Ashok Ke Phool
(0)
Author:
Hazariprasad DwivediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
250
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भारतीय मनीषा के प्रतीक और साहित्य एवं संस्कृति के अप्रतिम व्याख्याकार माने जाते हैं और उनकी मूल निष्ठा भारत की पुरानी संस्कृति में है। लेकिन उनकी रचनाओं में आधुनिकता के साथ भी आश्चर्यजनक सामंजस्य पाया जाता है।</p> <p>‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ और ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ जैसी यशस्वी कृतियों के प्रणेता आचार्य द्विवेदी को उनके निबन्धों के लिए भी विशेष ख्याति मिली। निबन्धों में विषयानुसार शैली का प्रयोग करने में इन्हें अद्भुत क्षमता प्राप्त है। तत्सम शब्दों के साथ ठेठ ग्रामीण जीवन के शब्दों का सार्थक प्रयोग इनकी शैली का विशेष गुण है।</p> <p>भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष और विभिन्न धर्मों का उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया है जिसकी झलक पुस्तक में संकलित इन निबन्धों में मिलती है। छोटी-छोटी चीज़ों, विषयों का सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन और विश्लेषण-विवेचन उनकी निबन्ध-कला का विशिष्ट व मौलिक गुण है।</p> <p>निश्चय ही उनके निबन्धों का यह संग्रह पाठकों को न केवल पठनीय लगेगा, बल्कि उनकी सोच को एक रचनात्मक आयाम प्रदान करेगा।
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भारतीय मनीषा के प्रतीक और साहित्य एवं संस्कृति के अप्रतिम व्याख्याकार माने जाते हैं और उनकी मूल निष्ठा भारत की पुरानी संस्कृति में है। लेकिन उनकी रचनाओं में आधुनिकता के साथ भी आश्चर्यजनक सामंजस्य पाया जाता है।</p>
<p>‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ और ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ जैसी यशस्वी कृतियों के प्रणेता आचार्य द्विवेदी को उनके निबन्धों के लिए भी विशेष ख्याति मिली। निबन्धों में विषयानुसार शैली का प्रयोग करने में इन्हें अद्भुत क्षमता प्राप्त है। तत्सम शब्दों के साथ ठेठ ग्रामीण जीवन के शब्दों का सार्थक प्रयोग इनकी शैली का विशेष गुण है।</p>
<p>भारतीय संस्कृति, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष और विभिन्न धर्मों का उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया है जिसकी झलक पुस्तक में संकलित इन निबन्धों में मिलती है। छोटी-छोटी चीज़ों, विषयों का सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन और विश्लेषण-विवेचन उनकी निबन्ध-कला का विशिष्ट व मौलिक गुण है।</p>
<p>निश्चय ही उनके निबन्धों का यह संग्रह पाठकों को न केवल पठनीय लगेगा, बल्कि उनकी सोच को एक रचनात्मक आयाम प्रदान करेगा।
Book Details
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ISBN9788180317804
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Pages176
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: हिंदी के ऐतिहासिक संदर्भ में जहाँ अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिंदी महत्त्व है वहीं उसके स्वरूप-निर्धारण में उसकी उपभाषाओं-बोलियों का, विशेष रूप से ब्रजभाषा और अवधी का, अप्रतिम महत्त्व है। हिंदी की प्रमुख बोलियों और उनके पारस्परिक संबंध पर भी विवेचन प्रस्तुत किया गया है। हिंदी भाषा के मानकीकरण की समस्या भी है। प्रयोग क्षेत्र में हिंदी की कोई समानता नहीं है, जिसको हिंदी क्रियाओं के विविध प्रयोगों को लेकर प्रस्तुत किया गया है। इससे दो प्रयोगों में सूक्ष्म अंतर स्पष्ट हो सकेगा। शुद्ध हिंदी लिखने के लिए हिंदी व्याकरण के प्रमुख नियमों का ज्ञान भी आवश्यक है। अपनी अभिव्यक्ति का रंग-रूप निखारने के लिए व्याकरणसम्मत भाषा का प्रयोग अच्छा रहता है। पुस्तक की विषय-वस्तु बहुत सरल तथा सहज भाषा में प्रस्तुत की गई है, जिससे हिंदी भाषा के जिज्ञासु उससे अधिकाधिक लाभान्वित हो सकें।
Bharatiy Bhashanchi Anokhi Kahani
- Author Name:
Meghana Bhuskute +1
- Book Type:

- Description: पेगी मोहन वाचकाला भारतीय भाषांच्या दुनियेतल्या विलक्षण सफरीवर घेऊन जातात. भाषाविज्ञान आणि इतिहास या दोहोंची सांगड घालतात आणि गेल्या सहस्रकांमध्ये होत राहिलेल्या स्थलांतरांचा आपल्या बोलण्यावर आणि आपल्या बोलण्याच्या तऱ्हांवर कसकसा परिणाम होत गेला आहे, याचा शोध घेतात. ‘भारतीय भाषांची अनोखी कहाणी` हे पुस्तक समजायला सोपं तर आहेच, पण ते वाचणं आपल्या सगळ्यांसाठी आवश्यकही आहे. - टोनी जोसेफ अत्यंत स्वागतार्ह भर... मानवी समूहांच्या भाषा त्या समूहांइतक्याच गतिशील असतात... पेगी मोहन हा भारतीय उपखंडात झालेल्या प्राचीन स्थलांतरांचा वृत्तान्त भाषांच्या बदलत्या रूपाशी जोडून घेतात. शिवाय त्यांची नेमकी भाषिक निरीक्षणं... त्यातून या पुस्तकाला एखाद्या सुरस गोष्टीचं रूप येतं. तो एक आनंददायी अनुभव ठरतो. - माधव देशपांडे स्थलांतरं, नवीन प्रदेशात केलेल्या वस्त्या, मिश्र विवाह, आणि लोकांच्या सरमिसळीतून झालेला विविध भाषांचा जन्म या सगळ्याभोवती हे अतिशय विलक्षण पुस्तक फिरतं... इंडो-आर्यन लोकांच्या वसाहतींच्या भूलभुलैयामधून हिंडताना पेगी थेट शरलॉक होम्सप्रमाणे सूक्ष्म पुरावे गोळा करत जाते... भाषावैज्ञानिक इतिहासाबद्दलच्या पुस्तकांमधल्या सर्वाधिक वाचनीय पुस्तकांपैकी हे एक आहे. - अन्विता अब्बी Bharatiy Bhashanchi Anokhi Kahani | Peggy Mohan Translated By : Meghana Bhuskute भारतीय भाषांची अनोखी कहाणी : पेगी मोहन अनुवादकाचे नाव : - मेघना भुस्कुटे
Vikas Ke Path
- Author Name:
Nitin Gadkari
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Bhasha Vigyan : Hindi Bhasha Aur Lipi
- Author Name:
Ramkishor Sharma
- Book Type:

- Description: सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ भाषा प्रयोग के आयाम में विस्तार एवं सूक्ष्मता आई है। अपने सामाजिक परिवेश में सहज ढंग से सीखी गई मातृभाषा के द्वारा बृहत्तर विश्व-समाज के साथ सम्पर्क स्थापित करना सम्भव नहीं है। विश्व-समाज में भाषा व्यवहार के विविध सन्दर्भों को समझने के लिए भाषा-विज्ञान का अध्ययन आवश्यक हो गया है। भाषा की विविध प्रयुक्तियों, भाषा-चिन्तन की परम्परा, भाषा-संरचना के तत्त्वों, ध्वनि, शब्द, पद, अर्थ आदि क्षेत्रों में सम्पन्न भाषा वैज्ञानिक आधुनिकतम विचारों तथा निष्पत्तियों को एक साथ समाहित करनेवाली यह पुस्तक छात्रों, अनुसन्धानकर्ताओं तथा अन्य जिज्ञासुओं के लिए उपादेय होगी। हिन्दी-भाषा तथा लिपि पर भी इसमें बड़े विस्तार से विचार किया गया है। विषय को सुबोध बनाने के लिए परिचित उदाहरणों का सहारा लिया गया है, विषय की गम्भीरता तथा स्तर को सुरक्षित रखते हुए सरल, सुबोध भाषा शैली अपनाई गई। विवेचन क्रम में व्यर्थता का त्याग तथा आवश्यक सामग्री के ग्रहण का प्रयत्न रहा है। इसी आधार पर पुस्तक के कलेवर को संयमित किया गया है।
Mere Samay Ke Shabda
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
केदारनाथ सिंह हमारे समय के सुप्रतिष्ठित कवि हैं। उन्होंने समय-समय पर विभिन्न साहित्यिक विषयों पर विश्लेषणपूर्ण लेख लिखे हैं। कई बार तर्कपूर्ण विचारप्रवण टिप्पणियाँ की हैं। एक शीर्षस्थ कवि का यह गद्य-लेखन संवेदना व संरचना की दृष्टि से अनूठा है। ‘मेरे समय के शब्द’ में केदारनाथ सिंह की रचनाशीलता का यह सुखद आयाम उद्घाटित हुआ है।
प्रस्तुत पुस्तक में कविता की केन्द्रीय उपस्थिति है। हिन्दी आधुनिकता का अर्थ तलाशते हुए सुमित्रानन्दन पंत ज्ञेय, नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, रामविलास शर्मा और श्रीकान्त वर्मा आदि के कविता-जगत की थाह लगाई गई है। इस सन्दर्भ में ‘आचार्य शुक्ल की काव्य-दृष्टि और आधुनिक कविता’ लेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
इसके अनन्तर पाँच खंड हैं—‘पाश्चात्य आधुनिकता के कुछ रंग’, ‘कुछ टिप्पणियाँ’, ‘व्यक्ति-प्रसंग’, ‘स्मृतियाँ’ और ‘परिशिष्ट’। पहले खंड में एजरा पाउंड, रिल्के और रेने शा की कविता पर विचार करने के साथ समकालीन अंग्रेज़ी कविता का मर्मान्वेषण किया गया है। दूसरे खंड में विभिन्न विषयों पर की गई टिप्पणियाँ लघु लेख सरीखी हैं।
‘व्यक्ति-प्रसंग’ के दो लेख त्रिलोचन और नामवर सिंह का आत्मीय आकलन हैं। अज्ञेय, श्रीकान्त वर्मा
और सोमदत्त की ‘स्मृतियाँ’ समानधर्मिता की ऊष्मा से भरी हैं। ‘परिशिष्ट’ में तीन साक्षात्कार हैं। एक उत्तर में केदारनाथ सिंह कहते हैं, ‘...नई पीढ़ी को एक नई मुक्ति के एहसास के साथ लिखना चाहिए और अपने रचनाकर्म में सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए अपनी संवेदना और अपने विवेक पर।’
यह पुस्तक शब्द की समकालीन सक्रियता में निहित संवेदना और विवेक को भलीभाँति प्रकाशित करती है।
Aastha Aur Saundarya
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
डॉ. रामविलास शर्मा की यह मूल्यवान आलोचनात्मक कृति भारोपीय साहित्य और समाज में क्रियाशील आस्था और सौन्दर्य की अवधारणाओं का व्यापक विश्लेषण करती है। इस सन्दर्भ में रामविलास जी के इस कथन को रेखांकित किया जाना चाहिए कि अनास्था और सन्देहवाद साहित्य का कोई दार्शनिक मूल्य नहीं है, बल्कि वह यथार्थ जगत की सत्ता और मानव-संस्कृति के दीर्घकालीन अर्जित मूल्यों के अस्वीकार का ही प्रयास है। उनकी स्थापना है कि साहित्य और यथार्थ जगत का सम्बन्ध सदा से अभिन्न है और कलाकार जिस सौन्दर्य की सृष्टि करता है, वह किसी समाज-निरपेक्ष व्यक्ति की कल्पना की उपज न होकर विकासमान सामाजिक जीवन से उसके घनिष्ठ सम्बन्ध का परिणाम है।
रामविलास जी की इस कृति का पहला संस्करण 1961 में हुआ था। इस संस्करण में दो नए निबन्ध शामिल हैं। एक ‘गिरिजाकुमार माथुर की काव्ययात्रा के पुनर्मूल्यांकन’ और दूसरा ‘फ़्रांस की राज्यक्रान्ति तथा मानवजाति के सांस्कृतिक विकास की समस्या’ को लेकर। इस विस्तृत निबन्ध में लेखक ने दो महत्त्वपूर्ण सवालों पर ख़ास तौर से विचार किया है कि क्या मानवजाति के सांस्कृतिक विकास के लिए क्रान्ति आवश्यक है और फ़्रांस ही नहीं, रूस की समाजवादी क्रान्ति भी क्या इसके लिए ज़रूरी थी? कहना न होगा कि समाजवादी देशों की वर्तमान उथल-पुथल के सन्दर्भ में इन सवालों का आज एक विशिष्ट महत्त्व है।
संक्षेप में, यह एक ऐसी विवेचनात्मक कृति है जो किसी भी सौन्दर्य-सृष्टि की समाज-निरपेक्षता का खंडन करते हुए उसके सामाजिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों और आस्थावादी मूल्यों का तलस्पर्शी उद्घाटन करती है।
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