Panchjanya
(0)
Author:
Devraj, Gajendra Kumar MitraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र-युद्ध के पूर्व कहा था—“यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।” वही श्रीकृष्ण जब उस काल में जन्मे थे और एक प्रकार से कुरुक्षेत्र-युद्ध के मुख्य नायक थे, तो मानना होगा कि धर्म की ग्लानि और अधर्म का बढ़ाव बहुत अधिक हुआ था। पृथ्वी भर के मनुष्य अत्याचार, अन्याय, दुख, कष्ट से बेचैन हो उठे थे। राज-शक्ति तथा क्षात्र-शक्ति पर लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, शून्यगर्भी अहंकार और आत्मनाशा बुद्धि छा गई थी। उसकी मति विभ्रान्त हो गई थी। तब क्या श्रीकृष्ण ने भारत को, पंक-शैया से उठाना और नित्य अवमानना से उसका उद्धार करना चाहा था? संभोगमत्त, मदगर्वित, निर्बोध-विकृत क्षात्र-शक्ति के हाथ से शासन छीनकर सद्बुद्धियुक्त सत्पुरुषों के हाथ में देश का दायित्व देना चाहा था? दरिद्र, पीड़ित, मूढ़, मूक, साधारण मनुष्यों की संघ-शक्ति को ही शासन-शक्ति में रूपान्तरित करना चाहा था? क्या इसी कारण उनके विख्यात घोषक-शंख को कोई अन्य नाम न देकर, उसका नाम पाञ्चजन्य रखा गया? क्या उन्होंने इसीलिए राजसूय यज्ञ में साधारण-जन के पाद-प्रक्षालन का भार ग्रहण किया था? ‘पाञ्चजन्य’ ग्रन्थ की महाभारत-कथा में लेखक ने इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजा है।
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श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र-युद्ध के पूर्व कहा था—“यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।” वही श्रीकृष्ण जब उस काल में जन्मे थे और एक प्रकार से कुरुक्षेत्र-युद्ध के मुख्य नायक थे, तो मानना होगा कि धर्म की ग्लानि और अधर्म का बढ़ाव बहुत अधिक हुआ था। पृथ्वी भर के मनुष्य अत्याचार, अन्याय, दुख, कष्ट से बेचैन हो उठे थे। राज-शक्ति तथा क्षात्र-शक्ति पर लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, शून्यगर्भी अहंकार और आत्मनाशा बुद्धि छा गई थी। उसकी मति विभ्रान्त हो गई थी। तब क्या श्रीकृष्ण ने भारत को, पंक-शैया से उठाना और नित्य अवमानना से उसका उद्धार करना चाहा था? संभोगमत्त, मदगर्वित, निर्बोध-विकृत क्षात्र-शक्ति के हाथ से शासन छीनकर सद्बुद्धियुक्त सत्पुरुषों के हाथ में देश का दायित्व देना चाहा था? दरिद्र, पीड़ित, मूढ़, मूक, साधारण मनुष्यों की संघ-शक्ति को ही शासन-शक्ति में रूपान्तरित करना चाहा था? क्या इसी कारण उनके विख्यात घोषक-शंख को कोई अन्य नाम न देकर, उसका नाम पाञ्चजन्य रखा गया? क्या उन्होंने इसीलिए राजसूय यज्ञ में साधारण-जन के पाद-प्रक्षालन का भार ग्रहण किया था? ‘पाञ्चजन्य’ ग्रन्थ की महाभारत-कथा में लेखक ने इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजा है।
Book Details
-
ISBN9788183616874
-
Pages443
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
Dhoday Charitmanas
- Author Name:
Satinath Bhaduri
- Book Type:

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आधुनिक भारतीय कथा - साहित्य में कहानी कहना बंगाल की कला है । प्रस्तुत रचना इस मान्यता का एक अच्छा उदाहरण है । धीरोदात्त नायक यहाँ नहीं है । है तो ढोड़ाय , जैसा मामूली नाम तैसा चरित , ततमा लोगों के पूरे सामाजिक संदर्भ में , जहाँ ' पक्की ' ( यानी पक्की सड़क ) आधुनिक जीवन और बाहरी तत्त्व को प्रतिकित करती है । यह ' पक्की ' ही पूरे उपन्यास को आदि से अंत तक जोड़े हुए है । जिस समाज में महज पक्की सड़क नयी रोशनी का प्रतीक हो , उसे आधुनिक संदर्भों में जोड़ना रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर ' कितना कठिन है , यह आसानी से समझा जा सकता है । पर प्रख्यात बंगला कथा - शिल्पी सतीनाथ भादुड़ी ने कलात्मक धीरज के साथ इस जोड़ को साधा है । यों एक बड़े कालगत अंतराल को कथाकार ने अपनी संवेदना से पूरा किया है । प्रसिद्ध बंगला उपन्यास ' ढोड़ाय चरितमानस ' हिंन्दी में प्रकाशित होने के पूर्व ही यहाँ विस्तृत चर्चा का विषय बना रहा है । तब हिंदी पाठक के मन में उसको लेकर अतिरिक्त उत्सुकता का होना स्वाभाविक है । ' मैला आँचल ' हिंदी के समकालीन क्लैसिकों में है । उसका मूल नक्शा यहाँ देखा जा सकता है , जिसे हिंदी के उपन्यासकार ने अपने ढंग से समृद्धतर किया है । यों हिंदी की आंचलिक कथा - धारा का एक स्रोत है । ' ढोड़ाय चरितमानस ' । इस दृष्टि से सामान्य से सामान्य पाठक और विशिष्ट से विशिष्ट शोधकर्ता के लिए यह कथा - कृति रोचक और उपयोगी सिद्ध होगी ।
Bhavbhuti Katha
- Author Name:
Mahesh Katare
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भवभूति आठवीं सदी में हुए थे। नाटककार थे, कवि थे। संस्कृत में लिखे उनके नाटकों को कालिदास की रचनाओं के बराबर माना जाता है।
यह उपन्यास उनके जीवन पर आधारित है, जिसकी मुख्य कथाधारा ब्राह्मण होने के बावजूद नाट्य-कर्म में उनकी प्रवृत्ति और उसके चलते अपने समाज में उनके संघर्ष के साथ-साथ चलती है।
महेश कटारे इससे पूर्व भर्तृहरि पर केन्द्रित एक अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास की रचना कर चुके हैं। भारत के सांस्कृतिक इतिहास के उल्लेखनीय पड़ावों को औपन्यासिक कलेवर में प्रस्तुत करते हुए वे तत्कालीन तथ्यों और आज के प्रश्नों को बराबर ध्यान में रखते हैं। देश, काल और पात्रानुकूल भाषा तथा जीवन-व्यवहार के विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हुए वे एक तरफ जहाँ अतीत को मूर्तिमान कर देते हैं, वहीं मानव-समाज और व्यवस्था के लिए हमेशा प्रासंगिक रहने वाले मुद्दों को भी अनदेखा नहीं करते।
भवभूति के बहुवर्णी चरित्र पर केन्द्रित यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।
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