Bhartiya Dharmik Chetna Ke Ayam
Author:
Ravinandan SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 400
₹
500
Available
दुनिया के सभी धर्म एक ही दिशा में संकेत करते हैं। पूजा-पद्धतियाँ, धर्म-ग्रन्थ, धार्मिक सिद्धान्त संकेत मात्र हैं, किन्तु हम इन संकेतों को ही धर्म समझ लेते हैं और धर्मों की आन्तरिक एकता को समझ नहीं पाते। पूरी मनुष्य जाति धर्म के इन संकेतों को लेकर विभाजित एवं संघर्षरत है। ये संकेत जिस ओर इशारा करते हैं, उस गन्तव्य तक हमारी दृष्टि ही नहीं जा पाती। ऊपर से देखने पर पूरी मनुष्यता ही धार्मिक दिखाई पड़ती है, किन्तु ऐसा वास्तविकता में नहीं है। अगर ऐसा होता तो दुनिया के सारे दुःख-सन्ताप मिट जाते। किन्तु बाहर धर्म के संकेतों में वृद्धि हो रही है और उसी अनुपात में मनुष्य अशान्त होता जा रहा है।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक धर्म के संकेतों के माध्यम से भारत की सर्वांगीण चेतना को समझने की कोशिश करती है। प्रागैतिहासिक युग से अब तक भारत की धार्मिक चेतना को क्रमिक रूप से उद्घाटित करना ही पुस्तक का उद्देश्य है। इस विषय पर सामग्री बिखरी होने के कारण विद्यार्थी एवं शोधार्थियों को कठिनाई होती है। इस कठिनाई से निजात पाने की कोशिश में ही इस पुस्तक की रचना हुई है। भारतीय इतिहास के कालक्रमानुसार नवीनतम अनुसन्धानों एवं शोधों को सम्मिलित करते हुए पुस्तक को समृद्ध बनाया गया है। यह पुस्तक सिविल सेवा के प्रतियोगी छात्रों, विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों के भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के छात्रों तथा सामान्य जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त लाभप्रद एवं उपयोगी है।
ISBN: 9789352210862
Pages: 240
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘दूसरी दुनिया’ निर्मल वर्मा की चर्चित और पाठक-प्रिय रचनाओं का संकलन है। यात्रावृत्त, कहानी, डायरी और चिन्तनपरक निबन्धों का यह चयन स्वयं निर्मल जी ने किया था, जिसमें ज़ाहिर है, उनकी वे रचनाएँ शामिल हैं जो उन्हें स्वयं भी प्रिय थीं।
कहना ग़लत न होगा कि निर्मल जी ने हिन्दी गद्य को जो ऊष्मा दी, वह पाठक को एक जीवित इकाई की तरह आकर्षित करती है। कहानी हो या निबन्ध या फिर यात्रा-कथाएँ, कहीं भी निर्मल वर्मा का पाठक उस आन्तरिक छुअन और साहचर्य से वंचित नहीं रहता, जो उनका गद्य उसे उपलब्ध कराता है।
कई लोग कहते हैं कि आप निर्मल जी का एक वाक्य पढ़ते हैं, और अपनी दुनिया से उठकर उनकी रची हुई दुनिया में चले जाते हैं। कभी पात्रों के साथ जीते हुए, कभी उस परिवेश को महसूस करते हुए जिसकी रचना वे उन्हीं शब्दों और वाक्यों में करते हैं, जिनसे हम हमेशा से परिचित थे, लेकिन जो पहले कभी इतने प्रभावशाली नहीं लगे थे।
यह पुस्तक ऐसी ही रचनाओं का संकलन है; चाहें तो इसे आप उस लेखक की दुनिया में प्रवेश करने का द्वार भी कह सकते हैं, जो आपके स्मृति-तंत्र में हमेशा-हमेशा के लिए बस जानेवाला है। और यह दुनिया दूसरी नहीं है, आपकी अपनी ही है, वहाँ जाकर बस आप दूसरे हो जाते हैं।
Manipuri Kavita Meri Drashti Mein
- Author Name:
Devraj
- Book Type:

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Description:
हिन्दी में मणिपुरी कविता के इतिहास एवं आलोचनात्मक अध्ययन पर केन्द्रित यह प्रथम कृति है। देवराज पिछले दो दशकों से मणिपुर में कार्यरत हैं और वहाँ हिन्दी प्रचार-प्रसार आन्दोलन तथा मणिपुरी साहित्य से निकट से जुड़े हैं। उनके प्रयास से विपुल परिमाण में मणिपुरी साहित्य हिन्दी में आ चुका है और हिन्दी की अनेक कृतियाँ मणिपुरीभाषी पाठकों को उपलब्ध हो चुकी हैं। स्वाभाविक रूप से मणिपुरी साहित्य के विविध पक्षों के सम्बन्ध में उनकी दृष्टि अधिक पैनी और तटस्थ है।
हिन्दी में भारतीय भाषाओं के साहित्य सम्बन्धी आलोचना तथा इतिहास ग्रन्थों की कमी नहीं है, किन्तु यह कृति कुछ अलग हटकर एक समर्थ भारतीय भाषा के काव्य का मूल्यांकन करते समय अन्य भारतीय भाषाओं और कुछ भारतेतर भाषाओं के साहित्य को भी ध्यान में रखती है। इससे अन्य भाषाओं के बीच मणिपुरी भाषा और उसके साहित्य का वास्तविक महत्त्व रेखांकित हो जाता है। यह वैशिष्ट्य इस पुस्तक को साहित्य के अध्ययन की परम्परा में अभिनव स्थान प्रदान करता है।
लेखक ने इसे इतिहास-ग्रन्थ नहीं कहा है, फिर भी पाठक इसकी सहायता से मणिपुरी कविता के इतिहास की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। ग्रन्थ का दूसरा खंड मणिपुरी भाषा में अनूदित-प्रकाशित होकर व्यापक स्वीकृति और प्रशंसा प्राप्त कर चुका है। यह इस ग्रन्थ की प्रामाणिकता के लिए पर्याप्त है। अभिव्यक्ति में निजता और लालित्य के कारण समग्र सामग्री कथा-साहित्य की सी रोचकता से परिपूर्ण है।
—प्रो. ऋषभदेव शर्मा
Hindi Ki Jatiya Sanskriti Aur Aupniveshikta
- Author Name:
Rajkumar
- Book Type:

- Description: हिन्दी की जातीय संस्कृति और औपनिवेशिकता एक ऐसा विषय है जिस पर लगातार कई दृष्टियों से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि ऐसे वैचारिक अनुसन्धान से ही हम उन कई प्रश्नों के उत्तर पा सकते हैं जो हमें बेचैन किए रहते हैं। हिन्दी में बार-बार व्याप रही विस्मृति, जातीय स्मृति की अनुपस्थिति आदि ऐसे कई पक्ष हैं जो आलोचना के ध्यान में बराबर रहने चाहिए। डॉ. राजकुमार की यह नई पुस्तक ऐसे आलोचनात्मक उद्यम की ही उपज है और हम उसे सहर्ष प्रकाशित कर रहे हैं।
Marxvadi, Samajshastriya Aur Aitihasik Alochna
- Author Name:
Pandeya Shashibhushan 'Shitanshu'
- Book Type:

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Description:
साहित्य की आलोचना केवल अन्तर्लक्ष्यी (Intrinsic) अथवा पाठ-केन्द्रित (Text Centered) आलोचना नहीं होती, अपितु वैसी बहिर्लक्ष्यी (Extrinsic) आलोचना भी होती है, जो पाठ से बाहर-पाठ के सम्यक् अवबोध के लिए रचनाकार के जीवनवृत्त, उसके जीवन-दृष्टिकोण, उसके युग, उसके सामाजिक यथार्थ, उसकी परम्परा, उसकी संस्कृति आदि को सामाजिक सन्दर्भों में रखकर देखती-परखती और साहित्य का मूल्यांकन करती है। ऐसी आलोचना शब्दों के जोड़-मात्र से बनी वैसी हर रचना को, जिसके पीछे ठोस वास्तविकता नहीं होती, वायवीय मानती है—‘शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प:’ (योगसूत्र)।
हिन्दी में अब तक इसके सिद्धान्त पर तात्त्विक विवेचन और सार्थक बहस प्रस्तुत करनेवाली एक भी पुस्तक नहीं है। ऐसे में पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के प्रति डॉ. शीतांशु के वर्षों के गहरे लगाव, सम्यक् अध्ययन और अनवरत चिन्तन से परिणामित उनकी यह पुस्तक हिन्दी में पहली बार बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों का तथ्यपूर्ण, प्रामाणिक उप-स्थापन करती क्रमश: मार्क्सवादी, समाजशास्त्रीय, साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक और ऐतिहासिक आलोचना की स्वरूपगत मान्यताओं का समीचीन विवेचन प्रस्तुत करती है। पूर्वग्रहहीन सैद्धान्तिक निरूपण के साथ-साथ प्रतिमानों और निदर्शनों की बोध-व्याख्या इस पुस्तक की विशेषता है, जिससे बहुमुख अनुप्रयोग की दिशा भी सहज ही उजागर हो उठी है।
प्रस्तुत पुस्तक यदि एक ओर मार्क्सवादी आलोचनात्मक चिन्तन को रूढ़िवादी विवेचन-सीमा से आगे लाकर उसके उत्तरपक्षीय सैद्धान्तिक स्वरूप तक को निरूपित-व्यवस्थित करती है, तो दूसरी ओर समाज में साहित्य की स्थितिगत पहचानवाली चकाचौंध से निकलकर समाजशास्त्रीय आलोचना के बतौर साहित्य मे निरूपित समाज की पहचान-प्रक्रिया की भी गम्भीर विवेचना करती है; यदि एक ओर साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक आलोचना की प्रकृति, सैद्धान्तिकी और प्रकार्य-प्रक्रिया को आलोचित-प्रत्यालोचित करती है, तो दूसरी ओर उस ऐतिहासिक आलोचना को भी सावयव और सप्रमाण उपस्थापित करती है, जिसे कभी हिन्दी के एक वरिष्ठ आलोचक ने फतवा देते हुए आलोचना के क्षेत्र से ही ख़ारिज कर दिया था। तथ्यत: ‘बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों को जानने, पहचानने और मापने; साथ ही साहित्य को समझने और समझाने की दृष्टि से डॉ. शीतांशु की यह पुस्तक एक अनिवार्य पठनीय पुस्तक है, जिससे हिन्दी के एक बड़े अभाव की महत्त्वपूर्ण पूर्ति हो जाती है।
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