Aankhan Dekhi Bihar Andolan
About the book
"आँखन देखी : बिहार आंदोलन एक आंदोलन दूसरे आंदोलन की याद दिलाता है। हाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण 1974 के बिहार (जेपी) आंदोलन की खूब चर्चा हुई है। 1974 के दशक में या उसके बाद की जनमी नई पीढ़ी 1974 के आंदोलन के बारे में जानना-समझना चाहती है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त सामग्री की कमी है। हाल में दिल्ली के नृशंस गैंप रेप के विरोध में दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में स्वतःस्फूर्त जन विस्फोट हुआ। बिहार आंदोलन के बाद पहली बार सामाजिक सरोकार के सवाल पर देश के छात्र-छात्राओं की इतनी बड़ी शक्ति दिल्ली के राजपथ (जिन पर आंदोलनात्मक गतिविधियाँ प्रतिबंधित रही हैं) पर अपनी आवाज बुलंद कर रही थी। क्या भारत की यह युवा शक्ति इस पुरुष-प्रधान समाज एवं पूँजीवादी व्यवस्था की गैर-बराबरी, अन्याय एवं अत्याचार को खत्म करने तथा समतामूलक लोकतांत्रिक समाज की स्थापना करने की दिशा में पहल कर पाएगी? प्रस्तुत पुस्तक बिहार आंदोलन की व्यापकता और उसमें बुनियादी परिवर्तन और क्रांति के बीज होने की क्षमता का आँखों देखा प्रामाणिक विवरण पेश करती है। एक पत्रिका में छपे लेखों, रपटों और दस्तावेजों के माध्यम से किसी आंदोलन पर ऐसी पुस्तक शायद ही हिंदी में कोई दूसरी हो। बिहार की संघर्षशीलता, जुझारूपन और आंदोलन-शक्ति को समझने में सहायक एक उपयोगी पुस्तक।
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About the Book
"आँखन देखी : बिहार आंदोलन
एक आंदोलन दूसरे आंदोलन की याद दिलाता है। हाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण 1974 के बिहार (जेपी) आंदोलन की खूब चर्चा हुई है। 1974 के दशक में या उसके बाद की जनमी नई पीढ़ी 1974 के आंदोलन के बारे में जानना-समझना चाहती है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त सामग्री की कमी है।
हाल में दिल्ली के नृशंस गैंप रेप के विरोध में दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में स्वतःस्फूर्त जन विस्फोट हुआ। बिहार आंदोलन के बाद पहली बार सामाजिक सरोकार के सवाल पर देश के छात्र-छात्राओं की इतनी बड़ी शक्ति दिल्ली के राजपथ (जिन पर आंदोलनात्मक गतिविधियाँ प्रतिबंधित रही हैं) पर अपनी आवाज बुलंद कर रही थी। क्या भारत की यह युवा शक्ति इस पुरुष-प्रधान समाज एवं पूँजीवादी व्यवस्था की गैर-बराबरी, अन्याय एवं अत्याचार को खत्म करने तथा समतामूलक लोकतांत्रिक समाज की स्थापना करने की दिशा में पहल कर पाएगी?
प्रस्तुत पुस्तक बिहार आंदोलन की व्यापकता और उसमें बुनियादी परिवर्तन और क्रांति के बीज होने की क्षमता का आँखों देखा प्रामाणिक विवरण पेश करती है। एक पत्रिका में छपे लेखों, रपटों और दस्तावेजों के माध्यम से किसी आंदोलन पर ऐसी पुस्तक शायद ही हिंदी में कोई दूसरी हो। बिहार की संघर्षशीलता, जुझारूपन और आंदोलन-शक्ति को समझने में सहायक एक उपयोगी पुस्तक।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 563 grams
- ISBN-13
- 9789350483602
- Pages
- 384
- Reading time
- ~7 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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Aankhan Dekhi: Bihar Andolan is an eyewitness account of the 1974 Bihar movement, a watershed moment in India's political history when students rallied behind Jayaprakash Narayan to challenge systemic corruption. This book fills a critical gap for readers born after the 1970s who seek to understand the roots of India's anti-corruption consciousness. The author draws explicit parallels between the JP Movement and contemporary protests — from Anna Hazare's movement to the spontaneous student uprising after the 2012 Delhi gang rape — demonstrating how Bihar's struggle established the template for grassroots political resistance in India. Written in accessible Hindi, it offers not just historical documentation but a lens through which to interpret every mass movement that has followed, making it indispensable for anyone seeking to understand the DNA of Indian civil society activism.
Aankhan Dekhi: Bihar Andolan पढ़ने से मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह किताब आपको 1974 के बिहार आंदोलन के भीतर ले जाती है जैसे आप खुद वहाँ मौजूद हों। प्रत्यक्षदर्शी विवरण के कारण आप उस दौर की उत्तेजना, संघर्ष और आशा को महसूस कर सकेंगे। यह सूखा इतिहास नहीं बल्कि एक जीवंत राजनीतिक जागरण की गवाही है जो आपको आज के आंदोलनों को नए नज़रिये से देखने पर मजबूर करेगी।
Aankhan Dekhi: Bihar Andolan किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या पृष्ठभूमि चाहिए?
यह किताब उन युवा पाठकों के लिए आदर्श है जो 1974 के बाद पैदा हुए और जेपी आंदोलन के बारे में प्रामाणिक जानकारी चाहते हैं। राजनीति विज्ञान के छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और समकालीन आंदोलनों की जड़ें समझने में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह अनिवार्य है। हिंदी में लिखी होने के कारण यह उन पाठकों तक पहुँचती है जिनके लिए भारतीय राजनीतिक इतिहास की अंग्रेजी सामग्री दुर्लभ या दुर्गम है।
आज के भारतीय पाठकों के लिए बिहार आंदोलन का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व क्या है?
बिहार आंदोलन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ नागरिक प्रतिरोध का पहला सफल मॉडल स्थापित किया जो आज भी प्रासंगिक है। अन्ना हज़ारे आंदोलन से लेकर दिल्ली के छात्र प्रदर्शनों तक सभी में जेपी आंदोलन की छाया दिखती है। यह किताब दिखाती है कि कैसे 1974 ने भारतीय लोकतंत्र में जन-शक्ति की अवधारणा को पुनर्परिभाषित किया और आज की युवा पीढ़ी को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सचेत बनाया।
इस विषय पर लेखक का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट बनाता है?
लेखक का प्रत्यक्षदर्शी होना इस किताब को विशिष्ट बनाता है — यह दूर से लिखा गया विश्लेषण नहीं बल्कि मैदान से आई गवाही है। किताब केवल आंदोलन का विवरण नहीं देती बल्कि उसे समकालीन घटनाओं — 2012 की दिल्ली घटना के बाद के विरोध — से जोड़ती है। यह तुलनात्मक दृष्टिकोण पाठकों को यह समझने में मदद करता है कि भारत में जन आंदोलनों की एक निरंतर परंपरा है।
किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या बचता है — भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से?
यह किताब आपको राजनीतिक चेतना की शक्ति का विश्वास देकर जाती है। आप समझते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई कोई नई बात नहीं बल्कि एक लंबी यात्रा का हिस्सा है। भावनात्मक रूप से यह आपको उस पीढ़ी के संघर्ष से जोड़ती है जिसने लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़कों पर उतरना चुना। बौद्धिक रूप से यह आपको हर आंदोलन को ऐतिहासिक संदर्भ में देखना सिखाती है।
