Pashchatya Sahitya Chintan
(0)
Author:
Nirmala JainPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
695
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पश्चिम में साहित्य-चिन्तन की सुदीर्घ परम्परा को हिन्दी के पाठकों के लिए प्रामाणिक और सहज ग्राह्य रूप में सुलभ कराने की दिशा में प्रस्तुत ग्रन्थ एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। प्लेटो से बीसवीं शताब्दी तक पाश्चात्य काव्य-चिन्तन में योगदान देनेवाले सभी महत्त्वपूर्ण विचारकों और प्रवृत्तियों का प्रामाणिक विवेचन इस रचना की विशेषता है; अकादमिक अनुशासन से एक साथ युक्त और मुक्त विश्लेषण-पद्धति इसका प्रमुख आकर्षण है। ग्रन्थ की सामग्री का आधार मूल स्रोत है। बक़ौल प्लेटो : ‘सत्य के अनुकरण का अनुकरण ग्रन्थ की विश्वसनीयता तथा लेखिका की प्रतिबद्धता’ का कारण भी यही है। प्रस्तुत कृति से इस विषय के सुधी पाठकों की बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति होती है।
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पश्चिम में साहित्य-चिन्तन की सुदीर्घ परम्परा को हिन्दी के पाठकों के लिए प्रामाणिक और सहज ग्राह्य रूप में सुलभ कराने की दिशा में प्रस्तुत ग्रन्थ एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। प्लेटो से बीसवीं शताब्दी तक पाश्चात्य काव्य-चिन्तन में योगदान देनेवाले सभी महत्त्वपूर्ण विचारकों और प्रवृत्तियों का प्रामाणिक विवेचन इस रचना की विशेषता है; अकादमिक अनुशासन से एक साथ युक्त और मुक्त विश्लेषण-पद्धति इसका प्रमुख आकर्षण है। ग्रन्थ की सामग्री का आधार मूल स्रोत है। बक़ौल प्लेटो : ‘सत्य के अनुकरण का अनुकरण ग्रन्थ की विश्वसनीयता तथा लेखिका की प्रतिबद्धता’ का कारण भी यही है। प्रस्तुत कृति से इस विषय के सुधी पाठकों की बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति होती है।
Book Details
-
ISBN9788171190188
-
Pages195
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: भाषा मनुष्य की अन्यतम उपलब्धि है। भाषा के माध्यम से ही मनुष्य ने विकास के विभिन्न सोपान पार किए हैं। मानव सभ्यता के विकास की दृष्टि से संचार के क्षेत्र में भाषा को पहली क्रान्ति के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस क्षेत्र में लिपि दूसरी बड़ी क्रान्ति है, जिसके माध्यम से भाषा को रूपायित किया जाता है। भाषा का मनुष्य जीवन में बुनियादी महत्त्व है। भाषा संस्कार निर्माण का सबसे महत्त्वपूर्ण उपकरण है। वह केवल विचारों के सम्प्रेषण मात्र का साधन नहीं है अपितु वह सभ्यता एवं संस्कृति का वाहक भी है। भाषा का संस्कृति के साथ गहरा सम्बन्ध है। किसी भी देश की संस्कृति उस देश की भाषा में ही अभिव्यक्त होती है। महादेवी वर्मा का मानना है कि, "संस्कृति किसी भी देश के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है और संस्कृति तब तक गूँगी रहती है जब तक किसी भी देश के पास भाषा नहीं होती। राष्ट्र नदी, पहाड़ के भूगोल से नही बनता, यह संस्कृति और भाषा से बनता है। भाषा कोई परिधान नहीं है कि आप उसे बदल देंगे या उतार देंगे— वह व्यक्तित्व है, राष्ट्रीय व्यक्तित्व।"
Mahadevi Varma Ke Kavya Mein Saundarya-Bhavana
- Author Name:
Govind Pal Singh
- Book Type:

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Description:
छायावादी काव्य के विकास में महादेवी वर्मा का योगदान अप्रतिम है। वे अपने समय के कवियों में एक अलौकिक भावजगत का सृजन कर छायावादी काव्य-धारा को एक नई सौन्दर्य-दृष्टि प्रदान करती हैं। यही कारण है कि उन्हें छायावादी काव्य-धारा में रहस्यवादी भाव-धारा का प्रमुख कवि माना जाता है। सर्वथा नए उपमान, अमूर्तन, लाक्षणिकता, प्रतीक, बिम्ब उनके काव्य को लालित्य-योजना की दृष्टि से एक ऐसा आयाम प्रदान करते हैं जो छायावादी कवियों में उनकी अपनी अलग पहचान बनाता है।
प्रस्तुत ग्रन्थ में लेखक ने महादेवी वर्मा की सौन्दर्य-दृष्टि से बचकर लेखक ने भारतीय और पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र के ज्ञान का गम्भीर उपयोग किया है। यही कारण है कि प्रस्तुत पुस्तक महादेवी वर्मा के काव्य-विवेचन में नई दृष्टि का समावेश कर सकी है। शास्त्रीय और समसामयिक काव्यालोचन में प्रस्तुत पुस्तक का सुनिश्चित योगदान है।
1857 Ke Pratham Swatantrata Sangram Ki Patrakarita
- Author Name:
Prof. Neeraj Karna Singh +1
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- Description: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का एक ऐसा दिव्य तथा भव्य अध्याय है, जिसमें धर्म, वर्ग, जातियों की सभी दीवारें ध्वस्त हो जाती हैं और जनसमूह के रूप में भारत की आत्मा मुखर होती है| अंग्रेजी तथा वामपंथी इतिहासकार भले ही इस महासमर को गदर या विद्रोह की संज्ञा दें, परंतु यह भारतीय आत्मा की आवाज थी। इस आवाज का स्पंदन सनातन राष्ट्र की पावन माटी के कण-कण में सुरभि- स्वरूप अनुभूत किया जा सकता है।जंग-ए-आजादी में जनचेतना और मनचेतना का कार्य हर स्तर पर हुआ। उस वक्त की व्रतधारी पत्रकारिता ने भी आजादी के पहले समर में क्रांति का बीजारोपण किया | जन-जन तक, मन-मन तक आजादी के समर को पहुँचाया और फिरंगी हुकूमत के खिलाफ उठ खड़े होने का शंखनाद किया | ऐसा शंखनाद, जिसने अनंत नभ में आजादी की क्रांति को हवा दी | उसी हवा को महसूस और आत्मसात् करने के लिए, इस युग के कोठि-कोटि जनों में समझ पैदा करने के उद्देश्य से और क्रांति की उस सुगंध से जोड़ने के लिए पत्रकारिता व्रत तथा दायित्व का दस्तावेज पुस्तक के रूप में आपके हाथों में है । यह पुस्तक केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि राष्ट्र और राष्ट्रगायकों को हमारी ओर से सादर शब्दांजलि है, भावांजलि है|
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