Philhal
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Author:
Ashok VajpeyiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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पचास साल पहले प्रकाशित यह पुस्तक ऐसे समीक्षात्मक लेखों का संग्रह है, जिससे हिन्दी आलोचना में एक ‘रेडिकल चेंज’ आया, और आज भी इसका महत्त्व अपनी उल्लेखनीय भूमिका में बना हुआ है।</p> <p>पुस्तक में शामिल अपने लेखों के बारे में अशोक वाजपेयी ने ख़ुद ‘दृश्यालेख’ में स्पष्ट किया है कि ये लेख ‘जब-तब लिखे गए हैं और इसलिए इनमें बहुत स्पष्ट तारतम्य नहीं है’। पर अपनी समग्रता में ये ‘उन खोजों और आग्रहों को’ उजागर करते हैं जो समकालीन कविता के मूल में हैं। युवा कविता के घटाटोप से बौखलाकर जब सिद्ध और प्रतिष्ठित समीक्षक आँख मींच बैठे हों, तब उस ढेर में से सही और सार्थक कविता की पहचान करने-कराने का अशोक वाजपेयी का यह प्रयत्न कल भी आत्यन्तिक महत्त्व रखता था, आज भी रखता है।</p> <p>इस पुस्तक में अपने समय के युवा-लेखन की गड़बड़ियों और उनके स्रोतों को स्पष्ट करते हुए अशोक वाजपेयी अच्छे कवियों की रचना की मूल्यवत्ता को रेखांकित करने में सफल हुए हैं। वैज्ञानिक समझ और बेलाग सफ़ाई से उन्होंने काव्य-सृजन को परखा है और मुक्तिबोध, कमलेश, धूमिल आदि समकालीन कवियों की कविता की विशेषताओं को सही रोशनी में रखा है। अपने लेखन से उन्होंने समकालीन आलोचना को जो नई समझ और उसके लिए जो ज़रूरी मुहावरा दिया, उसके बल पर हम कह सकते हैं कि इस पुस्तक के प्रकाशन का हिन्दी समीक्षा पर ही नहीं, हिन्दी कविता पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।</p> <p>निस्सन्देह, आलोचना साहित्य में एक बहुमूल्य और विरल कृति का नाम है ‘फ़िलहाल’।
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पचास साल पहले प्रकाशित यह पुस्तक ऐसे समीक्षात्मक लेखों का संग्रह है, जिससे हिन्दी आलोचना में एक ‘रेडिकल चेंज’ आया, और आज भी इसका महत्त्व अपनी उल्लेखनीय भूमिका में बना हुआ है।</p>
<p>पुस्तक में शामिल अपने लेखों के बारे में अशोक वाजपेयी ने ख़ुद ‘दृश्यालेख’ में स्पष्ट किया है कि ये लेख ‘जब-तब लिखे गए हैं और इसलिए इनमें बहुत स्पष्ट तारतम्य नहीं है’। पर अपनी समग्रता में ये ‘उन खोजों और आग्रहों को’ उजागर करते हैं जो समकालीन कविता के मूल में हैं। युवा कविता के घटाटोप से बौखलाकर जब सिद्ध और प्रतिष्ठित समीक्षक आँख मींच बैठे हों, तब उस ढेर में से सही और सार्थक कविता की पहचान करने-कराने का अशोक वाजपेयी का यह प्रयत्न कल भी आत्यन्तिक महत्त्व रखता था, आज भी रखता है।</p>
<p>इस पुस्तक में अपने समय के युवा-लेखन की गड़बड़ियों और उनके स्रोतों को स्पष्ट करते हुए अशोक वाजपेयी अच्छे कवियों की रचना की मूल्यवत्ता को रेखांकित करने में सफल हुए हैं। वैज्ञानिक समझ और बेलाग सफ़ाई से उन्होंने काव्य-सृजन को परखा है और मुक्तिबोध, कमलेश, धूमिल आदि समकालीन कवियों की कविता की विशेषताओं को सही रोशनी में रखा है। अपने लेखन से उन्होंने समकालीन आलोचना को जो नई समझ और उसके लिए जो ज़रूरी मुहावरा दिया, उसके बल पर हम कह सकते हैं कि इस पुस्तक के प्रकाशन का हिन्दी समीक्षा पर ही नहीं, हिन्दी कविता पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।</p>
<p>निस्सन्देह, आलोचना साहित्य में एक बहुमूल्य और विरल कृति का नाम है ‘फ़िलहाल’।
Book Details
-
ISBN9788126713684
-
Pages162
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अशोक वाजपेयी निरे आलोचक नहीं, अज्ञेय, मुक्तिबोध, विजयदेव नारायण साही, कुँवर नारायण, मलयज आदि की परम्परा में कवि-आलोचक हैं। उनमें तरल सहानुभूति और तादात्म्य की क्षमता है तो सख़्त बौद्धिकता और न्यायबुद्धि का साहस भी। आधुनिक आलोचना में अपनी अलग भाषा की स्थायी छाप छोड़नेवाले वे ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने अज्ञेय, मुक्तिबोध और शमशेर से लेकर रघुवीर सहाय, धूमिल, श्रीकान्त वर्मा, कमलेश, विनोदकुमार शुक्ल आदि के लिए अलग-अलग तर्क और औचित्य खोजे परिभाषित किए हैं। कविता की उनकी अदम्य पक्षधरता निरी ज़िद या एक कवि की आत्मरति नहीं है—वे प्रखरता से, तर्क और विचारोत्तेजन से, ज़िम्मेदारी और वयस्कता से हमारे समय में कविता की जगह को सुरक्षित और रौशन बनाने की खरी चेष्टा करते हैं।
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दिल्ली में पिछले कई वर्षों से सक्रीय बालरंग संस्था 'उमंग' के रजतपर्व पर विशेष रूप से प्रकाशित इस संकलन में नाटक, कहानियाँ और एक पटकथा हैं : जैसे बच्चों की दुनिया रंगारंग और विविध होती है, वैसे ही यह संकलन किसी एक विधा तक महदूद नहीं है। इसमें उल्लास, उमंग, खेल के साथ-साथ समझ और आनन्द का मेल है। हमें उम्मीद है कि हिन्दी में अपने ढंग का यह प्रकाशन बच्चों के लिए हमारे बड़े और महत्त्पूर्ण लेखकों द्वारा आगे भी लिखने की उत्साहजनक शुरुआत है।
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जब भी हम अनुवाद, विशेषकर कविता का अनुवाद पढ़ते हैं, हम संशय में होते हैं। यह संशय तब तो और भी ज़्यादा होता है जब वह कविता, मसलन, फ़्रेंच या स्वीडिश से अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी से हिन्दी जैसे तिर्यक रास्ते से भटकती आती हम तक पहुँचती है। “क्या वह ठीक वही कविता रह पाती है, जैसी वह मूल में है?” —यह संशय अनुवाद से ज़्यादा, अनुवाद की ओट में वस्तुतः कविता को लेकर संशय है जो इस विश्वास से जनमता है कि कविता का एक ‘स्थिर’, ‘मूल’ रूप होता है जो उस भाषा, शैली और ढाँचे में सुरक्षित होता है जिसमें वह लिखी गई है; और यह विश्वास भी कि जब हम उसे उसके ‘मूल रूप’ में पढ़ रहे होते हैं तब हम उसे यथा—अर्थतः ग्रहण कर रहे होते हैं। प्रस्तुत चयन हमें इस अन्धविश्वास से मुक्त करता हुआ उस विस्मयकारी प्रक्रिया के क़रीब ले जाता है जिसमें कविता भाषा, शैली और संरचना का निरन्तर उत्सर्जन करती हुई उस ‘एजेंसी’ की पकड़ से बाहर जाती रहती है जिसे हम ‘कवि’ या ‘रचयिता’ या ‘मूल’ कहते हैं।
इस चयन को पढ़ते हुए हम अनुभव करते हैं कि कविता निरन्तर रूपान्तरित और परिशोधित होती ऊर्जा है (जैसाकि इस चयन में शामिल स्वीडिश कवि टोमास ट्रान्सट्रोमर भी मानते हैं) और वह तभी तक ऊर्जा है जब तक वह रूपान्तरण और परिशोधन की प्रक्रिया में है। वह या तो मूल का निषेध है या वे तमाम पाठक उसका मूल हैं जो उसे अपनी सृजनात्मकता के भीतर से परिशोधित, रूपान्तरित और मुक्त होने देते हैं। वह किसी विशिष्ट देश, विशिष्ट भाषा या विशिष्ट कवि का सृजन नहीं, पाठक का सृजन है और इसी अर्थ में वह देश, भाषा और कवि का सृजन है। इस चयन में शामिल सारे अनुवादक ऐसे ही पाठक हैं और इसीलिए इन अनुवादों को पढ़ना, अपने भीतर निहित पाठक को उद्दीप्त कर उसे कविता के ‘होने’ की सतत प्रक्रिया में हिस्सेदार बनाना है; उसे उसकी ‘कर्मवाचक’ स्थिति से मुक्त कर कर्त्तृवाचक स्थिति में ले जाना है और अन्ततः उसे यह बोध कराना है कि कम से कम कविता की दुनिया में कर्तृत्त्व, स्वत्त्व का साधन नहीं है, वह स्वत्त्व का निषेध है।
कहना न होगा कि पाठक को उसकी इस गम्भीर और सृजनात्मक स्थिति का बोध करानेवाली यह एक अद्वितीय पुस्तक है। मनुष्यों के छह महाद्वीपों के बीच छुपा हुआ एक सातवाँ महाद्वीप है। जहाँ और जब भी कोई कविता लिखी (और पढ़ी) जाती है, यह महाद्वीप मूर्त और स्पन्दित होता है। इस महाद्वीप पर अस्तित्व का पुनर्वास होता है। हम इस महाद्वीप को ‘पुनर्वसु’ कहकर पुकार सकते हैं।
Dukh Chitthirasa Hai
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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पिछली अधसदी से अधिक समय से कविता लिख रहे अशोक वाजपेयी ने अपनी कविता में जो जगह बनाई है, वह अब अधिक अनुभव-समृद्ध, आत्ममंथनकारी और नये ढंग से बेचैन है। उल्लास का उजाला और अवसाद की छाया उसे एक ऐसी रंगत देती है जो आज की कविता में प्रायः दुर्लभ है।
जीवनासक्ति और प्रश्नांकन की उनकी परम्परा इस संग्रह में नई सघनता और उत्कटता के साथ चरितार्थ हुई है। उनकी काव्यभाषा का परिसर अन्तर्ध्वनित भी है और बहिर्मुख भी। सामाजिक को निजी और निजी को सामाजिक मानने पर लगातार इसरार करनेवाले इस सयाने कवि का विवेक इस द्वैत को लाँघकर अब ऐसे मुक़ाम पर है जहाँ कविता अनुभव और विचार एक साथ है।
Shesh-Ashesh
- Author Name:
Gajanan Madhav Muktibodh +2
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मुक्तिबोध स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता और साहित्य-चिन्तन का वह स्तम्भ हैं जो पिछले कई दशकों से हमारे आदर्श भी बने रहे हैं और चुनौती भी। उन्होंने जो रचा, वह हमें पुनः-पुनः पाठ के लिए आमंत्रित करता है और रचने की प्रक्रिया को लेकर जो कहा, वह एक निर्देशिका की तरह हमारे अन्तःस्तल में रच-बस गया है।
‘शेष-अशेष’ मुक्तिबोध की उन विविध रचनाओं का संकलन है जो उनकी रचनावली के प्रकाशन के उपरान्त प्राप्त हुई हैं। इन रचनाओं में कविता, कहानी, निबन्ध, समीक्षा, पत्र और सिने-समीक्षा तक शामिल हैं। मुक्तिबोध उन लेखकों में नहीं थे जो अपनी लिखी चिन्दियों को भी सँभालकर रखते हैं, वे अपनी रचनाओं को लेकर घोर संकोच और निस्पृहता के लिए जाने जाते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं की तलाश एक मुश्किल काम है।
इस संकलन में शामिल मुक्तिबोध की विविधवर्णी रचनाएँ जिनमें कविता और समीक्षा से लेकर फ़िल्म रिव्यू तक शामिल हैं, उनकी रचनात्मकता के कुछ और आयामों को सामने लाती हैं, और हमें अपने उस प्रिय मनुष्य के कुछ और भीतर ले जाती हैं।
Pratinidhi Kavitayen : Gajanan Madhav Muktibodh
- Author Name:
Gajanan Madhav Muktibodh +1
- Book Type:

- Description:
मुक्तिबोध की कविता अपने समय का जीवित इतिहास है : वैसे ही, जैसे अपने समय में कबीर, तुलसी और निराला की कविता। हमारे समय का यथार्थ उनकी कविता में पूरे कलात्मक सन्तुलन के साथ मौजूद है। उनकी कल्पना वर्तमान से सीधे टकराती है, जिसे हम फन्तासी की शक्ल में देखते हैं। नई कविता की पायेदार पहचान बनकर भी उनकी कविता उससे आगे निकल जाती है, क्योंकि समकालीन जीवन के हॉरर की तीव्रतम अभिव्यक्ति के बावजूद वह एक गहरे आत्मविश्वास की उपज है। चीज़ों को वे मार्क्सवादी नज़रिए से देखते हैं, इसीलिए उनकी कविताएँ सामाजिक यथार्थ के परस्पर गुम्फित तत्त्वों और उनके गतिशील यथार्थ की पहचान कराने में समर्थ हैं। वे आज की तमाम अमानवीयता
के विरुद्ध मनुष्य की अन्तिम विजय का भरोसा दिलाती हैं। इस संग्रह में, जिसे मुक्तिबोध और उनके साहित्यिक अवदान की गहरी पहचान रखनेवाले सुपरिचित कवि, समीक्षक
श्री अशोक वाजपेयी ने संकलित-सम्पादित किया है, उनकी प्रायः वे सभी कविताएँ संगृहीत हैं, जिनके लिए वे बहुचर्चित हुए हैं, और जो प्रगतिशील हिन्दी कविता की पुख़्ता पहचान बनी हुई है।
Pratinidhi Kavitayen : Gajanan Madhav Muktibodh
Gajanan Madhav Muktibodh
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Available
Pratinidhi Kavitayen : Bharatbhushan Agrawal
- Author Name:
Bharatbhushan Agrawal +1
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भारतभूषण अग्रवाल की कविता बिना किसी नाटकीयता, बिना कोई चीख़-पुकार मचाए ईमानदारी से अपनी सच्चाई को देखती-परखती कविता है। उसमें रूमानी आवेग से लेकर मुक्त हास्य, विद्रूप से लेकर अनुराग और कोमलता की कई छवियाँ, सभी शामिल हैं। कामकाजी मध्यवर्ग की विडम्बनाएँ, संवेदनशील व्यक्ति के ऊहापोह, शहराती ज़िन्दगी के रोज़मर्रा के सुख-दु:ख आदि को भारत जी ईमानदारी और पारदर्शिता से अपनी कविता में जगह देते हैं। उनमें अपनी विशिष्टता का रत्ती-भर भी आग्रह नहीं है। बल्कि अगर आग्रह है तो अपनी सीधी-सादी, सरल जान पड़ती लेकिन दरअसल जटिल साधारणता का। यह आग्रह उनकी आवाज़ को और सघन तथा उत्कट बनाता है।
उनकी कविता अपने को महत्त्वाकांक्षा के किसी विराट लोक में विलीन नहीं करती। वह अपनी उत्सुकताओं और बेचैनियों को जतन से नबेरती है। वह कविता में विकल्प इतना नहीं खोजती जितना सच्चाई की ही कई अन्यथा अलक्षित रह जानेवाली परतों को। कविता में कवि का यह अहसास बराबर मौजूद है कि सच्चाई और ज़िन्दगी कविता से कहीं बड़ी और व्यापक हैं और वे कविता में अँट नहीं पा रही हैं।
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