1857 Ke Pratham Swatantrata Sangram Ki Patrakarita
(0)
Author:
Prof. Neeraj Karna Singh, Yasir ArfatPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
250
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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का एक ऐसा दिव्य तथा भव्य अध्याय है, जिसमें धर्म, वर्ग, जातियों की सभी दीवारें ध्वस्त हो जाती हैं और जनसमूह के रूप में भारत की आत्मा मुखर होती है| अंग्रेजी तथा वामपंथी इतिहासकार भले ही इस महासमर को गदर या विद्रोह की संज्ञा दें, परंतु यह भारतीय आत्मा की आवाज थी। इस आवाज का स्पंदन सनातन राष्ट्र की पावन माटी के कण-कण में सुरभि- स्वरूप अनुभूत किया जा सकता है।जंग-ए-आजादी में जनचेतना और मनचेतना का कार्य हर स्तर पर हुआ। उस वक्त की व्रतधारी पत्रकारिता ने भी आजादी के पहले समर में क्रांति का बीजारोपण किया | जन-जन तक, मन-मन तक आजादी के समर को पहुँचाया और फिरंगी हुकूमत के खिलाफ उठ खड़े होने का शंखनाद किया | ऐसा शंखनाद, जिसने अनंत नभ में आजादी की क्रांति को हवा दी | उसी हवा को महसूस और आत्मसात् करने के लिए, इस युग के कोठि-कोटि जनों में समझ पैदा करने के उद्देश्य से और क्रांति की उस सुगंध से जोड़ने के लिए पत्रकारिता व्रत तथा दायित्व का दस्तावेज पुस्तक के रूप में आपके हाथों में है । यह पुस्तक केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि राष्ट्र और राष्ट्रगायकों को हमारी ओर से सादर शब्दांजलि है, भावांजलि है|
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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का एक ऐसा दिव्य तथा भव्य अध्याय है, जिसमें धर्म, वर्ग, जातियों की सभी दीवारें ध्वस्त हो जाती हैं और जनसमूह के रूप में भारत की आत्मा मुखर होती है| अंग्रेजी तथा वामपंथी इतिहासकार भले ही इस महासमर को गदर या विद्रोह की संज्ञा दें, परंतु यह भारतीय आत्मा की आवाज थी। इस आवाज का स्पंदन सनातन राष्ट्र की पावन माटी के कण-कण में सुरभि- स्वरूप अनुभूत किया जा सकता है।जंग-ए-आजादी में जनचेतना और मनचेतना का कार्य हर स्तर पर हुआ। उस वक्त की व्रतधारी पत्रकारिता ने भी आजादी के पहले समर में क्रांति का बीजारोपण किया | जन-जन तक, मन-मन तक आजादी के समर को पहुँचाया और फिरंगी हुकूमत के खिलाफ उठ खड़े होने का शंखनाद किया | ऐसा शंखनाद, जिसने अनंत नभ में आजादी की क्रांति को हवा दी | उसी हवा को महसूस और आत्मसात् करने के लिए, इस युग के कोठि-कोटि जनों में समझ पैदा करने के उद्देश्य से और क्रांति की उस सुगंध से जोड़ने के लिए पत्रकारिता व्रत तथा दायित्व का दस्तावेज पुस्तक के रूप में आपके हाथों में है । यह पुस्तक केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि राष्ट्र और राष्ट्रगायकों को हमारी ओर से सादर शब्दांजलि है, भावांजलि है|
Book Details
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ISBN9789355213853
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Pages184
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Murli Manohar Prasad Singh +1
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- Description: यह पुस्तक नागार्जुन के अन्तरंग जीवन, व्यक्तित्व और उनके सम्पूर्ण कृतित्व पर सृजनकर्मियों तथा समालोचकों द्वारा लिखे गए लेखों का संचयन-संकलन है। आत्म-साक्षात्कार के अन्तर्गत 'आईने के सामने' में बाबा नागार्जुन ने अपने ही व्यक्तित्व और सृजनधर्मी स्वभाव का खुलासा किया है। इसके अलावा मनोहर श्याम जोशी द्वारा बाबा से ली गई भेंटवार्ता तथा उनके ग्रामीण परिसर में परिवार समेत पूरे परिवेश का आँखों देखा हाल इब्बार रब्बी ने प्रस्तुत किया है। संस्मरण खंड के अन्तर्गत रामविलास शर्मा, रामशरण शर्मा मुंशी, शोभाकान्त, खगेन्द्र ठाकुर आदि की टिप्पणियाँ हैं। समालोचना खंड में अनेक ठोस साहित्यिक सन्दर्भों में तीस आलेखों का संचयन किया गया है। इन आलेखों में स्त्री-विमर्श, जनोन्मुख जीवन यथार्थ, संगीत तत्त्व, मूर्तिमत्ता और नागार्जुन के काव्य की व्यंग्यात्मकता पर विचार किया गया है। इस खंड में अन्तिम आलेख उनके मैथिली साहित्य पर केन्द्रित है। यह किताब नागार्जुन के कृतित्व के विविध पक्षों को उद्घाटित करती है, इसीलिए यह अपनी सार्थकता रखती है।
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