Aalochana Se Aagey
Author:
Sudhish PachauriPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 476
₹
595
Available
उत्तर-आधुनिकतावाद हिन्दी में अब एक निर्णायक विमर्श बन चला है और उत्तर-संरचनावादी ‘पाठ’ की रणनीतियाँ हिन्दी साहित्य की उपलब्ध व्याख्याओं में नए-नए विपर्यास और उपद्रव पैदा कर रही हैं। विखंडनवादी पाठ-प्रविधियों ने हिन्दी में नव्य-समीक्षा को रिटायर कर दिया है। ‘आलोचना’ पद भी, अपनी व्यतीत आधुनिकतावादी प्रकृति और उत्तर-संरचनावादी रणनीतियों की मार के चलते, संकटग्रस्त होकर संदिग्ध हो चला है। ये दिन आलोचना के ‘विमर्श’ में बदल जाने के दिन हैं। विमर्श जो ‘अर्थ’ का ‘उत्पादन’ ही नहीं करते, उन्हें ‘संगठित’ भी करते हैं और अनिवार्यत: सत्तात्मक होते हैं। विमर्श वस्तुत: आलोचना का विखंडन है, इसीलिए आलोचना से आगे है। सुधीश पचौरी ने उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी विमर्शों को हिन्दी में स्थापित किया है। लगभग दो दशक के सभी अग्रगामी विमर्श, इन उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी पदावलियों से उलझते-सुलझते चलते हैं। समाजशास्त्रों में इन्हें लगातार जगह मिल रही है। साहित्य अध्ययन में, पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में और शोधों में ये विमर्श निर्णायक होने लगे हैं। ये वर्तमान की माँग हैं और उसका भवितव्य भी। सुधीश पचौरी की यह किताब हिन्दी के जागरूक पाठकर्ताओं के लिए एक ज़रूरी किताब है।
ISBN: 9788171195688
Pages: 220
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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— इस पुस्तक में आधुनिकता पर केन्द्रित निबन्ध संकलित हैं। एक युगद्रष्टा राष्ट्रकवि के मौलिक चिन्तन से ओतप्रोत विचारोत्तेजक ये निबन्ध आधुनिकता के महत्त्व को इस तार्किकता के साथ रेखांकित करते हैं कि पाठकों को अपने राष्ट्र के प्रति एक नई दृष्टि मिल सके।
आधुनिकता की परिभाषा क्या है? धर्म, साहित्य और समाज को वह किस सीमा तक प्रभावित करती है? क्या नैतिकता, सौन्दर्यबोध की भाँति आधुनिकता का भी कोई शाश्वत मूल्य है? विज्ञान, औद्योगिकी और टेक्नोलॉजी के निरन्तर प्रसार के सामने हम अपनी संस्कृति का सार किस तरह बचा सकते हैं? प्रस्तुत संग्रह के निबन्धों में दिनकर जी ने इन ज्वलन्त प्रश्नों पर न केवल गहराई से विचार किए हैं, वरन् भारतीय संस्कृति के सनातन जीवन-मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में उनके समाधान भी दिए हैं।
निस्सन्देह, 'आधुनिक बोध' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के चिन्तकस्वरूप को उद्घाटित करनेवाली एक श्रेष्ठ बौद्धिक कृति है।
Sarjnatmak Kavyalochan
- Author Name:
Pandeya Shashibhushan 'Shitanshu'
- Book Type:

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Description:
हिन्दी में सर्जनात्मक काव्यालोचन का प्राय: अभाव रहा है, जिससे आलोचना की सर्जनात्मक मौलिकता अब तक स्थापित-प्रतिष्ठित नहीं हो पाई है। अभाव-रूपी इस अफाट सन्नाटे को भंग करनेवाली डॉ. ‘शीतांशु’ की यह पुस्तक ऐसी पहली सहृदय-संवेद्य, प्रगुणात्मक पुस्तक है, जिसमें लेखक ने 28 हिन्दी कविताओं के काव्यमर्म तथा अन्तर्न्यस्त साभिप्रायता को उद्घाटित-विवेचित किया है।
कविता का विवेचन उसकी सर्जनात्मक सार्थकता का विवेचन होता है। यह सार्थकता भावकीय प्रतिभा से कविता की कलावटी गाँठों को खोलते हुए उसके अर्थ-गह्वर में प्रवेश करने से सम्भव हो पाती है। हिन्दी काव्यालोचन अब तक अपनी लक्ष्मण-रेखा में घिरा रहा है। वह प्रवृत्तिगत, विकासात्मक, सैद्धान्तिक और वादारोपित बहस-मुबाहसे से ग्रस्त-सा है। मार्क्सवादी आलोचना को तो अपनी एकरसता में किसी भी कविता की आन्तर गहराई में उतरने से प्राय: परहेज़ ही रहा है, जिसके कारण कविता का भावन और बोधन केवल सामाजिक यथार्थ की अभिधेयात्मकता तक सीमित-प्रतिबन्धित रह गया है, जबकि उसमें अशेष प्रतीयमान, सर्जनात्मक साभिप्रायता विद्यमान होती है। यहाँ तक कि इसमें मार्क्सवादी सामाजिक यथार्थ की अनेकानेक परतें भी समाविष्ट रहती हैं।
ऐसे में प्रतीयमान आभ्यन्तर को उद्घाटित करनेवाली यह वह प्रतीक्षित आलोचना-कृति है, जो स्थापित करती है कि कविता की सही पहचान-परख उसके तलान्वेषित कथ्यों और अर्थच्छवियों की बहुआयामिता पर निर्भर है।
कहना होगा कि कविताओं की साभिप्राय पुनस्सर्जना के माध्यम से काव्यलोचन के नए क्षितिज का सन्धान और दिशा-निर्देश करनेवाली यह पुस्तक अब तक की निर्धारित लक्ष्मण-रेखा के बाहर जाकर हिन्दी काव्यालोचन को समृद्ध करती है। साथ ही नई आलोचकीय प्रतिभाओं को इस दिशा में सक्रिय होने हेतु आमंत्रित भी करती है। हिन्दी आलोचना में कविता के पाठकों और आलोचकों को संवेदन-समृद्ध करनेवाली एक अत्यन्त उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक।
Hindi Lalit Nibandh : Swarup Vivechan
- Author Name:
Vedvati Rathi
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Description:
प्रस्तुत पुस्तक डॉ. वेदवती राठी के दस वर्षों के अध्यवसाय के फलस्वरूप लिखी गई है। अत: अब तक हिन्दी ललित निबन्ध के विषय में जो धारणाएँ व्यक्त की गई हैं, उनका समावेश तो प्रस्तुत पुस्तक में है ही, विविध प्रश्नों पर मौलिक चिन्तन करके अपना अभिमत देकर विदुषी लेखिका ने भरपूर चेष्टा की है कि ललित निबन्ध के विविध पक्षों पर गहन विश्लेषणाधृत विचार एक पुस्तक में मिल सकें। स्वाभाविक है कि यह पुस्तक हिन्दी ललित निबन्ध विषय पर मील का पत्थर सिद्ध होगी।
प्रस्तुत पुस्तक में अब तक उपलब्ध ज्ञान के विविध पक्षों से सम्बद्ध विषयों पर लेखिका के बेबाक विचार संकलित हैं। इसके निष्कर्ष प्रामाणिक एवं पर्याप्त सूझ-बूझ पर आधारित हैं। विचारों की स्पष्टता एवं भाषाभिव्यंजना की परिपक्वता देखते ही बनती है। लेखिका द्वारा इस पुस्तक के तैयार करने में जो गहन अध्यवसाय एवं असाधारण श्रम किया गया है, इसका अनुमान इस कृति को पढ़कर ही लगाया जा सकता है।
कुल मिलाकर हिन्दी ललित निबन्धों के स्वरूप के विविध पक्षों पर स्पष्ट विचार इस पुस्तक को विशिष्ट बनाते हैं।
—डॉ. श्रीराम शर्मा
Otan Lage Kapas
- Author Name:
Prabhash Joshi
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Description:
‘देश व्यवसाय नहीं है और किसी भी प्रगतिशील आधुनिक लोकतांत्रिक देश की पत्रकारिता सिर्फ़ व्यवसाय नहीं हो सकती।...जब तक कौशल के साथ पत्रकारिता लोगों को सही और तथ्यपरक जानकारी देने और निर्भीकता से अपना दृष्टिकोण रखने का माध्यम बनी रहेगी तब तक वह सिर्फ़ व्यवसाय के लेन-देन वाले धंधे में नहीं बदल सकती।’
नवम्बर 1991 में ‘जनसत्ता’ के कोलकाता आगमन पर लिखी गईं प्रभाष जी की ये पंक्तियाँ आज कितनी प्रासंगिक और अनुकरणीय हैं, कहने की ज़रूरत नहीं है। पत्रकारिता के इन आधारभूत मूल्यों को उन्होंने हमेशा बल दिया। जब ज़रूरत हुई सत्ता का विरोध किया, जब ठीक लगा तारीफ़ भी की।
राजीव गांधी के कामकाज का विरोध करते हुए जोशी जी ने ‘एक देवदूत का दलदल से बिदकना’ लिखा तो सोनिया गांधी को जबरन राजनीति में सक्रिय करने के कांग्रेस-जनों के प्रयास को उन्होंने ‘एक सफेद आँचल में दुबकना’ लिखा। अर्थव्यवस्था के खुलेपन का विरोध करते हुए उन्होंने लिखा कि ‘ईमानदारी से कहो कि हम गलत थे’।
‘ओटन लगे कपास’ पुस्तक को दो खंडों में बाँटा गया है। पहले खंड में केवल 13 लेख शामिल हैं। 17 नवम्बर, 1983 को ‘जनसत्ता’ उनके नेतृत्व में शुरू हुआ। पहले खंड की शुरुआत उसमें प्रकाशित उनकी पहली टिप्पणी से की गई है। दिल्ली के बाद चंडीगढ़, मुम्बई, कोलकाता और रायपुर में जनसत्ता के संस्करण प्रकाशित होने शुरू हुए। चंडीगढ़ के अलावा चारों संस्करणों के पहले दिन के लेख इस पुस्तक में हैं।
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की लम्बी हड़ताल और दिवराला सती कांड से जुड़े लेख भी इस खंड में हैं। सबसे अनोखा लेख ‘मूरख जनम गमायो’ है, जिसे उन्होंने अपनी अलिखित आत्मकथा की भूमिका माना है। इसमें उन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता के माहौल पर लिखा है। पुस्तक के दूसरे खंड में उनके सम्पादकीय छोड़ने तक की उन रचनाओं को शामिल किया गया है, जो अब तक किसी पुस्तक में नहीं आ पाई थीं।
Aadhunik Hindi Kavyalochna Ke Sau Varsh
- Author Name:
Pushpita Awasthi
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Description:
काव्यालोचना के सौन्दर्यशास्त्र और भाषा के वर्तमान परिदृश्य को उर्वर बनाने में एक साथ कम से कम तीन पीढ़ियाँ सक्रिय दिखाई देती हैं जिनमें विभिन्न तरह की प्रेरणाएँ, प्रक्रियाएँ देखी जा सकती हैं। काव्य-आलोचना का अद्यतन परिदृश्य विभिन्न-दृष्टियों के ताने-बाने से निर्मित है।
कविता अपनी रचना में ही कैसे अपना नया काव्यशास्त्र रचती-रचती है? कविता और काव्यालोचना का सौन्दर्य कैसे बनता है? जीवनानुभवों और मनस्तत्वों की भाषा में कैसी बुनावट है? क्या कारण है कि तुलसी-जायसी के व्याख्याता आचार्य शुक्ल कबीर से सहानुभूति-सह-अनुभूति नहीं महसूस करते? लेखिका इस पुस्तक में आधुनिक हिन्दी कविता और काव्यालोचना का नया सौन्दर्यशास्त्र सृजन करने के क्रम में समीक्षा की भाषा के अलावा ऐसे कई सवालों से भी दो-चार हुई हैं।
हिन्दी काव्यालोचना के सौ वर्ष की गहन पड़ताल करनेवाली यह पुस्तक कविता के अध्येताओं, शोधार्थियों व काव्य-प्रेमियों के लिए उपयोगी है।
Kaalyatri Hai Kavita
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
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- Description: सुपरिचित आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा हिन्दी कविता की यह काल-यात्रा विशेष महत्त्व रखती है। कोई रचना इतिहास के दौर में क्या रूप लेती है और मानवीय संवेदन की अन्तर्धारा उसमें किन माध्यमों से परिचालित होती है, इसकी प्रामाणिक और गहरी समझ डॉ. श्रोत्रिय को थी। अक्सर इतिहास के कालबोध की परवर्ती दृष्टि के दौर में लोग अतीत की परिस्थितियों और कवि-सीमाओं को उपेक्षित कर जाते हैं। इस पुस्तक में ऐसा आवश्यक लचीलापन है, जिससे यह अतीत को जहाँ आधुनिकता की सार्थकता में देख सकी है, वहीं युग और कवि सीमा को भी संवेदित परकाय-प्रवेश की भाँति अपने मौलिक स्वरूप में प्रतिष्ठित कर सकी है। इससे कविता इतिवृत्त नहीं रहती, बल्कि वह आगामी काल-प्रवाह में सक्रिय और प्रेरक साझीदार प्रतीत होती है। अपने समय की नवीनतम काव्य-प्रवृत्तियों को भी लेखक ने गहराई से पकड़ा है, तभी वह आदिकाल से लेकर सातवें, आठवें और नवें दशक तक के विभिन्न कविता-दौरों पर समान रूप से विचार कर सका है। यही नहीं, इस संस्करण के लिए पुस्तक को संशोधित करते हुए डॉ. श्रोत्रिय ने दो नए अध्याय भी जोड़े थे। इनमें से एक है ‘भारतीय साहित्य की परम्परा’ और दूसरा, ‘नवाँ दशक : बदलाव की नई पहल’। लम्बी कविता और हिन्दी-नवगीत पर पहले से ही दो अध्याय पुस्तक में हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ. श्रोत्रिय की यह आलोचना-कृति हिन्दी कविता का एक व्यापक और मूल्यवान अध्ययन है और मनुष्यता के चिर उपेक्षित हिस्से की पीड़ाओं को काव्य-साहित्य की प्रमुख मानवीय चिन्ताओं में शामिल करने का आग्रह करती है।
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