Shabd Parspar
Author:
Niranjan Dev SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
कृष्णा सोबती अद्वितीय लेखिका हैं। कहानी, उपन्यास, संस्मरण, साक्षात्कार, संवाद जिस भी विधा में उन्होंने काम किया, विलक्षण किया। शब्द की सत्ता पर उनका विश्वास अटूट है, और साहित्यिक तथा वास्तविक जीवन-व्यवहार में मानवीय मूल्यों के प्रति उनका आग्रह अबाध। वे अपने मूल्यों को लेखक के तौर पर भी जीती हैं, और नागरिक के तौर पर भी। जैसा कि इस पुस्तक में निरंजन देव ने लक्ष्य किया है, ‘शब्द कृष्णा सोबती की ताक़त रहे हैं और उनके विरोध और औज़ार भी...केवल रचनात्मक लेखन में नहीं, बल्कि पत्र तक प्रेषित करने के मामले में वह शब्दों की ताक़त और उनके चयन को लेकर सजग रही हैं।’</p>
<p>कृष्णा सोबती की विलक्षण उपस्थिति हिन्दी समाज को उचित गर्व का कारण देती है।</p>
<p>निरंजन देव ने इस विलक्षण उपस्थिति के सभी पहलुओं को परखने की कोशिश की है। आरम्भिक कहानियों से लेकर कृष्णा सोबती के हशमत अवतार तक पर, ‘बुद्ध का कमंडल’ तक पर निरंजन ने संवेदनशील आलोचनात्मकता से सम्पन्न विचार किया है। यह विचार कृष्णा सोबती के लेखकीय विकास का प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत करने के साथ ही, उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक सरोकारों का विश्वसनीय लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है।</p>
<p>कृष्णा सोबती के समग्र रचनात्मक अवदान पर केन्द्रित मुकम्मल किताब, बल्कि किताबों की ज़रूरत बनी हुई है, निरंजन देव की ‘शब्द परस्पर’ इस ज़रूरत को पूरी करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है। मुझे विश्वास है कि कृष्णा सोबती के पाठकों के बीच यह एक ज़रूरी किताब मानी जाएगी।
ISBN: 9788126727117
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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...परम्परा कोई विच्छिन्न क्रम नहीं है। उसका स्वाभाविक विकास निरन्तर होता रहता है। कई बार उसमें बड़े निर्णायक उभार दिखाई देते हैं, लेकिन वे स्वत: स्वतंत्र नहीं होते। वे बड़े वैचारिक द्वन्द्व के, सांस्कृतिक उथल–पुथल के प्रतिबिम्ब मात्र होते हैं। अनेक बार अतिरिक्त उत्साह के कारण हम बिना जाने ही अपनी परम्परा से विरासत में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ और अनुपयोगी मान बैठते हैं, जिससे हम उस शक्ति से वंचित हो जाते हैं जो हमारे साहित्य और सांस्कृतिक जगत की प्राण–धारा है।
डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी ने अपने आलोचनात्मक ग्रन्थ ‘भारतीय काव्यशास्त्र के नए क्षितिज’ में इसी शक्ति को, इसी प्राण–धारा को सुरक्षित रखने का गम्भीर प्रयास किया है। पुरातन मनीषा आज के साहित्यालोचन की कहाँ तक सहयात्री हो सकती है, यही मूल चिन्ता लेखक के सम्पूर्ण विश्लेषण में व्याप्त है।
लेखक ने अपने मंतव्य को कोरे सैद्धान्तिक कथनों में प्रकट न करके साहित्य के गम्भीर विश्लेषण के माध्यम से प्राचीन आचार्यों के वैचारिक मन्थन को सारग्राही, प्रौढ़ और आवश्यक सिद्ध किया है। यद्यपि विद्वान लेखक ने विभिन्न काव्य–सम्प्रदायों के आचार्यों का चिन्तन गवेषणापूर्ण ढंग से विश्लेषित किया है, किन्तु सर्वाधिक शक्तिशाली काव्य–सिद्धान्त के रूप में आचार्य आनन्दवर्द्धन रस–ध्वनि मत की अत्यन्त विशद और गूढ़ विवेचना को केन्द्र में रखा है।
आधुनिक काव्यशास्त्र के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों और समीक्षकों की सोच की व्यापक पड़ताल, उनके मतों की भारतीय सन्दर्भों में समीक्षा के द्वारा लेखक ने पुरातन चिन्तन की सार्थकता को सिद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है। इसी के साथ पौरस्त्य और पाश्चात्य की वैचारिकता के प्रस्थान बिन्दु, इलियट, क्रोचे आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा ने ग्रन्थ की उपादेयता और बढ़ा दी है।
Anuvad aur Uttar aadhunik avdharnaye
- Author Name:
Shrinarayan Sameer
- Book Type:

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Description:
अच्छा अनुवाद या कहें कि बेहतर अनुवाद हमेशा पाठ-भाषा के कलेवर से प्रस्थान होता है। उसका यह प्रस्थान मूल से निश्चित रूप से परिवर्तित और परिवर्द्धित होता है। उत्तर-आधुनिकता ने अनुवाद में मूल से परिवर्तन तथा परिवर्द्धन की पारम्परिक धीमी प्रक्रिया को एकदम से तेज़ कर दिया है। इससे अनुवाद के चाल-चरित्र में बदलाव आया है। विश्वग्राम के मौजूदा दौर में अनुवाद के क्षेत्र में आया बदलाव उसकी सीमा नहीं, बल्कि शक्ति और सामर्थ्य मानना चाहिए। ऐसे ही अनुवाद की अब माँग और धूम है।
प्रस्तुत पुस्तक में अनुवाद के इसी बदले रूप और रचाव पर भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और सूचनाक्रान्ति के परिप्रेक्ष्य में विचार किया गया है। इस क्रम में अनुवाद को उसके अनुप्रयुक्त पक्षों के आसंग से भी समझने का प्रयास किया गया है। यद्यपि इस प्रयास में तर्क और विचार का आलोचनात्मक ताप पुस्तक में यत्र-तत्र-सर्वत्र है, फिर भी अनुवाद के सरोकारों को लेकर यह पुस्तक जो ललित विमर्श रचती है, वह नायाब और बेजोड़ है। इसे एक बार पढ़ना अपने समय के संघात, समाज की जद्दोजहद और सभ्यता की करवट से रूबरू होना है। साथ ही भाषा के तक़ाज़े को आत्मा की अतल गहराइयों से महसूस करना है। पुनरपि, वैश्वीकरण के दौर में भाषा, आकांक्षा और राजनीति के सरोकारों को समझना तथा पक्षधरता को बेबाक और मानवीय बनाना भी है।
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