Hindi Kriyaon Ki Roop-Rachana
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Author:
Badrinath KapoorPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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हिन्दी के आरम्भिक व्याकरण यूरोपीय विद्वानों ने लिखे थे। इन व्याकरणों को लिखने में उन्होंने वही पद्धति अपनाई, जिसमें उनके अपने व्याकरण लिखे गए थे। लौटिन पद्धति के उन व्याकरणों में पदों का वर्गीकरण अर्थमूलक आधार पर ही होता था। बाद में जब हिन्दी भाषाभाषी विद्वानों ने व्याकरण लिखे तो उन्होंने भी जाने-अनजाने पूर्वलिखित व्याकरणों को आधार बनाया। भारतीय प्राचीन पद्धति पदों का विवेचन तथा वर्गीकरण उनकी रूप-रचना के आधार पर ही करती थी। विश्वविख्यात ‘अष्टाध्यायी’ इसका ज्वलन्त प्रमाण है। प्रस्तुत पुस्तक में क्रियापदों के सभी वर्गीकरण पदों की रूप-रचना पर ही आधारित हैं। एकपदीय और द्विपदीय क्रियापद, विकारी और अविकारी क्रियापद, कर्तृ अनुगामी और कर्मादि-अनुगामी क्रियापद, कर्तृवाच्य और कर्मादिवाच्य क्रियापद आदि सभी वर्गीकरणों का आधार पूर्णतः उनकी रूप-रचना ही है।
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हिन्दी के आरम्भिक व्याकरण यूरोपीय विद्वानों ने लिखे थे। इन व्याकरणों को लिखने में उन्होंने वही पद्धति अपनाई, जिसमें उनके अपने व्याकरण लिखे गए थे। लौटिन पद्धति के उन व्याकरणों में पदों का वर्गीकरण अर्थमूलक आधार पर ही होता था। बाद में जब हिन्दी भाषाभाषी विद्वानों ने व्याकरण लिखे तो उन्होंने भी जाने-अनजाने पूर्वलिखित व्याकरणों को आधार बनाया। भारतीय प्राचीन पद्धति पदों का विवेचन तथा वर्गीकरण उनकी रूप-रचना के आधार पर ही करती थी। विश्वविख्यात ‘अष्टाध्यायी’ इसका ज्वलन्त प्रमाण है।
प्रस्तुत पुस्तक में क्रियापदों के सभी वर्गीकरण पदों की रूप-रचना पर ही आधारित हैं। एकपदीय और द्विपदीय क्रियापद, विकारी और अविकारी क्रियापद, कर्तृ अनुगामी और कर्मादि-अनुगामी क्रियापद, कर्तृवाच्य और कर्मादिवाच्य क्रियापद आदि सभी वर्गीकरणों का आधार पूर्णतः उनकी रूप-रचना ही है।
Book Details
-
ISBN9789352211388
-
Pages156
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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द्विवेदी जी ने अपने साहित्यिक जीवन में सबसे पहले अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन किया और बड़ी मेहनत से ‘सम्पत्ति शास्त्र’ नामक पुस्तक लिखी। इसीलिए द्विवेदी जी बहुत-से ऐसे विषयों पर टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर लेख लिखे।
राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिन्तन में कहाँ आगे बढ़े और कहाँ पिछड़े हैं। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। उनके कार्य का मूल्यांकन व्यापक हिन्दी नवजागरण के सन्दर्भ में ही सम्भव है।
डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा रचित इस कालजयी पुस्तक के पाँच भाग हैं। पहले भाग में भारत और साम्राज्यवाद के सम्बन्ध में द्विवेदी जी ने और ‘सरस्वती’ के लेखकों ने जो कुछ कहा है, उसका विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। दूसरे भाग में रूढ़िवाद से संघर्ष, वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और प्राचीन दार्शनिक चिन्तन के मूल्यांकन का विवेचन है। तीसरे भाग में भाषा-समस्या को लेकर द्विवेदी जी ने जो कुछ लिखा है, उसकी छानबीन की गई है। चौथे भाग में साहित्य-सम्बन्धी आलोचना का परिचय दिया गया है। पाँचवें भाग में द्विवेदी-युग के साहित्य की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है।
बहुत-सी समस्याएँ जो द्विवेदी जी के समय में थीं, आज भी विद्यमान हैं। इसीलिए आज के सन्दर्भ में भी इस पुस्तक की सार्थकता और उपयोगिता अक्षुण्ण है।
Bhasha Evam Bhasha Vigyan
- Author Name:
Mahavir Saran Jain
- Book Type:

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इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है। पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान । देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है.... मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.। महावीर सरन जैन इस पुस्तक में भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों, छात्रों तथा अनुसन्धान कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत है। विगत पाँच दशकों में मैंने भाषाविज्ञान के क्षेत्र में देश तथा विदेशों में जो अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान कार्य किया है यह पुस्तक उसका परिणाम है। पुस्तक में संचार तथा संप्रेषण के संबंध में मानव भाषा के निर्माण और विकास के संबंध में, भाषा विज्ञान में विवेच्य भाषा के अभिलक्षण (परिभाषा) स्वरूप तथा विशेषताओं, भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार, भाषा-संरचना एवं भाषिक प्रकार्य की विवेचना, भाषा तथा व्यक्ति और समाज/भाषा और विचार/भाषा और संस्कृति तथा भाषा और साहित्य के संबंध में, भाषा-क्षेत्र एवं भाषा के विविध रूपों के संबंध में विश्व के भाषा-परिवारों की विवेचना, भारत - यूरोपीय भाषा-परिवार के संबंध में विचार, भाषा विज्ञान के नामकरण, परिभाषा, स्वरूप एवं व्याप्ति अथवा अध्ययन-क्षेत्र के संबंध में, भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ अथवा भाषा-अध्ययन की दिशाओं के संबंध में, भाषा विज्ञान के प्रमुख विभागों अथवा भाषा विज्ञान की प्रमुख शाखाओं के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत ध्वनि विज्ञान अथवा स्वन विज्ञान, स्वनिम विज्ञान, रूपिम विज्ञान, वाक्य विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान की शाखाओं में भाषा शिक्षण, अनुवाद विज्ञान, कोश विज्ञान प्रमुख हैं। भाषा विज्ञान से संबंधित अध्ययन विभाग हैं - मनोभाषाविज्ञान, मानवजाति, भाषा- विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान, शैली विज्ञान । देवनागरी लिपि की विशेषताओं, वैज्ञानिकता एवं मानकीकरण के सम्बन्ध में विचार तथा प्रमुख वैयाकरणों एवं प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों की विवेचना की गई है.... मुझे विश्वास है कि हिन्दी जगत में इस पुस्तक का स्वागत होगा.। महावीर सरन जैन
Katha-Samay Mein Teen Hamsafar
- Author Name:
Nirmala Jain
- Book Type:

- Description:
अलग परिवेश और पृष्ठभूमियों से आर्इं हिन्दी की तीन शीर्षस्थ लेखिकाएँ जिन्होंने बिना किसी आन्दोलनात्मक तेवर के और बग़ैर किसी आन्दोलनकारी समूह के सहयोग के, पाठकों के संसार में अपनी जगह बनाई। उन्होंने हमें अनेक कालजयी रचनाएँ दीं।
कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और उषा प्रियंवदा—नई कहानी के आरम्भिक दौर में, ‘लेकिन नई कहानी’ आन्दोलन की छाया से बाहर अपनी निजी शैली, और अपने विशिष्ट तेवर के साथ अपनी पहचान बनानेवाले तीन बड़े नाम। यह पुस्तक इन तीनों की सहगामी, मित्र और गम्भीर पाठक रहीं प्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन द्वारा इनकी बुनत, उनके पाठ की बनावट और कृतियों के वैशिष्ट्य को समझने का प्रयास है।
निर्मला जी का कहना है : ‘‘कुल जमा क़िस्सा यह कि ‘नई कहानी’ को सुनियोजित आन्दोलन के रूप में चलाने की योजना जिन लोगों ने बनाई उन्हीं के समानान्तर बिना किसी आन्दोलनात्मक तेवर या मुद्रा अख्तियार किए, ये तीनों महिलाएँ पूरी निष्ठा और समर्पित मनोभाव से कहानियाँ लिख रही थीं।’’ ‘‘उन्होंने कभी कोई परचम नहीं लहराया, सैद्धान्तिक फिकरेबाजी नहीं की। ‘स्त्रीवाद’ या ‘महिला लेखन’ के नाम पर कोई आरक्षित वर्ग खड़ा नहीं किया। किसी अतिरिक्त रियायत की अपेक्षा नहीं की।’’
ऐसी आत्मसम्भवा रचनाकारों पर उतनी ही बेबाक और स्वतंत्र चिन्तक निर्मला जैन की यह पुस्तक इन कृतिकारों के विषय में सोचने–समझने के लिए प्रस्थान बिन्दु की तरह है।
‘नई कहानी’ दौर की एक विशिष्ट कथा–त्रयी की रचनात्मकता पर एक मानक कलम से उतरी अनूठी आलोचना कृति।
Kavita Ke Naye Pratiman
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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‘कविता के नए प्रतिमान’ में समकालीन हिन्दी आलोचना के अन्तर्गत व्याप्त मूल्यान्ध वातावरण का विश्लेषण करते हुए उन काव्यमूल्यों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जो आज की स्थिति के लिए प्रासंगिक हैं।
प्रथम खंड के अन्तर्गत विशेषतः ‘तारसप्तक’, ‘कामायनी’, ‘उर्वशी’ आदि कृतियों और सामान्यतः छायावादोत्तर कविता की उपलब्धियों को लेकर पिछले दो दशकों में जो विवाद हुए हैं, उनमें टकरानेवाले मूल्यों की पड़ताल की गई है; और इस प्रसंग में नए दावे के साथ प्रस्तुत ‘रस सिद्धान्त’ की प्रसंगानुकूलता पर भी विचार किया गया है।
दूसरे खंड में ‘कविता के नए प्रतिमान’ के नाम पर प्रस्तुत अनुभूति की ‘प्रामाणिकता’, ‘ईमानदारी’, ‘जटिलता’, ‘द्वन्द्व’, ‘तनाव’, ‘विसंगति’, ‘विडम्बना’, ‘सर्जनात्मक भाषा’, ‘बिम्बात्मकता’, ‘सपाटबयानी’, ‘फ़ैंटेसी’, ‘नाटकीयता’ आदि आलोचनात्मक पदों की सार्थकता का परीक्षण किया गया है। इस प्रक्रिया में यथाप्रसंग कुछ कविताओं की संक्षिप्त अर्थमीमांसा भी की गई है, जिनसे लेखक द्वारा समर्थित काव्य-मूल्यों की प्रतीति होती है।
निष्कर्ष स्वरूप नए प्रतिमान एक जगह सूत्रबद्ध नहीं हैं, क्योंकि लेखक इस प्रकार के रूढ़ि-निर्माण को अनुपयोगी ही नहीं, बल्कि घातक समझता है। मुख्य बल काव्यार्थ ग्रहण की उस प्रक्रिया पर है जो अनुभव के खुलेपन के बावजूद सही अर्थमीमांसा के द्वारा मूल्यबोध के विकास में सहायक होती है।
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