Premasharam
Author:
PremchandPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction0 Ratings
Price: ₹ 239.2
₹
299
Available
‘प्रेमाश्रम’ प्रेमचन्द का सर्वप्रथम उपन्यास है<strong>,</strong> जिसमें उन्होंने नागरिक जीवन और ग्रामीण जीवन का सम्पर्क स्थापित किया है और परिवार के सीमित क्षेत्र से बाहर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण करते हैं।</p>
<p>भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की प्रथम झाँकी और भावनागत रामराज्य की स्थापना का स्वप्न ‘प्रेमाश्रम’ की अपनी विशेषता है। इसका उद्देश्य है—‘साम्य सिद्धान्त<strong>’</strong>। <strong>‘</strong>प्रेमाश्रम<strong>’</strong> में जीवन-मरण के गूढ़<strong>, </strong>जटिल प्रश्नों की मीमांसा है। सभी लोग पक्षपात और अहंकार से मुक्त हैं। आश्रम सारल्य<strong>, </strong>सन्तोष और सुविचार की तपोभूमि है। यहाँ न ईर्ष्या का सन्ताप है न लोभ और उन्माद<strong>, </strong>न तृष्णा का प्रकोप। यहाँ न धन की पूजा होती है और न दीनता पैरों-तले कुचली जाती है। आश्रम में सब एक-दूसरे के मित्र और हितैषी हैं। मानव-कल्याण ही सभी का चरम लक्ष्य है। इस बात का व्यावहारिक रूप हमें उपन्यास के ‘उपसंहार’ शीर्षक अंश में मिलता है।
ISBN: 9788192434643
Pages: 340
Avg Reading Time: 11 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Harsh Ranjan
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- Description: मेरे दोस्त ! तुम्हारी बुझी आँखों में मुझे उस भारत की तस्वीर दिखती है ,जिसमें रंग भरने को ना जाने कितनी किस्तों में कितनों ने लहू बहाए हैं । मुबारक हो ये रंग तुम्हें और उन्हें जिनके खेतों की खड़ी फसल इस इंसानी आग ने जलाए हैं । भूली मंजिलें ,भटकाती राहें ,शरीर तोड़ती चोटें और निहायती ठंडी आहें ! इनमें उलझे कल तुम्हीं तो मिले थे अंधेरी रात ,सूने रास्ते पर जूतों से गर्द उड़ाते ,हंसते-हंसते कोई उदास गीत गाते !कहाँ खो दिए वो सुकुमार शरीर ,भोली मुस्कुराहटें ,आँखों का रंग ,बचकानी चाहतें ? समूचा शहर जला दिया !क्यों ? तुम्हारे जैसे कितने सुनहरे सपने आसमान से टूटकर बेसहारा ,बिखरकर इस आग में गिर पड़े ! सब कुछ छिन गया ! जरूरतें मिट गयीं ,गया तुम्हारा शौक , तुम्हारे अरमान ;कट गए तुम्हारे पर, टूट गया तुम्हारा आसमान !तुम्हारे अरमानों के प्रेत ,तुम्हारा यह पिंजर बलिदान नहीं अभी बस मौत है । मेरे दोस्त !अपने चिता की एक चिंगारी मुझे दे दो ! इस पाप की लंका के लिए बस इतना ही काफी है ।ये सारे लुटेरे मारे जाऐंगे ,सारे अंधेरे दूर हो जाऐंगे क्योंकि अब तक की उस समझ को हमने दूर करने का प्रण लिया है जो लहू की कीमत को लहू बहने के डर से जोड़ती थी ।
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