Gurukul : Ek Adhoori Kahani : Vol. 2
Author:
Anita RakeshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 60
₹
75
Unavailable
गुरुकुल’ का यह दूसरा भाग उसी चिन्ता का गम्भीर और गहन विस्तार है जो उपन्यास के पहले भाग में अंकुरित होती दिखाई दी थी।</p>
<p>पहले उपन्यास का भोला-भाला पार्थ यहाँ पर्याप्त वयस्क हो चुका है। वह न सिर्फ़ समाज की थोथी नैतिकता की अँधेरी गलियों में दुबके गे समुदाय की दुनिया को खुली आँखों से देख रहा है, बल्कि उनके हित में एक निर्णायक संघर्ष की तैयारी भी कर रहा है।</p>
<p>कहने की ज़रूरत नहीं कि हिन्दी में वैकल्पिक यौन-व्यवहार के माध्यम से सामाजिक और मानवीय सहिष्णुता की तलाश का यह पहला प्रयास है। सवाल बहुत सीधा है कि स्वतंत्रता और समता के अलम्बरदार हमारे तथाकथित लोकतांत्रिक समाज में कुछ लोगों को सिर्फ़ उनके ‘सेक्सुअल प्रिफ़ेरेंस’ के कारण ही क्यों समाज की घृणा और क़ानून की क्रूरता का पात्र बना दिया जाता है? लेकिन जवाब इतना सीधा नहीं है, क्योंकि न हममें इतना नैतिक साहस है और न इतनी इंसानियत।</p>
<p>यह उपन्यास भी इसका जवाब नहीं देता, यह उसकी ज़िम्मेदारी भी नहीं है, वह बस इस सवाल के पीछे छिपे हमारे ख़ूँख़्वार और दानवी चेहरों को उघाड़ता है। वह बताता है कि हम क्या हैं, हमारी नैतिक पवित्रता क्या है, हमारी न्याय व्यवस्था क्या है और हमारी पुलिस क्या है, और इस तरह इस सवाल के जवाब की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।
ISBN: 9788183613354
Pages: 104
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Promod Batra
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- Description: "ग्राहकों को खुश रखना सीखें ग्राहक की खुशी को सुनिश्चित करना या यूँ कहें कि ग्राहक की संतुष्टि उसके प्रति उत्तरदायित्व का मूल तत्त्व है। जिस व्यवसाय में ग्राहक के प्रति जितना ज्यादा उत्तरदायित्व होगा, वह व्यवसाय उतना ही अधिक सफल होगा। इसलिए ग्राहकों की बात सुनिए, अपने उनकी इज्जत कीजिए, उनकी जरूरतों का आदर कीजिए, उनसे मिले अनुभवों पर ध्यान (आलोचना नहीं) दीजिए, उनकी प्रशंसा कीजिए कि आप उनकी वजह से ही यहाँ हैं, और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात कि नम्र बनिए, तब आप किसी भी व्यवसाय के लिए ‘श्रेष्ठ व्यक्ति’ हैं। यह पुस्तक सलाह देती है कि अपने ग्राहकों की आवश्यकताओं और दुविधाओं के प्रति मित्रतापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित कीजिए। ग्राहक की अधिक खुशी के लिए कम वादे करें और अधिक काम करें। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘ग्राहक भगवान् का रूप होता है।’ व्यवसाय की सफलता भी इसी ग्राहक-रूपी भगवान् की मुसकान में छिपी है। सरल-सुबोध भाषा में ग्राहकों/कस्टमर्स को खुश करके व्यावसायिक उन्नति के मूलमंत्र बताती एक रोचक एवं पठनीय पुस्तक। "
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