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Ritikavya: Mulyankan Ke Naye Ayam

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रीतिकाव्य साहित्य और संवेदना का सौन्दर्यबोधीय और कलात्मक सृजन है। कोई भी जाति, सौन्दर्य और शृंगार से विलग होकर न तो जीवन के प्रति आकर्षण पैदा कर सकती है न विचारों में तेज। रीतिकाव्य मनुष्य की ऐहिकता को कला और सौन्दर्य के वैभव में सिरजने वाला काव्य है। हिन्दी- उर्दू कविता की साझा भाषायी संस्कृति भी इसी युग में प्रतिफलित हुई। साहित्येतिहास और आलोचना लेखन के विकास में 'रीतिकाव्य' को प्रायः उपेक्षित दृष्टि से ही आकलित किया गया। आलोचना और इतिहास लेखन के आरम्भिक दौर में 'रीतिकाव्य' को औपनिवेशिक विक्टोरियाई नैतिकता के चश्मे से ही देखा गया। द्विवेदी युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने रीतिविरोधी आलोचना का ऐसा अभियान चलाया कि हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रामविलास शर्मा जैसे प्रगतिशील आलोचक भी मूल्यांकन की इस विरोधी परम्परा को पोषित-पल्लवित करते नजर आते हैं। ये आलोचक रीतिकालीन कवियों के काव्य मर्म की तो प्रशंसा करते हैं लेकिन ऐतिहासिक मूल्यांकन करते समय रीतिकाव्य को दरबारी मानसिकता को पोषित करने वाला सामन्ती साहित्य कहकर उसे जनविरोधी कविता के खाँचे में डाल देते हैं। भारतीय चिन्तन परम्परा के वर्चस्ववादी और औपनिवेशिक नैतिकता के संश्लेष से निर्मित इस 'इतिहास दृष्टि' से उबरकर ही 'रीतिकाव्य' के साहित्य की सही पड़ताल की जा सकती है। यह पुस्तक रीतिकाव्य में विन्यस्त कला, सौन्दर्य और सृजन के वैभव को इतिहास की निरन्तरता में मूल्यांकित करने का प्रयास है। पुस्तक में रीतिकाव्य विषयक इतिहास, लेखन और आलोचना दृष्टि पर पुनर्विचार के साथ रीतिकाव्य के परिवेश, प्रवृत्ति और उसकी कविताई को साहित्य के नये विमर्शो और मूल्यों के साथ परखने की कोशिश है। पुस्तक में नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय, नित्यानन्द तिवारी जैसे वरिष्ठ पीढ़ी के आलोचकों के साथ युवा पीढ़ी के आलोचकों में श्रीप्रकाश शुक्ल, कृष्णमोहन और आशीष त्रिपाठी के आलेख रीतिकाव्य को मूल्यांकित करने की नयी दृष्टि प्रदान करते हैं।

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रीतिकाव्य साहित्य और संवेदना का सौन्दर्यबोधीय और कलात्मक सृजन है। कोई भी जाति, सौन्दर्य और शृंगार से विलग होकर न तो जीवन के प्रति आकर्षण पैदा कर सकती है न विचारों में तेज। रीतिकाव्य मनुष्य की ऐहिकता को कला और सौन्दर्य के वैभव में सिरजने वाला काव्य है। हिन्दी- उर्दू कविता की साझा भाषायी संस्कृति भी इसी युग में प्रतिफलित हुई। साहित्येतिहास और आलोचना लेखन के विकास में 'रीतिकाव्य' को प्रायः उपेक्षित दृष्टि से ही आकलित किया गया। आलोचना और इतिहास लेखन के आरम्भिक दौर में 'रीतिकाव्य' को औपनिवेशिक विक्टोरियाई नैतिकता के चश्मे से ही देखा गया। द्विवेदी युग में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने रीतिविरोधी आलोचना का ऐसा अभियान चलाया कि हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और रामविलास शर्मा जैसे प्रगतिशील आलोचक भी मूल्यांकन की इस विरोधी परम्परा को पोषित-पल्लवित करते नजर आते हैं। ये आलोचक रीतिकालीन कवियों के काव्य मर्म की तो प्रशंसा करते हैं लेकिन ऐतिहासिक मूल्यांकन करते समय रीतिकाव्य को दरबारी मानसिकता को पोषित करने वाला सामन्ती साहित्य कहकर उसे जनविरोधी कविता के खाँचे में डाल देते हैं। भारतीय चिन्तन परम्परा के वर्चस्ववादी और औपनिवेशिक नैतिकता के संश्लेष से निर्मित इस 'इतिहास दृष्टि' से उबरकर ही 'रीतिकाव्य' के साहित्य की सही पड़ताल की जा सकती है। यह पुस्तक रीतिकाव्य में विन्यस्त कला, सौन्दर्य और सृजन के वैभव को इतिहास की निरन्तरता में मूल्यांकित करने का प्रयास है। पुस्तक में रीतिकाव्य विषयक इतिहास, लेखन और आलोचना दृष्टि पर पुनर्विचार के साथ रीतिकाव्य के परिवेश, प्रवृत्ति और उसकी कविताई को साहित्य के नये विमर्शो और मूल्यों के साथ परखने की कोशिश है। पुस्तक में नामवर सिंह, मैनेजर पाण्डेय, नित्यानन्द तिवारी जैसे वरिष्ठ पीढ़ी के आलोचकों के साथ युवा पीढ़ी के आलोचकों में श्रीप्रकाश शुक्ल, कृष्णमोहन और आशीष त्रिपाठी के आलेख रीतिकाव्य को मूल्यांकित करने की नयी दृष्टि प्रदान करते हैं।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2016
Weight
198 grams
ISBN-13
9789352211135
Pages
317
Reading time
~11 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21 cm
Language
Hindi

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