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Peechhe Firat Kahat Kabir-Kabir

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तुलसी के राम में अनीस के हुसैन की झलक देखनी हो, कबीर में क़ुरान की आयतों का असर समझना हो, अनीस के मर्सियों में संस्कृत शेरियात की तलाश हो, तुलसी और जायसी का मुवाज़ना करना हो, हसरत मोहानी के कन्हैया को भगतों की राधा में खोजना हो, फ़िराक़ गोरखपुरी में ब्रज और अवधी कविता के रूपकों और रसों को चिन्हित करना हो, अमीर ख़ुसरो और बारहमासा को एक दूसरे के तनाज़ुर में पहचानना हो, ज़ाकिर हुसैन और मोहम्मद मुजीब के ज़रिए जामिया के तालीमी कारनामों को उजागर करना हो, या भक्ति और सूफ़ी परम्पराओं पर अज़–सरे नौ रौशनी डालनी हो, इस किताब में मुजीब रिज़वी उर्दू-हिंदी साहित्य को नए पैमानों और नए कीर्तिमानों से स्थापित और विश्लेषित करते नज़र आते हैं। एक साथ हिंदी और उर्दू के आधुनिक और मध्ययुगीन विचारों, संस्कृत और फ़ारसी सिद्धांतों, सूफ़ी और भक्ति भावनाओं को सम्मिश्रित करने वाले वे शायद आख़िरी ऐसे विद्वान थे। इसीलिए वे जायसी में रूमी को और कबीर में क़ुरान और हाफ़िज़ को खोज निकालते हैं। तुलसी में फ़ारसी सूफ़ी अल्फ़ाज़ को ढूँढ़ते हैं और हिंदी/उर्दू की संरचना में फ़ारसियत की भूमिका को इंगित कर सकते हैं। हिंदुस्तान पर मुसलमानों के असर और मुसलमानों पर हिंदुस्तान जन्नतनिशान के प्रभावों को शायद इसके पहले इतने बृहद परिप्रेक्ष्य और परिदृश्य में नहीं देखा समझा गया। यह किताब भारतीय साहित्य और हिंद-इस्लामी संस्कृति को एक नए तर्ज़ और नए अंदाज़ से हमारे सामने रखते हुए हिंदुस्तानियत की एक नई और विलक्षण परिभाषा से हमें रूबरू कराती है।

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तुलसी के राम में अनीस के हुसैन की झलक देखनी हो, कबीर में क़ुरान की आयतों का असर समझना हो, अनीस के मर्सियों में संस्कृत शेरियात की तलाश हो, तुलसी और जायसी का मुवाज़ना करना हो, हसरत मोहानी के कन्हैया को भगतों की राधा में खोजना हो, फ़िराक़ गोरखपुरी में ब्रज और अवधी कविता के रूपकों और रसों को चिन्हित करना हो, अमीर ख़ुसरो और बारहमासा को एक दूसरे के तनाज़ुर में पहचानना हो, ज़ाकिर हुसैन और मोहम्मद मुजीब के ज़रिए जामिया के तालीमी कारनामों को उजागर करना हो, या भक्ति और सूफ़ी परम्पराओं पर अज़–सरे नौ रौशनी डालनी हो, इस किताब में मुजीब रिज़वी उर्दू-हिंदी साहित्य को नए पैमानों और नए कीर्तिमानों से स्थापित और विश्लेषित करते नज़र आते हैं। एक साथ हिंदी और उर्दू के आधुनिक और मध्ययुगीन विचारों, संस्कृत और फ़ारसी सिद्धांतों, सूफ़ी और भक्ति भावनाओं को सम्मिश्रित करने वाले वे शायद आख़िरी ऐसे विद्वान थे। इसीलिए वे जायसी में रूमी को और कबीर में क़ुरान और हाफ़िज़ को खोज निकालते हैं। तुलसी में फ़ारसी सूफ़ी अल्फ़ाज़ को ढूँढ़ते हैं और हिंदी/उर्दू की संरचना में फ़ारसियत की भूमिका को इंगित कर सकते हैं। हिंदुस्तान पर मुसलमानों के असर और मुसलमानों पर हिंदुस्तान जन्नतनिशान के प्रभावों को शायद इसके पहले इतने बृहद परिप्रेक्ष्य और परिदृश्य में नहीं देखा समझा गया। यह किताब भारतीय साहित्य और हिंद-इस्लामी संस्कृति को एक नए तर्ज़ और नए अंदाज़ से हमारे सामने रखते हुए हिंदुस्तानियत की एक नई और विलक्षण परिभाषा से हमें रूबरू कराती है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2022
Weight
262 grams
ISBN-13
9789390971732
Pages
224
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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