Itihas Aur Aalochana
Author:
Namvar SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 636
₹
795
Available
‘इतिहास और आलोचना’ स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य के प्रथम दशक में साहित्य के प्रगतिशील मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए किए जानेवाले संघर्ष का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। आरम्भ के आठ निबन्धों में उन व्यक्ति-स्वातंत्र्यवादी साहित्यिक मान्यताओं का तर्कपूर्ण खंडन किया गया है जो शीतयुद्ध की राजनीति के प्रभाव में साहित्य के अन्दर वास्तविकता के स्थान पर ‘अनुभूति’ को, वस्तु के ऊपर रूप को और व्यापकता से अधिक गहराई को स्थापित करने का प्रयत्न कर रही थीं। अन्त के चार निबन्धों में इतिहास के एक नए दृष्टिकोण के साथ साहित्यिक इतिहास के पुनर्मूल्यांकन की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है, जिससे समकालीन समस्याओं के समाधान के लिए एक वस्तुगत सैद्धान्तिक आधार उपलब्ध होता है। नई कविता और छायावाद के कुछ पक्षों की व्यावहारिक आलोचना इस ग्रन्थ का अतिरिक्त आकर्षण है। कुल मिलाकर विचारों की ताज़गी और द्वन्द्वात्मक विवेचन शैली के कारण ‘इतिहास और आलोचना’ आज भी प्रासंगिक पुस्तक है।
ISBN: 9788126705108
Pages: 179
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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इन लेखों के केन्द्र में केवल साहित्यकार नहीं हैं। पत्रकारिता के साथ कुछ ऐसे व्यक्तियों का ज़िक्र भी है जिनमें आदर्शों की झलक दिखाई देती है। मौसाजी, मास्साब रामचन्द्रजी और नेमिचन्द भावुक पर लिखते समय नन्द चतुर्वेदी ने यह ध्यान रखा है। यह कहना ज़रूरी है कि लेखों की भाषा में पर्याप्त पारदर्शिता है, जिससे अर्थ चमक उठता है, जैसे—'पोप और शंकराचार्य शान्ति और सद्भाव की प्रार्थनाओं के बावजूद वास्तविकताओं की बात नहीं करते और न उन व्यवस्थापकों को अपराधी करार देते हैं जो शोषकों के अगुआ हैं। ईश्वर को आगे करने से इस सारी व्यवस्था के अपराधी चरित्र को वैधता हासिल होती है और शोषकों को हैसियत मिल जाती है।’ इन लेखों को पढ़ते हुए ‘संवाद’ की अनुभूति होती है, यह बहुत सुखद है।
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- Description: प्रकति में जब भूकंप या सूनामी इत्यादि आपदाओं के कारण उथल-पुथल मचती है तो दुनिया के नक्शे में बदलाव होता है और जब कतिपय कारणों से सामाजिक वर्णों में युद्ध छिड़ता है तो समाज के स्तर पर दुनिया में बड़ा बदलाव आता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अनेक यूरोपीय और अफ्रीकी देशों की भू- सीमाओं और मानविकी में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ, जिससे स्थानीय सभ्यता और संस्कृति पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। दूसरे विश्वयुद्ध ने आग में घी का काम किया और पूरी दुनिया को प्रभावित किया। भारत के आजादी के संग्राम और उसके बाद भारत का विभाजन कर पाकिस्तान बनाया गया--उस दौरान हुए भीषण संघर्ष में न केवल दुनिया के नक्शे पर एक नए देश का आविर्भाव हुआ, वरन् भयंकर रक्तक्रांति भी हुईं। इसने आगामी अनेक वर्षों तक मानव सभ्यता को प्रभावित किया। दरअसल जब से दुनिया बनी है, युद्ध कहीं-न-कहीं होते रहे हैं। आज भी अनेक देश युद्ध की आग में झुलस रहे हैं--सीरिया संकट, उत्तर कोरिया संकट, अफगानिस्तान में तालिबान संकट, भारत- पाक तना-तनी, इजराइल-फिलिस्तीन संकट। दुनिया में अमन-शांति के लिए आवश्यक है कि मानवहित में इन युद्धों पर पूर्णविराम लगे।
Kalidas Ki Lalitya Yojana
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description: कालिदास का स्थान भारतीय वाङ्मय में ही नहीं, अपितु विश्व-साहित्य में अप्रतिम माना गया है। उनके काव्य में उपमा का वैशिष्ट्य विलक्षण है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस पुस्तक के निबन्धों में कालिदास के काव्य का विशद विवेचन करते हुए उसके गुणों पर मौलिक प्रकाश डाला है। कालिदास के साहित्य में अवगाहन कर अमूल्य मणियों को खोज निकालना साधारण कार्य नहीं है। द्विवेदी जी ने यह असाधारण साध्य कर प्रकांड पांडित्य का परिचय दिया है कालिदास के काव्य की सूक्ष्म-से-सूक्ष्म विशेषता को पंडित जी ने पूर्ण कला-कौशल के साथ उपस्थित किया है। सर्वत्र श्लोकों के उद्धरण देकर उन्होंने महाकवि की लालित्य-योजना को उजागर कर दिया है। कालिदास के काव्य का रसास्वादन करनेवाले विद्वानों को ‘कालिदास की लालित्य-योजना’ पढ़कर अपनी सुखानुभूति द्विगुणित करने का लाभ सहज ही प्राप्त होगा।
Aadhunik Hindi Sahitya Ka Itihas
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

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Description:
आधुनिक युग इतनी तेजी से बदल रहा है कि साहित्य के बदलाव से भी उसे समझा जा सकता है। इस बदलाव को, क्षिप्रतर बदलाव को साहित्य और इतिहास दोनों के संदर्भों में एक साथ पकड़ना ही इतिहास है। यह पकड़ तब तक विश्वसनीय नहीं हो सकती जब तक समसामयिक अखबारी साहित्य को श्रेष्ठ भविष्योन्मुखी साहित्य से अलगाया न जाय। प्रत्येक युग का आधुनिक काल ऐसे साहित्य से भरा रहता है जो साहित्येतिहास के दायरे में नहीं आता। किन्तु यह जरूरी नहीं है कि हम अपने इतिहास के लिए ग्रंथों का जो अनुक्रम प्रस्तुत करेंगे वह कल भी ठीक होगा, अपरिवर्तनीय होगा।
इस नये संस्करण में कुछ पुरानी बातों को बदल दिया गया है और नये तथ्यों के आधार पर उनका नया अर्थापन किया गया है। इस संस्करण को अद्यतन बनाने के लिए बहुत सारे लेखकों, कवियों और रचनाकारों को भी सम्मिलित कर लिया गया है अब यह अद्यतन रूप में आपके सामने है।
Anubhav Aur Utkarsh
- Author Name:
Aarti
- Book Type:

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Description:
जीवन को पढ़ने के दो प्रमुख रास्ते हैं—संसार और साहित्य। संसार का संसरण और शब्द और अर्थ का ठीक-ठीक मेल हमारे अस्तित्व की निरन्तर परिवर्तित अवस्थाओं का न केवल प्रकटीकरण है बल्कि अन्वेषण भी। यदि कोई कलाकृति हमें नवीन दृष्टिबोध का उल्लास-अनुभव देने में असमर्थ है, तो जान लीजिए, वह केवल एक स्नायविक हलचल भर है, रचनात्मक अनुष्ठान की प्रक्रिया नहीं।
किसी साहित्यिक पत्रिका के सम्पादकीय में यदि हर बार अनेक चिन्तनपरक, हृदयग्राही सूक्त-वाक्य पढ़ने को मिलें, तो बहुत सम्भव है, आप भी मेरी तरह
डॉ. ब्रजरतन जोशी के सम्पादकीय पढ़ते हों। ऐसे विरल, साफ और स्पष्ट चिन्तन को समग्रता में पुस्तकाकार रूप में देखना मेरे लिए सुखद अनुभव है।
यह निश्चित ही डॉ. ब्रजरतन जोशी की अकादमिक दक्षता है जिसने उनके सुघड़ सम्पादन में राजस्थान साहित्य अकादेमी की पत्रिका ‘मधुमती’ को समकालीन साहित्य के लिए एक उर्वर और विचारोत्तेजक जमीन तैयार करने की निपुणता दी है।
अपने इन लेखों में एक ओर वह सांस्कृतिक विषय उठाते हैं, दूसरी ओर विभिन्न विभूतियों के अवदान को रेखांकित करते हैं। मसलन ‘ग्रन्थमालाएँ और साहित्य’ या ‘आयोजन का मर्म’ विषय पर उनके उद्घाटन पढ़िए और उसके साथ गांधी, विवेकानन्द पर उनकी टीप। इसी तरह ‘साहित्य पगडंडी है, मार्ग नहीं’ के बरअक्स प्रसाद, रेणु और निर्मल पर लिखे उनके लेख पढ़ जाइए, आपके सामने एक बड़ा वितान स्वतः ही खुलता जाएगा। ज्ञान की विविध धाराओं पर डॉ. जोशी की जानकारी और पकड़ विस्मित तो करती ही है, समग्रता में अपनी परम्परा को जानने के लिए उल्लसित भी करती है।
—गगन गिल
Kuchh Purvgrah
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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Description:
वर्षों से हिन्दी आलोचना में जो नाम छाए रहे हैं, उनमें एक नाम निश्चय ही अशोक वाजपेयी का है। कविता के लिए उनका पूर्वग्रह अब कुख्यात ही है। उन्होंने उसकी आलोचना, प्रकाशन और प्रसार के लिए जितने व्यापक और सुचिन्तित रूप से काम किया है, उतना शायद ही किसी ने किया हो।
1970 में उनकी पहली आलोचना-पुस्तक ‘फिलहाल’ ने हिन्दी आलोचना को तेज़ी और सार्थक आलोचना-भाषा दी थी जिसका व्यापक प्रभाव आज तक देखा जा सकता है। ‘फिलहाल’ के कई संस्करण निकलना इस बात का प्रमाण है कि समकालीन कविता की आलोचना में उसे एक उद्गम-ग्रन्थ की मान्यता मिली है।
इस बीच अशोक वाजपेयी ने 1974 से भोपाल से बहुचर्चित आलोचना पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ का सम्पादन और प्रकाशन आरम्भ किया। हिन्दी की समकालीन साहित्य-संस्कृति में इस प्रयत्न का ऐतिहासिक महत्त्व है। इस पुस्तक की अधिकांश सामग्री ‘पूर्वग्रह’ में ही प्रकाशित हुई है। कम लिखकर भी कारगर हस्तक्षेप कर पाने में वे सक्षम हैं, यह इसका प्रमाण है।
कविता, साहित्य और संस्कृति के लिए अपनी गहरी आसक्ति को अशोक वाजपेयी असाधारण स्पष्टता और सूक्ष्म संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करते हैं। हालाँकि हर हालत में अपने को ही सही मानने का उन्हें कोई मुग़ालता नहीं है। उनकी आलोचना आज की सृजनात्मकता को समझने और आगे बढ़ाने का एक उत्कट और विचारसम्पन्न प्रयत्न है। वे जो प्रश्न उठाते हैं या चुनौतियाँ सामने रखते हैं, वे आज की परिस्थितियों में केन्द्रीय हैं और उन्हें नज़रअन्दाज़ करना सम्भव नहीं है।
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