Nirala Ka Katha Sahitya
(0)
Author:
Durga SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
650
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Available
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यह किताब निराला के न केवल कथा, बल्कि समूचे साहित्य को नयी निगाह से देखने का न्यौता देती है और निराला के कथा साहित्य और उनकी कविता को अलगाने वाली समझ भी खंडित करती है। साथ ही निराला के बहाने देश के स्वाधीनता आंदोलन की याद के कारण आजादी के अमृतकाल में विगत को नयी प्रासंगिकता प्रदान करती है।</p> <p> </p> <p>निराला अपनी प्रसिद्धि के बावजूद कुछ ही लेखकों के गम्भीर विवेचन का विषय बने। उनकी रचनात्मकता का दाय तो बहुतों ने ग्रहण किया लेकिन विवेचन कम ने किया। जिन्होंने किया भी उनकी निगाह कविता पर अधिक केंद्रित रही। यह किताब उनके लेखन के अभिन्न अंग, कथा साहित्य के चुनिंदा पाठों का विश्लेषण प्रस्तुत करके निराला साहित्य के सहज बोध को व्यापक पैमाने पर संपन्न बनायेगी। निराला की कहानियों के महत्व को समझने में इस किताब को पढ़ने का फिलहाल कोई विकल्प नजर नहीं आता है। इस किताब को पढ़ने के उपरांत कोई भी पाठक निराला के कथा साहित्य को अधिक सजग होकर पढ़ेगा और उसके लिए यह साहित्य ऐसे तमाम अर्थ प्रेषित करेगा जिनको खोलना उसकी जिम्मेदारी में शामिल होगा।</p> <p>-गोपाल प्रधान
Read moreAbout the Book
यह किताब निराला के न केवल कथा, बल्कि समूचे साहित्य को नयी निगाह से देखने का न्यौता देती है और निराला के कथा साहित्य और उनकी कविता को अलगाने वाली समझ भी खंडित करती है। साथ ही निराला के बहाने देश के स्वाधीनता आंदोलन की याद के कारण आजादी के अमृतकाल में विगत को नयी प्रासंगिकता प्रदान करती है।</p>
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<p>निराला अपनी प्रसिद्धि के बावजूद कुछ ही लेखकों के गम्भीर विवेचन का विषय बने। उनकी रचनात्मकता का दाय तो बहुतों ने ग्रहण किया लेकिन विवेचन कम ने किया। जिन्होंने किया भी उनकी निगाह कविता पर अधिक केंद्रित रही। यह किताब उनके लेखन के अभिन्न अंग, कथा साहित्य के चुनिंदा पाठों का विश्लेषण प्रस्तुत करके निराला साहित्य के सहज बोध को व्यापक पैमाने पर संपन्न बनायेगी। निराला की कहानियों के महत्व को समझने में इस किताब को पढ़ने का फिलहाल कोई विकल्प नजर नहीं आता है। इस किताब को पढ़ने के उपरांत कोई भी पाठक निराला के कथा साहित्य को अधिक सजग होकर पढ़ेगा और उसके लिए यह साहित्य ऐसे तमाम अर्थ प्रेषित करेगा जिनको खोलना उसकी जिम्मेदारी में शामिल होगा।</p>
<p>-गोपाल प्रधान
Book Details
-
ISBN9788196218423
-
Pages150
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘शकुंतिका’ में उपन्यासकार ने न केवल बेटियों के प्रति हमारे समाज में मौजूद रूढ़िवादी धारणाओं को दिखलाया है, बल्कि समय के साथ उन धारणाओं में आ रहे सकारात्मक बदलाव को भी रेखांकित किया है। उनकी इस रचना-दृष्टि को यह पुस्तक रूढ़िवादी मान्यताओं के बरअक्स विश्वास की परम्परा के निर्माण के रूप में परिभाषित करती है। यह दिखलाती है कि किसी भी समाज के लिए केवल आदर्श विचारों का होना पर्याप्त नहीं है। उन्हें व्यावहारिक रूप में लागू किए बग़ैर वास्तविक प्रगति नहीं हो सकती। ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ की सूक्ति सँजोने के बावजूद हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति सामाजिक भेदभाव और लैंगिक असमानता के बने रहने का यही कारण है। इस सन्दर्भ में यह पुस्तक सामाजिक-सांस्कृतिक उत्थान के लिए आवश्यक जीवन-मूल्यों के प्रति रचनात्मक आग्रह को भी सप्रमाण रेखांकित करती है।
निस्सन्देह, यह पुस्तक हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के साथ-साथ सुधी पाठकों के लिए भी एक संग्रहणीय है।
Aatmakatha Aur Upanyas
- Author Name:
Gyanendra Kumar Santosh
- Book Type:

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''...हमलोग यह तो बिना झिझक मान लेते हैं कि उपन्यास में आत्मकथात्मक तत्त्व उपस्थित रहता है और कोई भी पाठक जो लेखक के जीवन में रुचि रखता है, उसे इन अंशों को पहचानने में आनन्द आता है। वहीं आत्मकथा में कल्पना या औपन्यासिकता की चर्चा मात्र हमें विचलित कर देती है। हम मानते हैं कि आत्मकथा का मूल चरित्र उसका उपन्यास न होना है।...’’
''...आत्मकथा में कल्पना का प्रवेश केवल लेखक के सामाजिक सरोकारों से सम्बन्धित नहीं है, बल्कि वह कला की एक आवश्यक माँग भी है। आत्मकथाकार के लिए प्रमुख समस्या यह है कि एक तरफ़ उसे ईमानदारी के साथ आत्म के छुपे स्तरों को उजागर करना होता है, साथ ही उसी समय उसे रूप, संरचना, ध्वनि आदि साहित्यिक सौन्दर्य की कलात्मक पूर्ति का भी प्रयास करना होता है। यथार्थ और तथ्य अपने आप में कलात्मक नहीं होते हैं। उन्हें लेखक अपनी सर्जनशील कल्पना के साँचे में कच्ची सामग्री की तरह प्रयुक्त करता है।...’’
—इसी पुस्तक से
Shabdon Ka Jeevan
- Author Name:
Bhola Nath Tiwari
- Book Type:

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शब्दों के जन्म, निर्माण, अर्थ, ध्वनि परिवर्तन और आदान-प्रदान आदि से सम्बद्ध भाषावैज्ञानिक तथ्य प्रायः नीरस होते हैं। उन्हें समझना और समझाना, दोनों ही कार्य किसी चुनौती से कम नहीं है। इसलिए लेखक का ध्यान इस ओर पाठक से भी पहले जाता है और इस विषय को वह अधिकाधिक पठनीय बनाकर प्रस्तुत करता है।
शब्दों का जीवन सुप्रसिद्ध भाषाविज्ञानी भोलानाथ तिवारी के ऐसे ही प्रयास का परिणाम है। उनकी यह कृति हिन्दी में ऐसा पहला ही प्रयास था, जब किसी ने भाषावैज्ञानिक तथ्यों को ललित निबन्धों के शिल्प में पेश किया हो। भाषाविज्ञान पर यह उनकी सर्वथा अनूठी कृति है। उनकी कल्पना ने इन ललित निबन्धों में शब्दों को मनुष्य की तरह ही जन्म लेते, मरते, उलटते-पलटते और उठते-बैठते दिखाया है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे शब्दों का मानवीकरण करने में सफल रहे हैं।
प्रत्येक शब्द का अपना इतिहास है और अपना भूगोल। कहना न होगा कि सामान्य पाठकों के लिए यदि यह कृति ललित निबन्धों का संग्रह है तो विद्यार्थियों के लिए भाषाविज्ञान जैसे विषय को अत्यन्त मनोरंजक भाषा-शैली में हृदयंगम करानेवाली बहुचर्चित कृति।
Muktibodh : Sarjak Aur Vicharak
- Author Name:
Sewaram Tripathi
- Book Type:

- Description: तर नेहरू-युग में जैसे-जैसे भारतीय लोकतंत्र जनहितों से निरपेक्ष होता गया है, वैसे-वैसे साहित्य मुखर रूप से लोकतंत्र के भीतर काम कर रही जन-विरोधी शक्तियों के कठोर आलोचक के रूप में सामने आया है। इसी क्रम में मुक्तिबोध की रचनाएँ और विचार हिन्दी में केन्द्रीय होते गए हैं। पारम्परिक रसवादी और रोमैंटिक आग्रहों के सामानान्तर आधुनिक साहित्य ने विचार और बौद्धिकता को केन्द्रीय महत्त्व दिया है। इस संघर्ष में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक प्रयासों की महती भूमिका है। प्रो. सेवाराम त्रिपाठी की पुस्तक ‘मुक्तिबोध : सर्जक और विचारक', मुक्तिबोध का विवेचन-मूल्यांकन समग्रता से करती है। मुक्तिबोध की रचनात्मकता कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना और पत्रकारिता तक फैली हुई है। इस पुस्तक का महत्त्व यह है कि वह मुक्तिबोध का अध्ययन करने के लिए सभी विधाओं को समेटती है। स्वाभाविक ही है कि ऐसे में लेखक ने मुक्तिबोध के सभी पक्षों पर विस्तृत विचार किया है। सेवाराम त्रिपाठी ने प्रस्तुत पुस्तक में मुक्तिबोध की सर्जना में विचारधारा की भूमिका की पड़ताल की है। मुक्तिबोध हिन्दी रचनाशीलता में एक मुकम्मल और सुसंगत मार्क्सवादी थे। इसका गहरा प्रभाव विशेष रूप से कविता और आलोचना जैसी विधाओं पर पड़ा है। यह प्रभाव सामान्य न होकर जटिल है। लेखक ने पुस्तक में मुक्तिबोध में उपस्थित रचना और विचारधारा की अन्तःक्रिया पर गहन और सूक्ष्म विवेचन किया है। प्रस्तुत संस्करण पुस्तक का दूसरा संस्करण है। इसमें ‘मुक्तिबोध : पुनश्च' शीर्षक से चार नए आलेख जोड़ दिए गए हैं। इन आलेखों में मूल अध्यायों में छूट गई कुछ महत्त्वपूर्ण बातें स्थान पा सकी हैं। पुस्तक न सिर्फ़ गम्भीर अध्येताओं की ज़रूरतों को पूरा करती है, बल्कि सामान्य विद्यार्थियों के लिए भी उपादेय ह
Rashtrabhasha Hindi Samasyaye Aur Samadhan
- Author Name:
Aacharya Devendranath Sharma
- Book Type:

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हिन्दी राष्ट्रभाषा बन गई, राजभाषा का दर्जा भी पा गई, लेकिन यह एक दुखद सत्य है कि स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी उसकी राह के रोड़े और समस्याएँ कमोबेश बनी हुई हैं। समस्याएँ अन्दरूनी भी हैं और बाह्य भी। अन्दरूनी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना तो भाषाविज्ञानियों और विद्वानों का ही है, किन्तु बाह्य समस्याओं का समाधान पूरे राष्ट्र की मानसिक जागरूकता पर निर्भर करता है। भारत जैसे बहुजातीय, बहुभाषी देश में राष्ट्रभाषा की राह में रोड़े आना अस्वाभाविक नहीं है, किन्तु जागरूक राष्ट्र के लिए उन्हें हल कर लेना भी कठिन नहीं है।
प्रस्तुत पुस्तक के विद्वान् लेखक देवेन्द्रनाथ शर्मा ने राष्ट्रभाषा हिन्दी की सभी समस्याओं पर बड़ी गहराई से अध्ययन करके उनका समाधान खोजने का स्तुत्य प्रयास किया है। उन्होंने समस्याओं पर चिन्तन करने के पूर्व भाषा, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता के अन्तर्सम्बन्ध पर गहन विचार करने के पश्चात् हिन्दी के महत्त्व का गहराई से विवेचन किया है, जिससे इस भाषा के राष्ट्रभाषा का स्वरूप और उसकी अनिवार्यता पूरी तरह स्थापित हो जाती है। इसी सन्दर्भ में विद्वान् लेखक ने हिन्दी भाषा की सरलता का विवेचन किया है। किसी भाषा के राष्ट्रभाषा बनने के लिए उसका सरल होना एक अनिवार्य शर्त है। इस सम्बन्ध में विचार करते समय हिन्दी के और अधिक सरलीकरण पर भी विचार किया गया है।
Rashtrakavi Kuvempu
- Author Name:
Prabhushankara
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- Description: English translation by H S Komalesha of Prabhushankara's Kannada monograph.
Meera Aur Meera
- Author Name:
Mahadevi Verma
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‘मीरा और मीरा’ छायावाद की मूर्तिमान गरिमा महीयसी महादेवी वर्मा के चार व्याख्यानों का संग्रह है। महादेवी जी ने ये व्याख्यान जयपुर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की राजस्थान शाखा के निमंत्रण पर दिए थे।
इन चार व्याख्यानों के शीर्षक हैं–मीरा का युग, मीरा की साधना, मीरा के गीत और मीरा का विद्रोह। इनमें महादेवी ने मध्यकालीन स्त्री की स्थिति का विशेष सन्दर्भ लेकर भक्ति, मुक्ति, आत्मनिर्णय, विद्रोह और निजपथ-निर्माण आदि को विश्लेषित किया है।
‘मीरा और मीरा’ को प्रकाशित करते हुए हमें इसलिए भी विशेष प्रसन्नता है कि यह समय अस्मिता-विमर्श का है। स्त्री-विमर्श के ‘समय विशेष’ में स्त्री-अस्मिता के दो शिखर व्यक्तित्वों का ‘रचनात्मक संवाद’ महत्त्वपूर्ण है। इन दो दीपशिखाओं के आलोक में परम्परा और आधुनिकता के जाने कितने निहितार्थ स्पष्ट होते हैं। ‘शृंखला की कड़ियाँ’ की लेखिका ने ‘सूली ऊपर सेज पिया की’ का गायन करने वाली रचनाकार के मन में प्रवेश किया है। यह दो समयों (मध्यकाल और आधुनिक युग) का संवाद भी है।
यह सोने पर सुहागा ही कहा जाएगा कि प्रस्तुत पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार व विमर्शकार अनामिका ने लिखी है। कहना न होगा कि यह लम्बी भूमिका एक मुकम्मल आलोचनात्मक आलेख है।
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