Nagarjun Antrang Aur Srijan-Karm
Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 480
₹
600
Available
यह पुस्तक नागार्जुन के अन्तरंग जीवन, व्यक्तित्व और उनके सम्पूर्ण कृतित्व पर सृजनकर्मियों तथा समालोचकों द्वारा लिखे गए लेखों का संचयन-संकलन है।
आत्म-साक्षात्कार के अन्तर्गत 'आईने के सामने' में बाबा नागार्जुन ने अपने ही व्यक्तित्व और सृजनधर्मी स्वभाव का खुलासा किया है। इसके अलावा मनोहर श्याम जोशी द्वारा बाबा से ली गई भेंटवार्ता तथा उनके ग्रामीण परिसर में परिवार समेत पूरे परिवेश का आँखों देखा हाल इब्बार रब्बी ने प्रस्तुत किया है। संस्मरण खंड के अन्तर्गत रामविलास शर्मा, रामशरण शर्मा मुंशी, शोभाकान्त, खगेन्द्र ठाकुर आदि की टिप्पणियाँ हैं।
समालोचना खंड में अनेक ठोस साहित्यिक सन्दर्भों में तीस आलेखों का संचयन किया गया है। इन आलेखों में स्त्री-विमर्श, जनोन्मुख जीवन यथार्थ, संगीत तत्त्व, मूर्तिमत्ता और नागार्जुन के काव्य की व्यंग्यात्मकता पर विचार किया गया है। इस खंड में अन्तिम आलेख उनके मैथिली साहित्य पर केन्द्रित है।
यह किताब नागार्जुन के कृतित्व के विविध पक्षों को उद्घाटित करती है, इसीलिए यह अपनी सार्थकता रखती है।
ISBN: 9788180318542
Pages: 308
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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प्रस्तुत पुस्तक प्रतिरोध की संस्कृति के ऐतिहासिक विकासक्रम में निराला की प्रतिरोधी चेतना को उनके समग्र रचनात्मक जगत में चिन्हित करती है। कहना न होगा कि निराला के साहित्य की गहरी समझ और साफ़-सुथरी वैचारिकी के नाते अनायास ही यह किताब रामविलास जी का स्मरण कराती है। रामविलास जी के प्रभाव के बतौर हम देखते हैं कि यह किताब, जीवन-संघर्ष और रचना दोनों के जटिल अन्तर्द्वन्द्वों के रिश्तों को समझते हुए आगे बढ़ती है।
निराला की कविताओं पर काफ़ी काम हुए हैं पर विवेक यहाँ निराला के कविता-संसार में अन्य पहलुओं के साथ ही दलित और स्त्री अस्मिताओं की महत्त्वपूर्ण शिनाख़्त भी करते हैं। कथा-साहित्य में निराला के उपन्यासों और कहानियों में यथार्थवाद की गहरी समझ को चिन्हित करते हुए विवेक, निराला के गहन समयबोध को निराला के ही शब्दों में रेखांकित करते हैं—“...यह लड़ाई जनता की लड़ाई है और फ़ासिज़्म के ख़िलाफ़ विजय पाना हमारे और विश्व के कल्याण के लिए ज़रूरी है।”
निराला की यह चिन्ता आज हमारे लिए और अधिक प्रासंगिक हो जाती है जब विकास और धर्मान्धता साथ-साथ फल-फूल रहे हैं और फासीवादी ख़तरा एकदम आसन्न है। निराला के शोषण-विरोधी चिन्तन पर लिखा गया अंश किताब का बेहतरीन हिस्सा है। विवेक इस हिस्से में निराला के कम चर्चित पर बेहद महत्त्वपूर्ण लेखों के सहारे उनकी निःशंक साम्राज्यवाद-विरोधी, सामन्तवाद-विरोधी दृष्टि पर प्रकाश डालते हैं। अपने समकाल की राजनैतिक हलचलों, वैश्विक स्थितियों और उपनिवेशवादी शासन की गहरी समझ निराला के चिन्तनपरक लेखों में मौजूद है।
विवेक ने इस पुस्तक में निराला की रचनाओं के नए अस्मिता केन्द्रित पाठ पर सवालिया निशान लगाते हुए निराला को उद्धृत किया है—“तोड़कर फेंक दीजिए जनेऊ जिसकी आज कोई उपयोगिता नहीं, जो बड़प्पन का भ्रम पैदा करता है और सम स्वर से कहिए कि आप उतनी ही मर्यादा रखते हैं जितना आपका नीच से नीच पड़ोसी चमार या भंगी रखता है।” यह पुस्तक भारतीय आधुनिक साहित्य की शोषणविरोधी परम्परा को बढ़ाने में निराला के योग को बेहतरीन ढंग से रेखांकित करती है। इसे पढ़ना एक विचारोत्तेजक अनुभव से गुज़रना है।
—मृत्युंजय
Hindi Ka Vishva Sandarbha
- Author Name:
Karunashankar Upadhyay
- Book Type:

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Description:
हिन्दी को वैश्विक सन्दर्भ प्रदान करने में विश्वभर में फैले हुए तीन करोड़ से ज़्यादा प्रवासी भारतीयों का विशेष प्रदेय है। वे हिन्दी के द्वारा अन्य भाषा-भाषियों के साथ सांस्कृतिक संवाद क़ायम करते हैं। आज हिन्दी विश्व के सभी महाद्वीपों तथा राष्ट्रों—जिनकी संख्या एक सौ चालीस से भी अधिक है—में किसी-न-किसी रूप में प्रयुक्त हो रही है। इस समय वह विश्व की तीन सबसे बड़ी भाषाओं में से है। वह विश्व के विराट फलक पर नवलचित्र के समान प्रकट हो रही है। वह बोलनेवालों की संख्या के आधार पर मन्दारिन (चीनी) के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा बन गई है, जबकि वह जिन राष्ट्रों में प्रयुक्त हो रही है, उनके संख्या-बल की दृष्टि से वह अंग्रेज़ी के बाद दूसरे क्रमांक पर है।
हिन्दी को वैश्विक परिदृश्य प्रदान करने में फ़िल्मों, पत्र-पत्रिकाओं, प्रकाशन संस्थानों, भारत सरकार के उपायों, उपग्रह चैनलों, विज्ञापन-एजेंसियों, बहुराष्ट्रीय निगमों, यांत्रिक सुविधाओं तथा शिक्षण प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से प्रशिक्षित पेशेवर मानव संसाधन का विशिष्ट अवदान रहा है। इसके अलावा उसमें विकसित विश्वस्तरीय साहित्य तथा साहित्यकारों का आधारभूत प्रदेय तो सर्वविदित है। ऐसी स्थिति में विश्व व्यवस्था को परिचालित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने तथा अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों में प्रयुक्त होनेवाली विश्वभाषा के ठोस निकष एवं प्रतिमान पर हिन्दी का गहन परीक्षण सामयिक दौर की अपरिहार्य माँग है। इसी लक्ष्य को पाने तथा हिन्दी जगत को वैश्विक स्तर पर हिन्दी की शक्ति एवं सम्भावना से परिचित कराने के उद्देश्य को लेकर प्रस्तुत पुस्तक संकल्पित है।
यह पुस्तक विदेश यात्राओं से प्राप्त सूचना एवं अनुभव, अनवरत अध्ययन, भाषिक चिन्तन तथा हिन्दी के विकसनशील व्यक्तित्व के तमाम आयामों की वैचारिक फलश्रुति है जो ग्यारह अध्यायों में हिन्दी के विश्व सन्दर्भ के वस्तुनिष्ठ एवं तथ्यगत विश्लेषण के प्रयास की अभिव्यक्ति है। हमें विश्वास है कि यह पुस्तक हिन्दी जगत में आत्मविश्वास भरेगी और वह खुले मन से इस पुस्तक का स्वागत करेगा।
Hindi Gadya : Vinyas Aur Vikas
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

- Description: वर्तमान युग गद्य है, अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में। इस दृष्टि से गद्य की प्रकृति और उसके विकास को समझने का क्रम आधुनिक साहित्य की समग्र परम्परा को देखने-परखने की प्रक्रिया तो है ही, एक व्यापक स्तर पर वह समूची हिन्दी जाति की मानसिकता को समझने का यत्न भी है। आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी की अभिनव कृति ‘हिन्दी गद्य : विन्यास और विकास’ यही काम करती है। गद्य विषयक तथ्य-सामग्री यहाँ जितनी विश्वसनीय है, उतना ही गद्य का विवेचन अपने में स्वयं गद्य का मानक रूप बन सका है। इस द्विस्तरीय उपलब्धि का अनुमान पुस्तक के किसी भी अंश को पढ़ने पर आसानी से हो सकता है। फिर गद्य के प्रसार और विस्तार में काव्य-रूपों का उदय कैसे होता है, यह मौलिक विवेचन प्रस्तुत अध्ययन की निजी विशेषताओं में से एक है। ग्रन्थ का विवेचन-क्रम तीन खंडों में चलता है। प्रथम खंड में गद्य की सामान्य प्रकृति का विश्लेषण है, द्वितीय में हिन्दी गद्य के एक हज़ार वर्षों का विकास-क्रम सोदाहरण विस्तार में अंकित हुआ है, और तीसरे तथा अन्तिम खंड में हिन्दी के प्रमुख गद्यकारों का सम्रग्र तथा स्वतंत्र रूप से विवेचन है। अन्त में कई परिशिष्टों के अन्तर्गत गद्यविषयक कुछ सामान्यत: दुर्लभ सामग्री सँजोई गई है, जो हर स्तर के अध्येता के लिए रुचिकर और उपयोगी दोनों होगी। यों गद्य आज जैसे समस्त जीवन में परिव्याप्त है उसके अनुकूल ही इस अध्ययन को परिपूर्ण बनाने का आलोचकीय यत्न है विविध वर्ग के पाठकों की तुष्टि कर सकने के लिए।
Hindi Kavya Ka Ithas
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

- Description: हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास' (1986 : सोलहवाँ संवर्द्धित संस्करण : 2002) रामस्वरूप चतुर्वेदी की बहुपठित और चर्चित इतिहास-कृति है | साहित्य के गद्य-पक्ष का विस्तृत व्यौरेवार अध्ययन उन्होंने 'हिंदी गद्य : विन्यास और विकास' (1996) शीर्षक से प्रस्तुत किया | इस क्रम में कविता के स्वतंत्र आलोचनात्मक अध्ययन की अपेक्षा अभी थी | वह इस नयी कृति 'हिंदी काव्य का इतिहास' से पूरी होती है | यहाँ हिंदी कविता के विविध कालों, उनकी प्रवृतियों, और विशिष्ट रचनाकारों का क्रमबद्ध व्यवस्थित अध्ययन किया गया है | यों, कबीर से लेकर कविता के नवीनतम विकास-क्रम को उस की सूक्ष्म से सूक्ष्म भंगिमाओं में दरसाया जा सका है | प्रस्तुत अध्ययन में लेखक की पूर्व-प्रकाशित हुई कृतियों का, कुछ नये पर्यवेक्षण के साथ, संयोजन-संगमन कुछ इस रूप में हुआ है कि हिंदी कविता के सन्दर्भ में एक समग्र नया परिप्रेक्ष्य उभराता है, जिससे पूरी हिंदी कविता के संवेदनात्मक विकास, तथा उस के विशिष्ट कवियों को समझने में महत्वपूर्ण दृष्टि अध्येता इस कृति को सम्मान रुचि के साथ उपयोगी पाएँगे | यों, आलोचना की उपर्युक्त ये तीनों रचनाएँ परस्पर-सापेक्षता में स्वतंत्र-समग्र अध्ययन हैं, हिंदी साहित्य की संवेदनशील समझ बनाने के लिए |
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