Samta Aur Sampannta
Author:
Rammanohar LohiaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
राजनीति के साधारण कार्यकर्ता को मात्र दर्शक नहीं होना चाहिए। उसे पढ़ना-लिखना चाहिए। देश-विदेश की जानकारी और छोटी-बड़ी सूचनाओं पर उसकी नज़र रहनी चाहिए। दरबारगीरी, चापलूसी और चुगलखोरी उसके सबसे बड़े दुश्मन हैं। इन्हीं के चलते भारतीय राजनीति पर यथास्थितिवाद का आवरण पड़ गया है।</p>
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<p>बातें जो लोहिया ने 1967 में लिखे एक लेख में कही थीं, इस बात का सबूत हैं कि वे अपने देश की समस्याओं को कितनी गहराई से देख-समझ रहे थे। ‘गैरकांग्रेसवाद और समाजवाद’ शीर्षक इस आलेख में उन्होंने उन विसंगतियों की तरफ़ उसी समय इशारा कर दिया था जो आगे चलकर बहुत नुकसानदेह साबित होनेवाली थीं।</p>
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<p>इसी पुस्तक में ‘अंग्रेज़ी हटाओ’ के मुद्दे पर विचार करते हुए वे लिखते हैं : ‘मेरी अपनी राय है कि एक दफ़ा अंग्रेज़ी को हटा करके सभी भाषाओं को मौक़ा दे दिया जाए।’ लोग अंग्रेज़ी में काम न करें, या तो हिन्दी में करें या फिर अपनी मातृभाषा में। इसी आलेख में हिन्दी और उर्दू के विषय में उनका कहना है कि ‘हिन्दुस्तानियों में हिम्मत रही तो हिन्दी-उर्दू एक ही भाषा के दो नाम, रूप और शैलियाँ होकर रहेंगी।’</p>
<p> </p>
<p>इस पुस्तक में उनके ऐसे ही अनेक विचार हमें पढ़ने को मिलते हैं जो उनकी दूरदृष्टि और मौलिक सोच के परिचायक हैं। समाज में छोटी मशीनों की उपयोगिता, समता और सम्पन्नता के सम्बन्ध आदि सैद्धान्तिक विषयों के अलावा यहाँ ‘नक्सलबाड़ी’, ‘विद्यार्थी आन्दोलन’, ‘चाँद की यात्रा’ और ‘हिमालय बचाओ’ जैसी तात्कालिक घटनाओं और उनसे जुड़े मुद्दों पर भी उनकी टिप्पणियाँ शामिल हैं।</p>
<p>यह पुस्तक लोहिया के चिन्तन के आधारभूत तत्त्वों को रेखांकित करती हैं।
ISBN: 9788180312786
Pages: 231
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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कविता का विवेचन उसकी सर्जनात्मक सार्थकता का विवेचन होता है। यह सार्थकता भावकीय प्रतिभा से कविता की कलावटी गाँठों को खोलते हुए उसके अर्थ-गह्वर में प्रवेश करने से सम्भव हो पाती है। हिन्दी काव्यालोचन अब तक अपनी लक्ष्मण-रेखा में घिरा रहा है। वह प्रवृत्तिगत, विकासात्मक, सैद्धान्तिक और वादारोपित बहस-मुबाहसे से ग्रस्त-सा है। मार्क्सवादी आलोचना को तो अपनी एकरसता में किसी भी कविता की आन्तर गहराई में उतरने से प्राय: परहेज़ ही रहा है, जिसके कारण कविता का भावन और बोधन केवल सामाजिक यथार्थ की अभिधेयात्मकता तक सीमित-प्रतिबन्धित रह गया है, जबकि उसमें अशेष प्रतीयमान, सर्जनात्मक साभिप्रायता विद्यमान होती है। यहाँ तक कि इसमें मार्क्सवादी सामाजिक यथार्थ की अनेकानेक परतें भी समाविष्ट रहती हैं।
ऐसे में प्रतीयमान आभ्यन्तर को उद्घाटित करनेवाली यह वह प्रतीक्षित आलोचना-कृति है, जो स्थापित करती है कि कविता की सही पहचान-परख उसके तलान्वेषित कथ्यों और अर्थच्छवियों की बहुआयामिता पर निर्भर है।
कहना होगा कि कविताओं की साभिप्राय पुनस्सर्जना के माध्यम से काव्यलोचन के नए क्षितिज का सन्धान और दिशा-निर्देश करनेवाली यह पुस्तक अब तक की निर्धारित लक्ष्मण-रेखा के बाहर जाकर हिन्दी काव्यालोचन को समृद्ध करती है। साथ ही नई आलोचकीय प्रतिभाओं को इस दिशा में सक्रिय होने हेतु आमंत्रित भी करती है। हिन्दी आलोचना में कविता के पाठकों और आलोचकों को संवेदन-समृद्ध करनेवाली एक अत्यन्त उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक।
Shabd Shuddh Uchcharan Avm Padbhar
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Dr. Azam
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Kaalyatri Hai Kavita
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Prabhakar Shrotriya
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- Description: सुपरिचित आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा हिन्दी कविता की यह काल-यात्रा विशेष महत्त्व रखती है। कोई रचना इतिहास के दौर में क्या रूप लेती है और मानवीय संवेदन की अन्तर्धारा उसमें किन माध्यमों से परिचालित होती है, इसकी प्रामाणिक और गहरी समझ डॉ. श्रोत्रिय को थी। अक्सर इतिहास के कालबोध की परवर्ती दृष्टि के दौर में लोग अतीत की परिस्थितियों और कवि-सीमाओं को उपेक्षित कर जाते हैं। इस पुस्तक में ऐसा आवश्यक लचीलापन है, जिससे यह अतीत को जहाँ आधुनिकता की सार्थकता में देख सकी है, वहीं युग और कवि सीमा को भी संवेदित परकाय-प्रवेश की भाँति अपने मौलिक स्वरूप में प्रतिष्ठित कर सकी है। इससे कविता इतिवृत्त नहीं रहती, बल्कि वह आगामी काल-प्रवाह में सक्रिय और प्रेरक साझीदार प्रतीत होती है। अपने समय की नवीनतम काव्य-प्रवृत्तियों को भी लेखक ने गहराई से पकड़ा है, तभी वह आदिकाल से लेकर सातवें, आठवें और नवें दशक तक के विभिन्न कविता-दौरों पर समान रूप से विचार कर सका है। यही नहीं, इस संस्करण के लिए पुस्तक को संशोधित करते हुए डॉ. श्रोत्रिय ने दो नए अध्याय भी जोड़े थे। इनमें से एक है ‘भारतीय साहित्य की परम्परा’ और दूसरा, ‘नवाँ दशक : बदलाव की नई पहल’। लम्बी कविता और हिन्दी-नवगीत पर पहले से ही दो अध्याय पुस्तक में हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ. श्रोत्रिय की यह आलोचना-कृति हिन्दी कविता का एक व्यापक और मूल्यवान अध्ययन है और मनुष्यता के चिर उपेक्षित हिस्से की पीड़ाओं को काव्य-साहित्य की प्रमुख मानवीय चिन्ताओं में शामिल करने का आग्रह करती है।
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