Asha Kalindi Aur Rambha
(0)
Author:
Bhairavprasad GuptPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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‘आशा कालिन्दी और रम्भा’ नामक उपन्यासों की त्रयी क्रमशः सामन्तवादी, पूँजीवादी और गांधीवादी व्यवस्था में स्त्री की स्थिति पर एक टिप्पणी है।</p> <p>‘आशा’ उपन्यास की नायिका स्वयं अपनी कहानी सुनाती है। सेठ कालिन्दी प्रसाद आशा अर्थात् जानकी बाई को अपनी रखैल बनाना चाहता है। निर्धन दुकानदार बाप की बेटी होने के कारण ही नवाब के हरम में पहुँचा दी जाती है और बाद में वहाँ से मुक्त होने पर जानकी बाई के रूप में नाचने-गाने का धन्धा करने लगती है। आशा नवाब और सेठ कालिन्दी प्रसाद दोनों के लिए ही स्त्री भोग की सामग्री है।</p> <p>अगली कड़ी में सेठ कालिन्दी अपनी कहानी कहता है। उसका सबसे बड़ा कष्ट यह है कि रुपए के लालच में उसका पिता उसका विवाह बड़े घर की फूहड़ लड़की से कर देता है। पैसा उसके पास कितना ही हो, श्वसुर की सहायता से दूसरे विश्वयुद्ध में वह और भी कमाई करता है। लेकिन उसका पारिवारिक जीवन नरक बना हुआ है। अंग्रेज़ों और कांग्रेस दोनों के बीच सन्तुलन साधकर वह व्यापार में ख़ूब उन्नति करता है। असफल दाम्पत्य जीवन के कारण वह एक वेश्या से सम्बन्ध बनाता है और उसी से उत्पन्न बेटी का नाम वह रम्भा रखता है।</p> <p>रम्भा, इसकी नियति भी बहुत भिन्न नहीं है। अलग कोठी में पाली-पोसी जाने के बावजूद उसे सोलह साल की उम्र में चालीस साल के सेठ सोनेलाल की रखैल बनने को बाध्य होना पड़ता है, क्योंकि उसके पिता सेठ कालिंदी चरण में यह साहस नहीं है कि समाज में यह कह सके कि वह उसकी बेटी है। सेठ सोनेलाल की रखैल बन जाने के बाद भी रम्भा अपने विकास के लिए संघर्ष करती है। पढ़कर एम.ए. करने के दौरान आनन्द के सम्पर्क में आती है। सोनेलाल का गर्भ धारण करके भी वह उससे घृणा करती है। आनन्द के सम्पर्क में आकर वह जनसेवा की ओर प्रवृत्त होती है और एक स्कूल चलाने लगती है।
Read moreAbout the Book
‘आशा कालिन्दी और रम्भा’ नामक उपन्यासों की त्रयी क्रमशः सामन्तवादी, पूँजीवादी और गांधीवादी व्यवस्था में स्त्री की स्थिति पर एक टिप्पणी है।</p>
<p>‘आशा’ उपन्यास की नायिका स्वयं अपनी कहानी सुनाती है। सेठ कालिन्दी प्रसाद आशा अर्थात् जानकी बाई को अपनी रखैल बनाना चाहता है। निर्धन दुकानदार बाप की बेटी होने के कारण ही नवाब के हरम में पहुँचा दी जाती है और बाद में वहाँ से मुक्त होने पर जानकी बाई के रूप में नाचने-गाने का धन्धा करने लगती है। आशा नवाब और सेठ कालिन्दी प्रसाद दोनों के लिए ही स्त्री भोग की सामग्री है।</p>
<p>अगली कड़ी में सेठ कालिन्दी अपनी कहानी कहता है। उसका सबसे बड़ा कष्ट यह है कि रुपए के लालच में उसका पिता उसका विवाह बड़े घर की फूहड़ लड़की से कर देता है। पैसा उसके पास कितना ही हो, श्वसुर की सहायता से दूसरे विश्वयुद्ध में वह और भी कमाई करता है। लेकिन उसका पारिवारिक जीवन नरक बना हुआ है। अंग्रेज़ों और कांग्रेस दोनों के बीच सन्तुलन साधकर वह व्यापार में ख़ूब उन्नति करता है। असफल दाम्पत्य जीवन के कारण वह एक वेश्या से सम्बन्ध बनाता है और उसी से उत्पन्न बेटी का नाम वह रम्भा रखता है।</p>
<p>रम्भा, इसकी नियति भी बहुत भिन्न नहीं है। अलग कोठी में पाली-पोसी जाने के बावजूद उसे सोलह साल की उम्र में चालीस साल के सेठ सोनेलाल की रखैल बनने को बाध्य होना पड़ता है, क्योंकि उसके पिता सेठ कालिंदी चरण में यह साहस नहीं है कि समाज में यह कह सके कि वह उसकी बेटी है। सेठ सोनेलाल की रखैल बन जाने के बाद भी रम्भा अपने विकास के लिए संघर्ष करती है। पढ़कर एम.ए. करने के दौरान आनन्द के सम्पर्क में आती है। सोनेलाल का गर्भ धारण करके भी वह उससे घृणा करती है। आनन्द के सम्पर्क में आकर वह जनसेवा की ओर प्रवृत्त होती है और एक स्कूल चलाने लगती है।
Book Details
-
ISBN9788180318665
-
Pages48
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है।
भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं।
सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं।
भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’
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