Mukhara Kya Dekhe
About the book
‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ (1986) के प्रकाशन के ठीक दस वर्षों बाद आनेवाला अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास अपनी महाकाव्यात्मक गरिमा के साथ एक ऐसे मुखड़े का रहस्योद्घाटन कर रहा है जो बाहर से बहुत भव्य है, पर भीतर से अत्यन्त कुरूप। ‘मुखड़ा क्या देखे’ की कथा भारतीय स्वाधीनता के कुछ बाद से लेकर इमरजेंसी तक फैली हुई है। इस पूरे दौर में देश के भीतर घटित सारी घटनाओं की छाप ग्रामीण जीवन पर किस रूप में पड़ी, उपन्यास की नींव इसी प्रश्न पर डाली गई है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि देश-दुनिया में घटनेवाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को बुद्धिजीवी और इतिहासकार जिस रूप में देखते हैं, गाँव के सामान्य लोग उसी रूप में नहीं देखते। उनके विचार और निष्कर्ष भले ही ग़लत होते हों, पर होते हैं ठोस। निस्सन्देह ‘मुखड़ा क्या देखे’ ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इसमें भारतीय इतिहास के अनेक बिन्दुओं की ऐसी व्याख्या है, जो इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलेगी। ‘मुखड़ा क्या देखे’ उपन्यास किसी विशेष गाँव या विशेष पात्रों की कथा न होकर सामान्य भारतीय जनमानस की कथा है। इस उपन्यास को बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक समाज की दृष्टि से भी नहीं देखा जा सकता। भारतवर्ष बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषायी देश है। हिन्दी में ऐसे अनेक उपन्यास आए हैं, जो या तो बहुसंख्यक समाज की कहानी कहते हैं या फिर अल्पसंख्यक समाज की, लेकिन ‘मुखड़ा क्या देखे’ समग्र भारतीय समाज की कहानी कहता है, जिसमें सम्पन्न वर्ग के हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर हिन्दू ‘परजा’ और मुसलमान ‘परजा’ का शोषण करते हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिस विषय पर लिखते हैं, उसमें आकंठ डूब जाते हैं। यही कारण है कि इस उपन्यास में जिस प्रामाणिकता के साथ उन्होंने मुसलमान रीति-रिवाज़ों का चित्रण किया है, उसी प्रामाणिकता के साथ हिन्दू और ईसाई समुदाय के रीति-रिवाज़ों का भी। अर्थात् पिछले बीस वर्षों में आए हिन्दी उपन्यासों में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हिन्दी में लिखा गया यह उपन्यास समूचे भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अन्तर्वस्तु और शिल्प पर ठेठ देसी रंगों एवं संस्कारों की गहरी छाप है।
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‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ (1986) के प्रकाशन के ठीक दस वर्षों बाद आनेवाला अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह उपन्यास अपनी महाकाव्यात्मक गरिमा के साथ एक ऐसे मुखड़े का रहस्योद्घाटन कर रहा है जो बाहर से बहुत भव्य है, पर भीतर से अत्यन्त कुरूप। ‘मुखड़ा क्या देखे’ की कथा भारतीय स्वाधीनता के कुछ बाद से लेकर इमरजेंसी तक फैली हुई है। इस पूरे दौर में देश के भीतर घटित सारी घटनाओं की छाप ग्रामीण जीवन पर किस रूप में पड़ी, उपन्यास की नींव इसी प्रश्न पर डाली गई है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि देश-दुनिया में घटनेवाली बड़ी-बड़ी घटनाओं को बुद्धिजीवी और इतिहासकार जिस रूप में देखते हैं, गाँव के सामान्य लोग उसी रूप में नहीं देखते। उनके विचार और निष्कर्ष भले ही ग़लत होते हों, पर होते हैं ठोस। निस्सन्देह ‘मुखड़ा क्या देखे’ ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, लेकिन इसमें भारतीय इतिहास के अनेक बिन्दुओं की ऐसी व्याख्या है, जो इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलेगी।
‘मुखड़ा क्या देखे’ उपन्यास किसी विशेष गाँव या विशेष पात्रों की कथा न होकर सामान्य भारतीय जनमानस की कथा है। इस उपन्यास को बहुसंख्यक अथवा अल्पसंख्यक समाज की दृष्टि से भी नहीं देखा जा सकता। भारतवर्ष बहुजातीय, बहुधार्मिक और बहुभाषायी देश है। हिन्दी में ऐसे अनेक उपन्यास आए हैं, जो या तो बहुसंख्यक समाज की कहानी कहते हैं या फिर अल्पसंख्यक समाज की, लेकिन ‘मुखड़ा क्या देखे’ समग्र भारतीय समाज की कहानी कहता है, जिसमें सम्पन्न वर्ग के हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर हिन्दू ‘परजा’ और मुसलमान ‘परजा’ का शोषण करते हैं।
अब्दुल बिस्मिल्लाह के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जिस विषय पर लिखते हैं, उसमें आकंठ डूब जाते हैं। यही कारण है कि इस उपन्यास में जिस प्रामाणिकता के साथ उन्होंने मुसलमान रीति-रिवाज़ों का चित्रण किया है, उसी प्रामाणिकता के साथ हिन्दू और ईसाई समुदाय के रीति-रिवाज़ों का भी। अर्थात् पिछले बीस वर्षों में आए हिन्दी उपन्यासों में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि हिन्दी में लिखा गया यह उपन्यास समूचे भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अन्तर्वस्तु और शिल्प पर ठेठ देसी रंगों एवं संस्कारों की गहरी छाप है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2023
- Weight
- 246 grams
- ISBN-13
- 9788119028979
- Pages
- 246
- Reading time
- ~8 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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