Rachna Ka Garbhgriha
(0)
Author:
Krishna SobtiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
250
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कृष्णा सोबती का हर क्षण सामान्यत: लेखक का ही क्षण होता था; लेखक होने को उन्होंने जीने की एक शैली के रूप में विकसित किया। लेकिन रचना के आत्यंतिक क्षण की अनायासता और उसके रहस्य को उन्होंने कभी भंग नहीं होने दिया। उस अनुभव की सम्पूर्णता उनके लिए एक बड़ी चीज़ थी। उस कौंध की आभा को जिससे रचना की पहली पंक्ति फूटती है, उन्होंने किसी ऐहिक उतावलेपन का शिकार नहीं होने दिया।</p> <p>इसीलिए उनकी हर कृति एक घटना की तरह प्रकट हुई। साहित्य समाज के लिए भी, और ख़ुद उनके लिए भी।</p> <p>इस किताब में उनकी वे टीपें ली गई हैं जो उन्होंने अपनी कुछ कृतियों की रचना-प्रक्रिया के तौर पर लिखी थीं। लेखन तथा रचनात्मकता के विषय में उनके ऐसे आलेख भी इसमें शामिल हैं, जो उनकी अपनी रचना-प्रक्रिया के साथ-साथ लेखकीय अस्मिता सम्बन्धी उनकी धारणाओं पर भी प्रकाश डालते हैं।</p> <p>नई पीढ़ी के लेखकों के लिए अपनी एक महत्त्वपूर्ण पूर्वज के रचना-कक्ष की यह यात्रा नि:सन्देह उपयोगी सिद्ध होगी है।
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कृष्णा सोबती का हर क्षण सामान्यत: लेखक का ही क्षण होता था; लेखक होने को उन्होंने जीने की एक शैली के रूप में विकसित किया। लेकिन रचना के आत्यंतिक क्षण की अनायासता और उसके रहस्य को उन्होंने कभी भंग नहीं होने दिया। उस अनुभव की सम्पूर्णता उनके लिए एक बड़ी चीज़ थी। उस कौंध की आभा को जिससे रचना की पहली पंक्ति फूटती है, उन्होंने किसी ऐहिक उतावलेपन का शिकार नहीं होने दिया।</p>
<p>इसीलिए उनकी हर कृति एक घटना की तरह प्रकट हुई। साहित्य समाज के लिए भी, और ख़ुद उनके लिए भी।</p>
<p>इस किताब में उनकी वे टीपें ली गई हैं जो उन्होंने अपनी कुछ कृतियों की रचना-प्रक्रिया के तौर पर लिखी थीं। लेखन तथा रचनात्मकता के विषय में उनके ऐसे आलेख भी इसमें शामिल हैं, जो उनकी अपनी रचना-प्रक्रिया के साथ-साथ लेखकीय अस्मिता सम्बन्धी उनकी धारणाओं पर भी प्रकाश डालते हैं।</p>
<p>नई पीढ़ी के लेखकों के लिए अपनी एक महत्त्वपूर्ण पूर्वज के रचना-कक्ष की यह यात्रा नि:सन्देह उपयोगी सिद्ध होगी है।
Book Details
-
ISBN9789394902886
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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में इसका एक अनिवार्य प्रश्न-पत्र है। इस शोध-ग्रन्थ में हिन्दी सम्पादन का इतिहास मुद्रण के पूर्व से आधुनिक काल तक दिया गया है।
पांडुलिपियों के लेखक भी अपने ढंग से कई प्रतियों का मिलान और पाठान्तर देते थे। मुद्रण प्रारम्भ होने पर पहले तो पांडुलिपि को जैसा का तैसा छाप देना प्रारम्भ हुआ और बाद में विद्वानों ने उपलब्ध सभी प्रतियों में से सबसे उपयुक्त लगनेवाला पाठ देते थे। ग्रियर्सन के समय से यह कार्य परिश्रमपूर्वक सम्पादन में देखा गया और बहुत सी कृतियाँ सुन्दर पाठ की सामने आईं।
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- Description: गोमा देवी शर्मा ने हिन्दी भाषा की साहित्येतिहास-परम्परा को एक गौरव-मणि दिया है, जिसके कारण वह नेपाल के नेपाली साहित्य से आगे बढ़कर भारतीय नेपाली साहित्य के इतिहास को अपनी सम्पदा का हिस्सा बना सकीं। उनका इतिहास-ग्रंथ हिन्दी में, भारतीय भाषाओं के पहले से उपलब्ध इतिहासों के परिवार का सदस्य बनकर हमें यह अनुभव कराएगा कि भारत की विविध भाषाओं के बहुरंगी भाषा-उद्यान के मनोज्ञ सौन्दर्य में नेपाली का भी बराबर का योगदान है। आगे बढ़कर, यह अनुभव हमारी उस देशज भारतीयता की चेतना का विस्तार करेगा, जो हमें अपनी मातृभाषाओं में विश्व को पुकारने की प्रेरणा देती है और जिससे हिन्दी जीवन-रस ग्रहण करते हुए इस महान राष्ट्र की समग्र-सम्पूर्ण अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। किसी भी साहित्येतिहासकार को न तो पूरी तरह निर्दोष इतिहास लिखने का दावा करना चाहिए, न पूर्ण अथवा अन्तिम रूप से सही इतिहास लिखने का। ऐसा कोई भी दावा इतिहास के अध्येताओं पर अत्याचार से कम नहीं होता; क्योंकि इससे उनकी ज्ञान की लोकतांत्रिकता पर संकट मँडराने लगता है।...इतिहास के अध्येता स्वयं कुछ प्रश्नों—जिसने इतिहास लिखा है, क्या पहले उसने स्वयं इतिहासकार होने की पात्रता प्राप्त की है? क्या उसके पास इतिहास-दृष्टि है? क्या उसके भीतर इतिहासकार के लिए अनिवार्य नैतिकता-बोध है? क्या उसे इतिहास-दर्शन और इतिहास-लेखन के उद्देश्य की समझ है? क्या वह इतिहास-लेखन की वैज्ञानिक प्रक्रिया से परिचित है? क्या वह विचार-स्वातंत्र्य का पक्षधर है?—आदि पर विचार करने और निर्णय लेने को स्वतंत्र होते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर भी इतिहासकार को अनिवार्य रूप से अपने लिखे इतिहास की सामग्री के भीतर ही उसका स्वाभाविक अंग बना कर देने होते हैं...। यह साहित्येतिहास आश्वस्त करता है कि गोमा देवी शर्मा सवालों से भी परिचित हैं, चुनौतियों से भी और अपने दायित्व से भी। उन्होंने वैचारिक-आग्रहों को सूचनाओं के चयन अथवा विवेचन-विश्लेषण पर हावी नहीं होने दिया है।
Shreshth Lalit Nibandh : Vol. 2
- Author Name:
Krishna Bihari Mishra +1
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Description:
‘ललित निबन्ध' नाम से ख्यात व्यक्तित्व-प्रधान निबन्ध-विधा की भारतीय भाषाओं में अलग-अलग संज्ञा है, पर सबकी प्रकृति एक ही है। निबन्ध शैली में रचित ललित निबन्ध के विधा-वैशिष्ट्य को संक्षेप में रेखांकित करने की चेष्टा प्रथम खंड के सम्पादकीय वक्तव्य में की गई है।
प्रस्तुत खंड में संकलित हिन्दीतर भारतीय भाषा के निबन्धों को देखकर भारतीय साहित्य की एक विशिष्ट विधा का परिचय मिल जाएगा। संक्रमण काल के जातीय परिदृश्य और संवेदना की व्यंजक अभिव्यक्ति से यह विधा अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त है। इसकी उन्मुक्त प्रकृति अधिक सम्भावनापूर्ण है। हास-परिहास और गपशप के व्याज से ज्वलन्त सांस्कृतिक प्रश्नों, मनुष्य की अस्मिता और धूमायित करनेवाले मानव-प्रणीत प्रपंच-प्रदूषण और समाज के अधोमुखी प्रवाह पर तीखा व्यंग्य-कटाक्ष इन निबन्धों में ललित मुद्रा में प्रकट हुआ है।
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