है, महीने भर का राशन जैसी कविताओं मे ये दिखता है। कई कविताओं मे खुद मेरे लिए आश्चर्यजनक है कि विचारों की जबर्दस्त तीक्ष्णता है.ऐसा होता है जब लोग एक क्षण में कई क्षण गुजारते हैं और अपने जीवन के विभिन्न दौरों में मैंने ये खूब किया है। मेरा खुद का सोचना है कि मैं लेखक से पहले कवि रहा हूँ और खुद से आशा करता हूँ कि मेरी कविताएं मेरी उम्मीदें पूरी करें। जीवन के उस महायुग के पश्चात जो मेरे हाथ है वो आपके सामने है।
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