Mati Pani Mein Sani Baudhikta
(0)
Author:
Dr. Archana Singh, Badri NarayanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
250
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प्रत्येक समाज अपने विकास के क्रम में ज्ञान के अपने संस्रोत विकसित करता है , जो समझने की अन्त : दृष्टि देते हैं । किन्तु भारतीय समाज को समझने की जो दृष्टियाँ हैं उनमें औपनिवेशिकता एवं पश्चिमी ज्ञान संदर्भो की भरमार है । हमें अपने समाज को समझने के लिए देशज चिन्तन दृष्टि की आवश्यकता है । यह पुस्तक समाज विज्ञान के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण देशज चिन्तन दृष्टियों को मुख्य विमर्श का हिस्सा बनाने का एक छोटा सा प्रयास है जो कि अभी तक साहित्य , लोक या गल्प के नाम पर हाशिए पर रही हैं ।
Read moreAbout the Book
प्रत्येक समाज अपने विकास के क्रम में ज्ञान के अपने संस्रोत विकसित करता है , जो समझने की अन्त : दृष्टि देते हैं । किन्तु भारतीय समाज को समझने की जो दृष्टियाँ हैं उनमें औपनिवेशिकता एवं पश्चिमी ज्ञान संदर्भो की भरमार है । हमें अपने समाज को समझने के लिए देशज चिन्तन दृष्टि की आवश्यकता है । यह पुस्तक समाज विज्ञान के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण देशज चिन्तन दृष्टियों को मुख्य विमर्श का हिस्सा बनाने का एक छोटा सा प्रयास है जो कि अभी तक साहित्य , लोक या गल्प के नाम पर हाशिए पर रही हैं ।
Book Details
-
ISBN9789390625901
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: बीसवीं सदी के विश्व-कवियों में पाब्लो नेरुदा, नाज़िम हिकमत, ब्रेख़्त और महमूद दरवेश के साथ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का नाम अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और बांग्लादेश अर्थात् इस महाद्वीप के कवियों में रवीन्द्रनाथ टैगोर और इक़बाल के बाद फ़ैज़ को ही हम लोग याद करते हैं। फ़ैज़ आज़ादी, समाजवाद, सहज मानवीय ममता और गहरी प्रेमानुभूति के शायर के रूप में मशहूर रहे हैं। उनकी ग़ज़लें और नज़्में लोगों की स्मृतियों में बस गई हैं और उनकी ज़बान पर चढ़ी हुई हैं। फ़ैज़ की शायरी आम लोगों की मुसीबतों, संघर्षों और अटूट संकल्पों की ऐसी गाथा है जिसे उर्दू ही नहीं, हिन्दी के पाठक भी अपनी साहित्यिक विरासत का हिस्सा मानते हैं। फ़ैज़ के क़लमकार और शायर के सम्पूर्ण रचनाकर्म पर हिन्दी में यह पहली आलोचनात्मक पुस्तक है। इस किताब में उनके समकालीन मुल्कराज आनन्द, सिब्ते हसन, सज्जाद ज़हीर, वज़ीर आगा के लेख तो हैं ही, उनके अलावा उर्दू के बड़े लेखकों में मुहम्मद हसन, शमीम हनफ़ी, अली मुहम्मद सिद्दीक़ी, जुबैर रिज़वी, शमीम फ़ैज़ी और अली अहमद फ़ातमी की आलोचनात्मक कृतियाँ इस पुस्तक में संकलित कर ली गई हैं। इस किताब की दूसरी बड़ी ख़ूबी यह है कि शमशेर बहादुर सिंह के बाद इसमें हिन्दी के अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाकारों ने जन्मशताब्दी वर्ष में फ़ैज़ पर पहली बार लिखा है। मसलन केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, असग़र वजाहत, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, मनमोहन, असद ज़ैदी, कृष्ण कल्पित, अरुण कमल, प्रणय कृष्ण, वैभव सिंह के लेखों के साथ तीनों सम्पादकों की अलग-अलग ढंग से लिखी आलोचनात्मक कृतियाँ इस किताब का विशेष आकर्षण हैं। दृश्य-श्रव्य कलाओं के मर्मज्ञ सुहैल हाशमी, इतिहासकार ज़हूर सिद्दीक़ी, युवा लेखिका अर्जुमंद आरा और पंजाबी के मशहूर लेखक सतिन्दर सिंह नूर के लेखों के कारण इस किताब में अनेक अनछुए प्रसंगों पर भी भरपूर चर्चा की गई है। इस पुस्तक को छह लेखकों-विद्धानों की टोली ने भरपूर मेहनत के साथ तैयार किया है। इनमें तीन सम्पादक हैं जिन्हें रेखा अवस्थी, जवरी मल्ल पारख और संजीव कुमार जैसे सहयोगी सम्पादकों के कठिन अध्यवसाय और परिश्रम की सहायता मिलती रही है। हिन्दी-उर्दू और पंजाबी भाषी लोग इस पुस्तक को अवश्य ही पसन्द करेंगे।
Acharya Shukla : Pratinidhi Nibandha
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

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Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के अनन्य निबन्धकार हैं। साहित्यिक, शास्त्रीय और शैक्षिक दृष्टि से उनके निबन्धों का अध्ययन अनिवार्य है, पर उनके प्रतिनिधि निबन्धों का एक भी संकलन ऐसा नहीं है जो उनकी विधायिनी प्रतिभा का सम्यक् परिचय दे सके। इस परिप्रेक्ष्य में ‘आचार्य शुक्ल : प्रतिनिधि निबन्ध’ बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि शुक्ल जी की प्राय: सभी उपलब्ध और अनुपलब्ध कृतियों का प्रतिनिधित्व करती है यह पुस्तक।
पुस्तक में शुक्ल जी के प्रतिनिधि निबन्धों को तीन भागों में बाँटा गया है—वैचारिक निबन्ध, सैद्धान्तिक निबन्ध और व्यावहारिक निबन्ध। संकलन के आधार हैं—‘बुद्ध चरित’, ‘विश्व प्रपंच’, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, ‘रस-मीमांसा’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘हिन्दी निबन्ध माला’, ‘भारतेन्दु साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘चिन्तामणि’ (भाग—दो), ‘सूरदास’ आदि। संकलन का प्रारम्भिक निबन्ध उनके ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ से संगृहित है। यह लेख उनकी दृष्टि से निबन्ध का मानदंड प्रस्तुत करता है। इसे संग्रह की प्रस्तावना के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। काव्य-क्रम की दृष्टि से भी प्रारम्भ से लेकर उनके जीवन के अन्तिम समय तक लिखे गए निबन्धों का पुस्तक में समावेश किया गया है। भाषा, साहित्य शास्त्र तथा हिन्दी के भक्ति साहित्य से लेकर ‘कामायनी’ तक इन निबन्धों के विषय हैं। इसलिए उनकी व्यापक मान्यताओं और भेद में अभेद देखनेवाली तत्वग्राही दृष्टि का सम्यक् ये निबन्ध देते हैं। इस दृष्टि से इनकी परिधि बड़ी व्यापक है।
शुक्ल जी का सर्वोत्तम लेखन ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ का प्रकाशन है और आजन्म वे उससे सम्बद्ध भी रहे। इसलिए ‘सभा’ के वर्तनी सिद्धान्त का ही व्यवहार किया गया है, यथा—पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग और दो से अधिक सामासिक शब्दों में ही समास चिन्ह का प्रयोग। शुक्ल जी रखा न लिखकर ‘रक्खा’ लिखते थे ताकि देवनागरी के उच्चारण की वैज्ञानिकता—जो लिखा जाए, वही पढ़ा जाए—सुरक्षित रह सके, उसका भी पालन किया गया है।
परिशिष्टों में आचार्य शुक्ल का जीवन-वृत्त और कृतियों के संकेत-सूत्र दे दिए गए हैं और उनके निबन्धों का संक्षिप्त मूल्यांकन हिन्दी निबन्ध-परम्परा के परिवेश में कर दिया गया है। शोधार्थियों, अध्येताओं आदि के लिए संग्रहणीय और महत्त्वपूर्ण कृति।
Upanyason Ke Rachna Prasang
- Author Name:
Kushum Vashney
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- Description: ी भी कृति की रचना-प्रक्रिया को जानना बेहद दिलचस्प और रोमांचक होता है। मानस की कितनी ही गूढ़ और अनजानी परतों से होकर कोई रचना जन्म लेती है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने विभिन्न महत्त्वपूर्ण उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया की परख-पड़ताल की है। पुस्तक के पहले दो अध्याय— ‘अंकुरण : अनुभूति से अभिव्यक्ति बिन्दु तक की प्रक्रियाएँ’ और ‘अवतरण : अभिव्यक्ति की प्रक्रियाएँ’ में रचना-प्रक्रिया को समझने और विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है। इसमें देश-विदेश के बहुत से उपन्यासकारों के वक्तव्यों और विचारों को इसीलिए संकलित किया गया है ताकि भिन्न-भिन्न परिवेश और देश, विभिन्न संस्कृति और सभ्यता, विभिन्न भाषायी उपन्यासकारों के वक्तव्यों को आमने-सामने रखकर रचना-प्रक्रिया का सार्थक विश्लेषण किया जा सके। पुस्तक में संकलित ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ के अवतरण की कहानी विशेष उपलब्धि है जिसमें अमृतलाल नागर के इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास के रचना-प्रसंग की कथा बयान की गई है। पाठकों के लिए हमेशा ही काम आनेवाली एक महत्त्वपूर्ण कृति।
Anuvad Mimansa
- Author Name:
Nirmala Jain
- Book Type:

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Description:
साधारणत: और इधर ज़्यादातर लोग किसी पाठ को एक भाषा से दूसरी भाषा में उल्था करने को ही अनुवाद मान लेते हैं। हिन्दी में यह प्रवृत्ति और भी ज़्यादा देखने में आती है। बहुत कम ऐसे अनुवादक हैं जो अनुवाद को अगर रचना-कर्म नहीं तो कम से कम एक कौशल का भी दर्जा देते हों।
वरिष्ठ हिन्दी आलोचक निर्मला जैन की यह पुस्तक अनुवाद के रचनात्मक, कलात्मक और प्रविधिगत पहलुओं को विश्लेषित करते हुए उसकी महत्ता और गम्भीरता को बताती है। अनुवाद दरअसल क्या है, गद्य और पद्य के अनुवाद में क्या फ़र्क़ है; मानविकी और साहित्यिक विषयों का अनुवाद अन्य विषयों के सूचनापरक अनुवाद से किस तरह अलग होता है, उसमें अनुवादक को क्या सावधानी बरतनी होती है; एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में पाठ के भावान्तरण में क्या दिक़्क़तें आती हैं, लोकभाषा और बोलियों के किसी मानक भाषा में अनुवाद की चुनौतियाँ क्या हैं, और अनुवाद किस तरह सिर्फ़ पाठ के भाषान्तरण का नहीं, बल्कि भाषा की समृद्धि का भी साधन हो जाता है—इन सब बिन्दुओं पर विचार करते हुए यह पुस्तक अनुवाद के इच्छुक अध्येताओं के लिए एक विस्तृत समझ प्रदान करती है।
निर्मला जी की समर्थ भाषा और व्यापक अध्ययन से यह विवेचन और भी बोधक और ग्राह्य हो जाता है। उदाहरणों और उद्धरणों के माध्यम से उन्होंने अपने मन्तव्य को स्पष्ट किया है, जिससे यह पुस्तक अनुवाद का कौशल विकसित करने में सहायक निर्देशिका के साथ-साथ अनुवाद-कर्म को लेकर एक विमर्श के स्तर पर पहुँच जाती है।
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