Mati Pani Mein Sani Baudhikta
(0)
Author:
Dr. Archana Singh, Badri NarayanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
250
₹ 200 (20% off)
Available
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प्रत्येक समाज अपने विकास के क्रम में ज्ञान के अपने संस्रोत विकसित करता है , जो समझने की अन्त : दृष्टि देते हैं । किन्तु भारतीय समाज को समझने की जो दृष्टियाँ हैं उनमें औपनिवेशिकता एवं पश्चिमी ज्ञान संदर्भो की भरमार है । हमें अपने समाज को समझने के लिए देशज चिन्तन दृष्टि की आवश्यकता है । यह पुस्तक समाज विज्ञान के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण देशज चिन्तन दृष्टियों को मुख्य विमर्श का हिस्सा बनाने का एक छोटा सा प्रयास है जो कि अभी तक साहित्य , लोक या गल्प के नाम पर हाशिए पर रही हैं ।
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प्रत्येक समाज अपने विकास के क्रम में ज्ञान के अपने संस्रोत विकसित करता है , जो समझने की अन्त : दृष्टि देते हैं । किन्तु भारतीय समाज को समझने की जो दृष्टियाँ हैं उनमें औपनिवेशिकता एवं पश्चिमी ज्ञान संदर्भो की भरमार है । हमें अपने समाज को समझने के लिए देशज चिन्तन दृष्टि की आवश्यकता है । यह पुस्तक समाज विज्ञान के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण देशज चिन्तन दृष्टियों को मुख्य विमर्श का हिस्सा बनाने का एक छोटा सा प्रयास है जो कि अभी तक साहित्य , लोक या गल्प के नाम पर हाशिए पर रही हैं ।
Book Details
-
ISBN9789390625901
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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स्थिति है। इसमें बचने और लिखने का एक विकट द्वन्द्व चलता रहता है। गद्य लिखना मेहनत का
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जमकर बैठने की तैयारी एक लेखक की होनी चाहिए, वह मेरी कभी नहीं रही। मैं हमेशा ही एक बैक
बेंचर छात्र रहा हर जगह, जो क्लासरूम में बैठने के बजाय कैंटीन में बैठकर गप्पों में अपना समय
बिताना पसन्द करता रहा। इसलिए जो भी और जब भी लिखा टुकड़ों-टुकड़ों में लिखा। उन्हें डायरियाँ
भी कहना मुनासिब नहीं। डायरियों में एक व्यवस्था होती है। सुविधा के लिए ज़्यादा से ज़्यादा इन्हें
नोट्स कहा जा सकता है। कुछ भी पढ़ते या सोचते हुए छोटी-छोटी पर्चियों पर या कॉपी के सफ़ों पर
बनी, वह भी उसे छोटे-छोटे नोट्स की शक्ल में ही लिखा। इस किताब में कवियों या कविता पर
केन्द्रित जो टिप्पणियाँ हैं या कविता की किताबों पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ, सब कुल मिलाकर
नोट्स ही हैं। यह एक ऐसी तरकीब है जिसे निबन्ध न लिख पाने की अपनी अक्षमता के चलते मैंने
अपनी काहिली और सुविधा के लिए ईजाद किया। इसलिए इसे आलोचना या समीक्षा जैसा काम तो
क़तई नहीं कहा जा सकता।
नोट्स में एक बेतरतीबी है। एक अव्यवस्था है। मुझे लगता है कि रचना के भीतर अर्जित की गई
स्वतंत्रता के अधिक क़रीब पहुँचने में यह कोशिश ज़्यादा कारगर है। हिन्दी कविता के लिए मुझे
अक्सर एक रूपक गढ़ने की इच्छा होती है कि इसकी काया मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ
अग्रवाल और त्रिलोचन के पाँच तत्त्वों से बनी है और इसके प्राणतत्त्व निराला हैं। हर रूपक की तरह
लेकिन यह रूपक भी अपर्याप्त है पर इससे हिन्दी कविता के नाक-नक्श कुछ हद तक तो पहचाने ही
जा सकते हैं। आठवें दशक की कविता को सामने रखकर अपने से पहले की कविता को टटोलने की
कोशिश में नोट्स का यह पुलिन्दा तैयार हो गया है।
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Description:
कहानी सदा लोकप्रिय रही है। इससे सम्बन्धित आन्दोलनों में भी पर्याप्त उछल-कूद रही है। ‘नयी कहानी’, ‘अकहानी’, ‘सहज कहानी’, ‘सक्रिय कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘समान्तर कहानी’ फिर परवर्ती ‘सहज कहानी’ आदि आन्दोलनों ने कहानी को आलोचना के केन्द्र में बनाए रखा है, परन्तु कहानी तो कहानी होती है। इतना आवश्यक है कि विधा के आकर्षण को बनाए रखने के लिए इसके कलात्मक पक्ष में बदलाव आता रहता है। प्रस्तुति में अन्तर का बदलाव कहानी को रोचक बनाता है। प्रस्तुति का द्वन्द्व ही वस्तुत: किसी भी रचना को महान बनाता है। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में रचित कहानियाँ विषयवस्तु एवं कला की दृष्टि से तो ध्यान आकर्षित करती हैं परन्तु साथ ही बाज़ारवाद, भ्रष्टाचार, स्वार्थवाद, ढिंढोरावाद आदि प्रवृत्तियों के कारण जीवन-शैली के बदलाव को भी रेखांकित करती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक की कहानियों पर विस्तृत तथा सारगर्भित आलोचनात्मक टिप्पणी है। यह हिन्दी कहानी की दीर्घकालीन यात्रा का आलोचनात्मक सोपान है जो बिना खेमेबाज़ी के, सहज-सार्थक भाव से इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक के कहानीकारों एवं रचनाओं पर बेबाक, निष्पक्ष टिप्पणी करता है तथा कहानी-यात्रा के विकास को दक्षतापूर्वक सहेजता है।
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