Aadhunik Kavita Ka Punarpath
Author:
Karunashankar UpadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 796
₹
995
Available
प्रस्तुत पुस्तक भारतेन्दु से लेकर समसामयिक कविता तक में विद्यमान नए पाठ की सम्भावना का सन्धान करते हुए उसका वस्तुनिष्ठ एवं गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें ‘भारतेन्दु का काव्यदर्शन’, ‘शलाकापुरुष महावीर प्रसाद द्विवेदी की नारी चेतना’, ‘साकेत की उर्मिला का पुनर्पाठ’, ‘गुप्त जी की कैकेयी का नूतन पक्ष’, ‘जयशंकर प्रसाद के पुनर्मूल्यांकन के ठोस आयाम’, ‘प्रसाद साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप’, ‘कामायनी में प्रकृति-चित्रण का स्वरूप’, ‘कामायनी : एक उत्तर आधुनिक विमर्श’, ‘स्त्री-विमर्श और प्रसाद काव्य के शिखर नारी चरित्र’, ‘निराला की आलोचना-दृष्टि का विश्लेषण’, ‘दिनकर का कुरुक्षेत्र’, ‘रश्मिरथी का पुनर्पाठ’, ‘शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के काव्य में राष्ट्रीय चेतना’, ‘अज्ञेय के काव्य में संवेदनशीलता’, ‘भवानी प्रसाद मिश्र के काव्य में गांधीवादी चेतना’, ‘नरेश मेहता का संवेदनात्मक औदात्य’, ‘मुक्तककार बेकल’, ‘अन्तस् के स्वर : कवि मन की पारदर्शी अभिव्यक्ति’, ‘धूमिल अर्थात् कविता में लोकतंत्र’, ‘ग़ज़ल दुष्यन्त के बाद : एक विश्लेषण’, ‘कविता का समाजशास्त्र एवं शोभनाथ यादव की कविताएँ’, ‘कविताओं का सौन्दर्यशास्त्र और शोभनाथ की कविताएँ’, ‘रुद्रावतार : अद्भुत भाषा सामर्थ्य की विलक्षण कविता’, ‘संशयात्मा के ख़तरे से आगाह कराती कविताएँ’, ‘हिन्दी ग़ज़ल का दूसरा शिखर : दीक्षित दनकौरी’, ‘ग़ज़ल का अन्दाज़ ‘कुछ और तरह से भी’’, ‘चहचहाते प्यार की गन्ध से घर-बार महकाते गीत’, ‘सामाजिक प्रतिबद्धता का दलित-स्त्रीवादी वृत्त’, ‘समकालीन हिन्दी कविता : दशा एवं दिशा’ तथा ‘समकालीन कविता के सामाजिक सरोकार’ जैसे विषयों के अन्तर्गत इस युग के समूचे काव्य का विशद् विश्लेषण किया गया है। साथ ही परिशिष्ट के अन्तर्गत ‘जन अमरता के गायक विंदा करंदीकर’ तथा ‘परम्परा एवं आधुनिकता के समरस कवि अरुण कोलटकर’ जैसे शीर्षकों के अन्तर्गत मराठी के दो शिखर कवियों का सम्यक् विश्लेषण किया गया है।</p>
<p>छात्रों, मनीषियों, चिन्तकों तथा सामान्य पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी यह पुस्तक आधुनिक काव्य पर विशिष्ट अध्ययन होने के साथ-साथ नवीन समीक्षात्मक प्रतिमानों के सन्धान द्वारा उसका पुनर्पाठ तैयार करने का एक गम्भीर और साहसिक प्रयास है।
ISBN: 9788183612593
Pages: 304
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Kavita Ki Zameen Aur Zameen Ki Kavita
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’, ‘छायावाद’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसी कविता-केन्द्रित पुस्तकों के लेखक प्रो. नामवर सिंह के अब तक असंकलित कविता-केन्द्रित निबन्धों का संकलन है—‘कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता’। ये निबन्ध लगभग पाँच दशकों की विस्तृत अवधि में लिखे गए थे। संस्कृत कविता से लेकर प्रगतिशील काव्यधारा और नई कविता के कवियों पर केन्द्रित निबन्ध यहाँ एक साथ संकलित हैं। साथ ही साथ कविता के प्रतिनिधि कवियों ब्रेख़्त और विशेषत: पाब्लो नेरुदा पर केन्द्रित अनेक निबन्ध यहाँ मौजूद हैं। पुस्तक का केन्द्र प्रगतिशील और नई कविता है। ‘ज्ञानोदय’ में ‘नई कविता पर क्षण भर’ शृंखला तथा उस समय के अन्य निबन्धों में हमें सहज ही ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसी प्रबन्धात्मक और संवादी पुस्तक के आलोचनात्मक मानस का विकास दिखाई देता है। बाद में विकसित हुई अनेक अवधारणाएँ यहाँ बीज रूप में मौजूद हैं।
नागार्जुन-शमशेर पर लिखे गए निबन्धों से गुज़रते हुए हम सहज ही लक्षित कर सकते हैं कि ये निबन्ध ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक की काव्य-दृष्टि का विस्तार और स्पष्टीकरण एक साथ है। एक हद तक उसमें छूट गए महत्त्वपूर्ण रचना-संसार को फ़ोकस में लाने का एक गम्भीर प्रयास भी। एक तरह का प्रत्याख्यान। एक आलोचना प्रयास के केन्द्र में यदि मुक्तिबोध हैं तो दूसरे के केन्द्र में हैं नागार्जुन और त्रिलोचन। कहना न होगा कि इन शीर्ष कवियों के माध्यम से प्रगतिशील काव्यधारा का खंडित रहा परिदृश्य इस तरह नामवर के आलोचना संसार में रचनात्मक पूर्णता के साथ उपस्थित हो पाया है।
Balmukund Gupt Ke Shresh Nibandh
- Author Name:
Satyaprakash Mishra
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Hindi Sahitya Ka Doosara Itihas
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

-
Description:
‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ हिन्दी के मूर्द्धन्य आलोचक, चिन्तक डॉ. बच्चन सिंह की महत्त्वपूर्ण पुस्तक है।
उन्होंने भूमिका में लिखा है : ‘‘न तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को लेकर दूसरा नया इतिहास लिखा जा सकता है और न उसे छोड़कर। नए इतिहास के लिए शुक्ल जी का इतिहास एक चुनौती है...।’’ किन्तु उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारते हुए आगे लिखा : ‘‘रचनात्मक साहित्य पुराने पैटर्न को तोड़कर नया बनता है, तो साहित्य के इतिहास पर वह क्यों न लागू हो?’’ ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ साहित्येतिहास के लेखन के परिप्रेक्ष्य में यही नया पैटर्न ईजाद करने का साहसिक प्रयास है।
लेखक ने पुस्तक के पहले संस्करण की भूमिका में इस नए पैटर्न की ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए लिखा : ‘‘शुक्ल जी के इतिहास का संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण सन् 1940 में छपा था। उसके प्रकाशन के बाद 50 वर्ष से अधिक का समय निकल गया। इस अवधि में अनेकानेक शोध-ग्रन्थ छपे, नई पांडुलिपियाँ उपलब्ध हुईं, ढेर-सा साहित्य लिखा गया। नया इतिहास लिखने के लिए यह सामग्री कम पर्याप्त और कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। यह भी ध्यातव्य है कि शुक्ल जी का इतिहास औपनिवेशिक भारत में लिखा गया। अब देश स्वतंत्र है। उसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र की अपनी समस्याएँ हैं। सांस्कृतिक-सामाजिक संघर्ष हैं, इन्हें देखने-समझने का बदला हुआ नज़रिया है। इस नए सन्दर्भ में यदि पिष्टपेषण नहीं करना है, तो नया इतिहास ही लिखा जाएगा।’’
यह 'दूसरा इतिहास’ इसी अर्थ में कुछ दूसरे ढंग से लिखा हुआ इतिहास है।
यह ग्रन्थ इतिहास की धारावाहिक निरन्तरता के साथ ही हिन्दी के प्रमुख साहित्यकारों और साहित्यिक कृतियों का मौलिक दृष्टि से मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही डॉ. बच्चन सिंह ने अपने निजी दृष्टिकोण तथा साहित्यिक समझ के आधार पर इसमें बहुत कुछ नया जोड़ा है जो इस कृति को सच्चे अर्थों में हिन्दी साहित्य का विशिष्ट इतिहास प्रमाणित करता है।
Jhuth Sach
- Author Name:
Siyaramsharan Gupt
- Book Type:

-
Description:
सब झूठ, झूठ नहीं होते; सब सच, सच नहीं होते; इसी तरह सब निषेध भी निषेध नहीं होते। कुछ निषेध ऐसे भी होते हैं, जिनमें अनुज्ञा छिपी होती है।
-श्री सियारामशरण गुप्त
प्रस्तुत पुस्तक 'झूठ-सच' निबन्ध-संग्रह में चिन्तन का विशेष योग दिखायी देता है। वे लेखक की वैयक्तिकता से बंधे हुए हैं। किसी निबन्ध में बाल्यकाल की मधुर स्मृतियाँ हैं तो किसी में स्नेहियों के संस्मरण । कभी वे हिमालय की भावात्मक झलक प्रस्तुत करने में संलग्न दिखायी पड़ते हैं तो कभी कवि-चर्चा में निमग्न हो जाते हैं। कभी वे जीवन के विभिन्न स्तरों का विनोदपूर्ण उद्घाटन करते हैं तो कभी अपूर्ण की अपूर्णता का आस्वाद कराते हैं। खुले व्यक्तित्व की संहति, लेखक-पाठक के तादात्म्य, व्यंग्य-विनोद के सन्निवेश आदि के कारण उनके निबन्ध हिन्दी साहित्य के निर्बन्ध निबन्धों की परम्परा में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में परिणित होते हैं।
पुस्तक निश्चय ही पठनीय एवं संग्रहणीय है।
Aankhan Dekhi Bihar Andolan
- Author Name:
Bajrang Singh
- Book Type:

- Description: "आँखन देखी : बिहार आंदोलन एक आंदोलन दूसरे आंदोलन की याद दिलाता है। हाल के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण 1974 के बिहार (जेपी) आंदोलन की खूब चर्चा हुई है। 1974 के दशक में या उसके बाद की जनमी नई पीढ़ी 1974 के आंदोलन के बारे में जानना-समझना चाहती है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त सामग्री की कमी है। हाल में दिल्ली के नृशंस गैंप रेप के विरोध में दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में स्वतःस्फूर्त जन विस्फोट हुआ। बिहार आंदोलन के बाद पहली बार सामाजिक सरोकार के सवाल पर देश के छात्र-छात्राओं की इतनी बड़ी शक्ति दिल्ली के राजपथ (जिन पर आंदोलनात्मक गतिविधियाँ प्रतिबंधित रही हैं) पर अपनी आवाज बुलंद कर रही थी। क्या भारत की यह युवा शक्ति इस पुरुष-प्रधान समाज एवं पूँजीवादी व्यवस्था की गैर-बराबरी, अन्याय एवं अत्याचार को खत्म करने तथा समतामूलक लोकतांत्रिक समाज की स्थापना करने की दिशा में पहल कर पाएगी? प्रस्तुत पुस्तक बिहार आंदोलन की व्यापकता और उसमें बुनियादी परिवर्तन और क्रांति के बीज होने की क्षमता का आँखों देखा प्रामाणिक विवरण पेश करती है। एक पत्रिका में छपे लेखों, रपटों और दस्तावेजों के माध्यम से किसी आंदोलन पर ऐसी पुस्तक शायद ही हिंदी में कोई दूसरी हो। बिहार की संघर्षशीलता, जुझारूपन और आंदोलन-शक्ति को समझने में सहायक एक उपयोगी पुस्तक।
Hindi Vyakaran Mimansa
- Author Name:
Kashiram Sharma
- Book Type:

- Description: व्याकरण छह वेदांगों में से एक है। वह वेद का मुख है। अत: भारत में उसके अध्ययन की प्राचीनता उतनी ही है जितनी वेदों की। आज से कम से कम अढ़ाई हज़ार वर्ष पूर्व तो पाणिनि ने उसे पूर्णता तक पहुँचा दिया था। व्याकरण में वर्णों के उच्चारण, शब्दों की रचना और रूप रचना तथा वाक्यों की रूप-रचना पर विचार होता है। वह भाषा का उच्चारण और रूप रचनामूलक अध्ययन करता है। दूसरे शब्दों में, वह शब्द-प्रधान है, अर्थ-प्रधान नहीं। इसीलिए उसे शब्दानुशासन या शब्दशास्त्र भी कहते हैं। पश्चिम के ग्रामर अर्थ-प्रधान होते हैं। वे वर्णों के केवल लिपिगत रूप पर विचार करते हैं। शब्दों का वर्गीकरण उनके अर्थ के आधार पर करते हैं : अमुक बोधक, तमुक वाचक आदि। वाक्य में रूप-रचना का भी ध्यान रखते हैं पर प्रधानता विश्लेषण की ही होती है जो प्रकार्य (अर्थ) प्रधान होती है—क्रिया, उसका कर्ता, कर्म, पूरक आदि। सार यह कि ग्रामर अर्थ-प्रधान होते हैं, व्याकरण शब्द-प्रधान। हिन्दी आदि सीखने के लिए विदेशियों ने ग्रामर बनाए, दुर्भाग्य से उन्हें ही व्याकरण कहा जाने लगा। बाद में ब्लूमफील्ड आदि ने भाषा के अध्ययन की व्याकरणिक शैली अपनाई पर उसे ग्रामर नहीं कहा, संरचनात्मक भाषिकी आदि कहा। उनकी भाषिकी व्याकरण है। इसीलिए उन्होंने ग्रामर नहीं कहा प्रस्तुत रचना में डॉ. दीमशिन्स, कामता प्रसाद गुरु और किशोरीदास वाजपेयी के व्याकरणों की समीक्षा के व्यपदेश से व्याकरण का विषय क्षेत्र तो स्पष्ट किया ही गया है, सच्चे हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा भी दी गई है; ऐसे व्याकरण बनेंगे तो भाषा अध्ययन की सही दिशा मिलेगी। जो ग्रामरी शैली को ठीक समझें, वे ग्रामर पढ़ें और लिखें भी, पर उन्हें व्याकरण न कहें? व्याकरण की वही परिभाषा रहने दें जो चार-पाँच हज़ार वर्ष से रही है।
Hindi Urdu Aur Hindustani
- Author Name:
Padamsingh Sharma
- Book Type:

-
Description:
प्रस्तुत पुस्तक 'हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी' भाषा समस्या पर लेखक के विचारों का संकलन है। हिन्दी उर्दू या हिन्दुस्तानी के नामभेद और स्वरूपभेद के कारणों पर विचार हो चुका। इनकी एकता और उसके साधनों का निर्देश भी किया जा चुका। जिन कारणों से भाषा में भेद बढ़ा, उनका दिग्दर्शन भी, संक्षेप और विस्तार के साथ हो गया। हिन्दी और उर्दू के सम्बन्ध में दोनों पक्ष के बड़े-बड़े विद्वानों की सम्मतियाँ सुन चुके। इन सब बातों का निष्कर्ष यही निकला कि प्रारम्भ में हिन्दी-उर्दू दोनों एक ही थीं, बाद को जब व्याकरण, पिंगल, लिपि और शैली भेद आदि के कारण दो भिन्न दिशाओं में पड़कर यह एक-दूसरे से बिलकुल पृथक् होने लगीं, तो सर्वसाधारण के सुभीते और शिक्षा के विचार से इनका विरोध मिटाकर इन्हें एक करने के लिए भाषा की इन दोनों शाखाओं का संयुक्त नाम ‘हिन्दुस्तानी' रखा गया।
हिन्दी-उर्दू का भंडार दोनों जातियों के परिश्रम का फल है। अपनी-अपनी जगह भाषा की इन दोनों शाखाओं का विशेष महत्त्व है। दोनों ही ने अपने-अपने तौर पर यथेष्ट उन्नति की है। दोनों ही के साहित्य भंडार में बहुमूल्य रत्न संचित हो गए हैं और हो रहे हैं। हिन्दी वाले उर्दू साहित्य से बहुत कुछ सीख सकते हैं। इसी तरह उर्दू वाले हिन्दी के ख़ज़ाने से फ़ायदा उठा सकते हैं। यदि दोनों पक्ष एक-दूसरे के निकट पहुँच जाएँ और भेद बुद्धि को छोड़कर भाई-भाई की तरह आपस में मिल जाएँ तो वह ग़लतफ़हमियाँ अपने आप ही दूर हो जाएँ, जो एक से दूसरे को दूर किए हुए हैं। ऐसा होना कोई मुश्किल बात नहीं है। सिर्फ़ मज़बूत इरादे और हिम्मत की ज़रूरत है, पक्षपात और हठधर्मी को छोड़ने की आवश्यकता है। बिना एकता के भाषा और जाति का कल्याण नहीं।
Soordas 'Harbans Lal Sharma'
- Author Name:
Harbans Lal Sharma
- Book Type:

-
Description:
यदि युग-सापेक्ष दृष्टि से तात्कालिक समाज को केन्द्र-बिन्दु बनाकर सूर-साहित्य का आकलन किया जाए तो स्पष्ट लक्षित होगा कि सूर ने बाह्य प्रपंच से मुक्त होकर अन्तर्लीन दशा में काव्य-सृष्टि की थी, किन्तु इसका यह अर्थ न समझ लिया जाए कि युग की सापेक्षता से सूर और उनका साहित्य सर्वथा बचा रहा। सूर ने भक्ति को माधुर्य-मंडित करके प्रस्तुत करने का ध्येय बनाया हुआ था। यही उस युग की सबसे बड़ी माँग थी।
चैतन्य के शिष्य रूप और सनातन गोस्वामी ने शास्त्रीय मर्यादा में देववाणी द्वारा भक्ति का माधुर्य पक्ष स्थिर किया था; किन्तु जनमानस से उसका सीधा लगाव न उस युग में हुआ और न बाद में ही वह सम्भव हो सका।
हिन्दी के आधिकारिक विद्वानों और आचार्यों ने समय-समय पर सूरदास के साहित्य और उनके साहित्येतर पहलुओं पर जो चिन्तन-मनन किया है, उसका एक प्रतिनिधि संकलन यहाँ पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है। सूर-साहित्य के जिज्ञासुओं, पाठकों और हिन्दी साहित्य के सभी छात्रों के लिए विचार-कोश की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली पुस्तक।
Agyeya : Kuchh Rang, Kuchh Raag
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

-
Description:
श्रीलाल जी द्वारा की गई रचना की मीमांसा आलोचना के पूर्वाग्रहों से मुक्त रहती है। वह किसी ढर्रे की आलोचना नहीं होती है, न किसी स्थापना की आलोचना होती है। वह रचना को समझने की कोशिश होती है।
इस पुस्तक में श्रीलाल जी ने कहानीकार अज्ञेय के बारे में बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही है कि ‘वे लोक-जीवन के कथाकार हैं। वे पहले कथाकार हैं जिन्होंने इतिवृत्तात्मकता के बोझ को हलका किया है।’
पुस्तक का दूसरा अध्याय ‘आधुनिक हिन्दी उपन्यास और अज्ञेय’ है। श्रीलाल जी ने हिन्दी उपन्यास की विकास-गाथा कही, जिसमें उन्होंने किस प्रकार चालीस वर्षों में हिन्दी उपन्यास ने प्रौढ़ता प्राप्त की और किस प्रकार ‘शेखर : एक जीवनी’ के प्रकाशन से हिन्दी उपन्यास अपनी अनेक पुरानी सीमाओं को पीछे छोड़ देता है—इसका महत्त्वपूर्ण विवेचन किया है। उसी प्रसंग में उन्होंने हिन्दी के कुछ प्रसिद्ध उपन्यासों को लिया है।
पुस्तक का अन्तिम अध्याय ‘आधुनिक हिन्दी व्यंग्य : अज्ञेय के सन्दर्भ के साथ’ समकालीन हिन्दी के व्यंग्य-लेखन का सजग सर्वेक्षण है। एक तरह से व्यंग्य विधा का आन्तरिक विश्लेषण है। अज्ञेय के व्यंग्य-लेखन की विशिष्टता पर उनकी एक वाक्य की टिप्पणी बड़ी सूक्ष्म है—‘रमणीय गम्भीरता के हलके चापल्य की कौंध।’ हिन्दी व्यंग्य लेखकों की चर्चा के प्रसंग में श्रीलाल जी ने यूरोपीय व्यंग्य की सूक्ष्म विवेचना भी दी है। श्रीलाल जी का निष्कर्ष यह है कि ‘एक शताब्दी की यात्रा कर चुकने के बाद हिन्दी व्यंग्य ने अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली है। वह साहित्य की प्रमुख धारा से दूर नहीं है।’
इस छोटी-सी पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे लगा कि मैं अपनी तमाम पढ़ी हुई पुस्तकों को फिर से पढ़ रहा हूँ। ऐसी पुस्तकें कम लिखी जाती हैं। समग्र दृष्टि से मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि श्रीलाल जी ने आकार में छोटी पर अपने पाठकीय आयाम में व्यापक और विस्तृत तथा उन्मुक्त समीक्षा के द्वारा बिना किसी प्रयत्न के आधुनिक साहित्य को देखने की दृष्टि दी है।
—विद्यानिवास मिश्र
Kavi Ajneya
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

-
Description:
अज्ञेय का नाम हिन्दी कविता में एक विवादास्पद नाम रहा है। ख़ास तौर से प्रगतिशीलों और जनवादियों ने न केवल उन्हें व्यक्तिवादी कहा, बल्कि उनके विरुद्ध घृणा तक का प्रचार किया और इस तरह एक बड़े पाठक-समूह को इस महान शब्द-शिल्पी से दूर रखने की कोशिश की। सबसे बड़ा अन्याय उनकी कविता के साथ यह किया गया कि उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़े बग़ैर उनके सम्बन्ध में ग़लत धारणा बनाई गई और उसे उनका अन्तिम मूल्यांकन करार दिया गया। हिन्दी के प्रगतिशील कवियों में सबसे बड़े काव्य-मर्मज्ञ शमशेर थे। उन्हें अपना माननेवाले लोगों ने यह भी नहीं देखा कि अज्ञेय के प्रति वे कैसी उच्च धारणा रखते हैं।
आज जब देश और विश्व का परिदृश्य बदल गया है और वैचारिक स्तर पर सभी बुद्धिजीवी पूँजीवाद और समाजवाद के बीच से एक नया रास्ता निकलने के लिए बेचैन हैं, अज्ञेय नए सिरे से पठनीय हो उठे हैं। अब जब हम उनकी कविता पढ़ते हैं, तो यह देखकर विस्मित होते हैं कि बिना व्यक्तित्व का निषेध किए उन्होंने हमेशा समाज को ही अपना लक्ष्य बनाया। इतना ही नहीं, अत्यन्त सुरुचि-सम्पन्न और शालीन इस कवि की कविता का नायक भी ‘नर’ ही है, जिसकी आँखों में नारायण की व्यथा भरी है। उस नर को उन्होंने कभी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने दिया और उसकी चिन्ता में हमेशा लीन रहे। निराला और मुक्तिबोध के साथ वे हिन्दी के तीसरे कवि थे, जो एक साथ महान बौद्धिक और महान भावात्मक थे।
उनके काव्य में आधुनिकता-बोध, प्रेमानुभूति, प्रकृति-प्रेम और रहस्य-चेतना—ये सभी एक नए आलोक से जगमग कर रहे हैं। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नवल की यह पुस्तक आपको आपकी सीमाओं से मुक्त करेगी और आपकी आँखों के सामने एक नए काव्य-लोक का पटोन्मीलन। आप इसे अवश्य पढ़ें।
Meri Dharti Mere Log
- Author Name:
Sheshendra Sharma
- Book Type:

-
Description:
कवि तीखा होता हुआ मनहर है—वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि। कितनी सरल, कितनी कोमल जनान्तिक, फिर भी अभिजात, कितनी आम-अवाम को पुकारती उसकी आवाज़ है। शब्दों का औदार्य, रचना की सुघराई, गिरा की गरिमा, भावों की तीखी सादगी सिद्ध करती है कि—सिम्पल इज़ द कल्मिनेशन ऑफ़ द कॉम्प्लेक्स।
—डॉ. भगवतशरण उपाध्याय
यह कृति सिखाती है कि किस तरह कवि संवेदना में जनवादी और क्रान्तिकारी हो सकता है। यह काव्य स्वाद और आग एक साथ देता है। इस आग से रूपान्तरित व्यक्तित्व आदमी नहीं रहता, वह क्रान्ति का अस्त्र बन जाता है, जिसे इतिहास इस्तेमाल करता है।
—डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
शेषेन्द्र के काव्य में भारतीय आत्मा की लाक्षणिक अभिव्यक्ति है। इसकी बनावट बौद्धिक नहीं, हार्दिक और आत्मिक है। यह केवल मस्तिष्क को उत्तेजित करके नहीं छोड़ देता बल्कि एक गहितर वेदना और संवेदना से हमें भीतर ही भीतर गला देता है।
—वीरेन्द्र कुमार जैन
शेषेन्द्र तेलगू-काव्य के ही नहीं, बल्कि विश्व-काव्य के आशा-सूर्य हैं। कविता-रहस्य जितना वह जानते हैं, उतना अन्य आधुनिक कवि कम जानते हैं। श्रमिक-जीवन की भूमिका पर आधारित ‘मेरी धरती : मेरे लोग’ बीसवीं शती की जिह्वा और आगामी पीढ़ियों की हृदय-ध्वनि है। शेषेन्द्र वह कवि हैं जिसे राजेश्वर ने अपनी ‘काव्य-मीमांसा’ में इस तरह वर्णित किया है—वायं पताकामिव यस्य दृष्ट्वा जनः कवीनाम अनुपृष्ठ मेति।
—डॉ. सरगूकृष्ण मूर्ति
Hindi Sahitya Aur Samvedana Ka Vikas
- Author Name:
Ramswaroop Chaturvedi
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने की क्या-क्या समस्याएँ हैं, इसे लेकर एकाधिक पुस्तकें लिखी जा सकती हैं, किसी रूप में लिखी भी गई हैं। कुछ लेखक-समूहों, मुख्यत: शोधकर्ताओं द्वारा इतिहास की सामग्री के संकलन प्रस्तुत हुए हैं, जो अपने आपमें उपयोगी हैं। पर नहीं लिखा गया तो इतिहास, रामचन्द्र शुक्ल और छायावाद के बाद। ऐसे चुनौती-भरे वातावरण में साहित्य और संवेदना के विकास को साथ-साथ व्याख्यायित करते चलना कितना कठिन है, यह सहज अनुमान किया जा सकता है।
किसी भी साहित्य के इतिहास की अच्छाई को जाँचने की दो कसौटियाँ हो सकती हैं। एक तो यह कि वह कहाँ तक, साहित्य की ही तरह, विविध पाठक-वर्गों की अपेक्षाओं की एक साथ पूर्ति करता है। और दूसरे यह कि वह साहित्य को उप-साहित्य से अलग करके चलता है या नहीं, विशेष रूप से एक ऐसे युग में जबकि संचार-माध्यम साहित्य के विविध सीमान्तों से टकरा रहे हैं। दूसरे शब्दों में कि वह इतिहास असल में कितनी दूर तक साहित्य का इतिहास है, इन कसौटियों पर परखकर प्रस्तुत अध्ययन की जाँच स्पष्ट ही आप स्वयं करेंगे। अपनी ओर से हम इतना अवश्य कहना चाहेंगे कि समूची साहित्य-प्रक्रिया की जैसी संवेदनशील समझ विकसित करने का यत्न यहाँ हुआ है वैसी ही विश्वसनीय तथ्य-सामग्री भी जुटाई गई है, जो अपने आपमें एक विरल संयोग है।
अब प्रस्तुत है ‘विकास’ का नया संवर्द्धित संस्करण। गत एक दशक में हुए विविध संस्करण जहाँ इस इतिहास की पाठक समाज में व्यापक स्वीकृति का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, वहीं यह इस प्रयत्न का परिचायक है कि पुस्तक के कलेवर को बिना अनावश्यक रूप से स्फीत किए इस दशक की नई रचना-उपलब्धियों को कैसे समाविष्ट किया जा सकता है। यों ‘विकास’ अपने नामकरण को स्वत: प्रमाणित कर सके, यह इस नए संवर्द्धित संस्करण की, नई मुद्रण-शैली के साथ, प्रमुख विशेषता होनी चाहिए।
Reetikaleen Kaviyon Ki Prem-Vyanjana
- Author Name:
Bachchan Singh
- Book Type:

-
Description:
साहित्य का कोई काल-खंड अपने आप में स्वतन्त्र इकाई नहीं होता, उसका एक परिवर्तनमान नैरन्तर्य होता है, परम्परा होती है। रीतिकाल की मुख्यधारा पर, विशेषतः जिसे रीतिबद्ध कहा जाता है, आचार्य शुक्ल ने तीखी टिप्पणियाँ जड़ी हैं। शुक्लजी की देखा-देखी उनके आलोचकों ने उसे प्रतिक्रियावादी साहित्य की संज्ञा से अभिहित किया। कुछ अन्य लोगों ने उसकी प्रतिरक्षा में दलीलें खड़ी कीं। इसका फल यह हुआ कि रीतिकाव्य- रीतिमुक्त काव्य का चित्र धुंधलके से ढंक गया। यदि इसे संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश तथा देशभाषा-काव्य (भक्तिकाव्य) की परम्परा में देखा गया होता, आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से परखा गया होता, सामन्ती परिवेश के अन्तर्विरोध के परिप्रेक्ष्य में, लक्षित किया गया होता तो इस काल के क्लासिक का मूल्यांकन अधिक प्रामाणिक प्रतीत होता। कहना न होगा कि इस काल को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की गयी है।
बदले हुए सामन्ती परिवेश में कविता का लक्ष्य ही बदल गया था। एक समय था, जब कहा गया–‘कीन्हे प्राकृतजन गुनगाना सिर धुन गिरा लागि पछताना।’ ‘सन्तन को कहाँ सीकरी सों काम आवत-जात पनहियाँ टूटीं बिसरि गयो हरिनाम।’ एक समय आया, जब कहा जाने लगा–‘हुकुम पाइ जयसाहि कै...।’ ‘ठाकुर सो कवि भावत मोंहि जो राजसभा में बड़प्पन पावै / पंडित और प्रवीनन को जोइ चित्त हरै सो कवित्त बनावै।’ इस चित्तवृत्ति का प्रभाव कविता पर पड़ना ही पड़ना था। लेकिन इन कविताओं में प्रेम का उदात्त और अनुदात्त, दोनों प्रकार का चित्रण है। इसकी परम्परा सूर के काव्य में ही मिल जाती है। प्रेम के प्रति जैसी बेचैनी घनानन्द, ठाकुर, बोधा में मिलती है, वैसी बेचैनी, मीरा को छोड़, समस्त भक्ति-काव्य में नहीं मिलेगी। सामाजिक नैतिकता, छद्म, अस्पृश्यता, आदि पर भी इसमें पहली बार प्रकाश डाला गया है।
बिम्बों, प्रतीकों, अलंकारों, विशेषणों, शब्दार्थ के बदलावों के सन्दर्भ में भी प्रेम के विरोधात्मक आयामों को विवेचित किया गया है। वेश-भूषा भी प्रेम की भाषा है। इस पर अलग से विचार किया गया है। लोक में प्रचलित तीज- त्योहार, ऋतु-उत्सव, आदि जितने मनोयोगपूर्वक इस काल की कविताओं में वर्णित हैं, अन्यत्र नहीं मिलेंगे। आधुनिक काव्य में लोकोत्सव-चित्रण की निरन्तर कमी होती जा रही है। रीतिकालीन काव्य से बहुत कुछ छोड़ा जा सकता है तो बहुत कुछ सीखा भी जा सकता है।
Rag Darbari Aalochana Ki Phans
- Author Name:
Rekha Awasthi
- Book Type:

-
Description:
‘राग दरबारी’ पर यह पहली आलोचना पुस्तक है। ‘राग दरबारी’ को लेकर हिन्दी समालोचना के क्षेत्र में जो तर्क-वितर्क और विवेचनात्मक वाग्युद्ध हुए हैं, उन्हें ऐतिहासिक क्रम से इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। श्रीलाल शुक्ल पर लिखे गए शोध ग्रन्थों में भी यह सामग्री उपलब्ध नहीं होती है। अत: इस पुस्तक में राग दरबारी से सम्बन्धित तमाम बहसों की जाँच-पड़ताल की गई है।
‘राग दरबारी’ के प्रकाशन के तुरन्त बाद नेमिचन्द्र जैन और श्रीपत राय ने जो समीक्षाएँ लिखी थीं, उनसे कृति को लेकर भयंकर विवाद छिड़ गया था। इस पुस्तक में उस दौर की समीक्षाओं के अतिरिक्त अब तक के अनेक आलोचकों और सृजनकर्मियों के उन आलेखों और टिप्पणियों का संचयन-संकलन भी किया गया है जो अभी तक किसी पुस्तक में संगृहीत नहीं हैं। कथा समालोचना के मौजूदा स्वरूप का वस्तुपरक आकलन करने की दृष्टि से यह पुस्तक सार्थक और महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करती है।
इस संचयन-संकलन के चार खंड हैं। पहला खंड समालोचना पर केन्द्रित है। दूसरा खंड लोकप्रियता और व्याप्ति से सम्बन्धित है जिसके अन्तर्गत रंगकर्मी, फ़िल्म निर्देशक और अनुवादक के संस्मरण समेत पाठकों की प्रतिक्रियाओं का दिग्दर्शन करानेवाले लेख भी सम्मिलित हैं। तीसरा खंड बकलमख़ुद श्रीलाल शुक्ल के ख़ुद के वक्तव्यों को समेटता है और चौथा खंड शख़्सियत उनके व्यक्तित्व से सम्बन्धित टिप्पणियों और संस्मरणों को प्रस्तुत करता है। इतनी भरी-पूरी सामग्री के संचयन के कारण यह पुस्तक ‘राग दरबारी’ का आलोचनात्मक दर्पण बन गई है।
Bharat Mein Nag Parivar Ki Bhashain
- Author Name:
Rajendra Prasad Singh
- Book Type:

-
Description:
भारत में दुनिया के चार सबसे प्रमुख भाषा-परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं। सामान्यतया उत्तर भारत में बोली जानेवाली भारोपीय परिवार की भाषाओं को आर्यभाषा समूह, दक्षिण की भाषाओं को द्रविड़भाषा समूह, आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार की भाषाओं को मुंडारी भाषा समूह तथा पूर्वोत्तर में रहनेवाली तिब्बती-बर्मी नृजातीय समूह की भाषाओं को नाग-भाषा समूह के रूप में जाना
जाता है।
पूर्वोत्तर की मंगोलायड प्रजाति के नृजातीय समूह (जनजातियों) को प्राचीन साहित्य में नाग अथवा किरात के रूप में वर्णित किया गया है। भाषा और नस्ल—दोनों ही दृष्टियों से इनका गहरा सम्बन्ध चीनी-तिब्बती भाषा-परिवार से है, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से यह समूह भारत का अभिन्न अंग है और भारतीयजन के रूप में इनकी पहचान सुस्थापित है। इनकी संख्या भले ही कम हो, मगर सांस्कृतिक वैभव और भाषिक विविधता अनमोल है। डॉ. ग्रियर्सन ने भाषा-सर्वेक्षण के दौरान कुल 179 भाषाओं को चिह्नित किया था, जिनमें से 113 भाषाएँ केवल इस समूह द्वारा बोली जाती हैं। इस दृष्टि से इनकी भाषाओं का अध्ययन जितना रोचक है, उतना ही ज़रूरी भी। परन्तु दुर्भाग्य से भाषाविज्ञान सम्बन्धी अध्ययन केवल भारत में आर्य और द्रविड़ भाषाओं तक ही सीमित रहा है।
जाने-माने भाषा वैज्ञानिक राजेन्द्रप्रसाद सिंह ने अपनी पहली पुस्तक ‘भाषा का समाजशास्त्र’ में अन्य भाषाओं के साथ-साथ आस्ट्रो-एशियाटिक समूह की एक भारतीय भाषा—मुंडारी—को भी अपने विश्लेषण का आधार बनाया था। अब इस पुस्तक में उन्होंने नाग-परिवार की भाषाओं की विस्तृत विवेचना की है और इसके माध्यम से पूर्वोत्तर की संस्कृति पर भी प्रकाश डाला है। भाषाविज्ञान के अध्येता इस क्षेत्र में डॉ. रामविलास शर्मा के कार्य को आगे बढ़ाने के इस सार्थक प्रयत्न को निश्चित रूप से रेखांकित करेंगे।
Etihasik Bhashavigyan Aur Hindi Bhasha
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
रामविलास जी ने भाषा की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया को समझने के लिए प्रचलित मान्यताओं को अस्वीकार किया और अपनी एक अलग पद्धति विकसित की।
वे मानते थे कि कोई भी भाषापरिवार एकान्त में विकसित नहीं होता, इसलिए उसका अध्ययन अन्य भाषापरिवारों के उद्भव और विकास से अलग नहीं होना चाहिए। वे चाहते थे कि प्राचीन लिखित भाषाओं की सामग्री का उपयोग करते समय जहाँ भी समकालीन उपभाषाओं, बोलियों आदि की सामग्री प्राप्त हो, उस पर भी ध्यान दिया जाए, इसी तरह आधुनिक भाषाओं पर काम करते हुए उनकी बोलियों के भाषा-तत्त्वों को भी सतत ध्यान में रखा जाए। भाषा की विकास-प्रक्रिया के विषय में उनकी मान्यता थी कि भाषा निरन्तर परिवर्तनशील और विकासमान है। विरोध और भिन्नता के बिना भाषा न गतिशील हो सकती है, न वह आगे बढ़ सकती है। इसलिए किसी भी भाषा के किसी भी स्तर पर, विरोधी प्रवृत्तियों और विरोधी तत्त्वों के सहअस्तित्व की सम्भावना के लिए हमें तैयार रहना चाहिए।
इन तथा कुछ और बातों, जो रामविलास जी की भाषावैज्ञानिक समझ का अनिवार्य अंग थीं, को ध्यान में रखते हुए ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के क्षेत्र में अनुसन्धान नहीं किया गया, अगर ऐसा किया जाता तो निश्चय ही कुछ नए निष्कर्ष हासिल होते। रामविलास जी ने विरोध का जोखिम उठाकर भी यह किया, जिसके प्रमाण इस पुस्तक में भी मिल सकते हैं।
Anviti - Khand : 2
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

-
Description:
कुँवर नारायण हमारे समय के बड़े कवि हैं। यदि विश्व के कुछ चुनिन्दा कवियों की तालिका बनाई जाए तो उसमें निस्सन्देह उनका स्थान होगा। वे आधुनिक बोध और संवेदना के उन कवियों में हैं जिन्होंने सदैव कविता को मनुष्यता के आभरण के रूप में लिया है।
कुँवर नारायण का काव्य मानवीय गुणों का ही नहीं, मानवीय संस्कारों का काव्य है। कविता में उनका प्रवेश चक्रव्यूह से हुआ। अपने गठन में कलात्मक किन्तु दार्शनिक प्रतीतियों वाले इस संग्रह में जीवन की पेचीदगियों को कवि ने सलीक़े से उठाया है। ‘आत्मजयी’ की लगभग अधसदी के बाद ‘वाजश्रवा के बहाने’ की रचना बतौर कुँवर नारायण यह भी जताने के लिए है कि यदि ‘आत्मजयी’ में मृत्यु की ओर से जीवन को देखा गया है तो ‘वाजश्रवा के बहाने’ में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की एक कोशिश है। उनके इस कथन को हम इस रोशनी में देख सकते हैं कि सारा कुछ हमारे देखने के तरीक़े पर निर्भर है—कुछ ऐसे कि यह जीवन विवेक भी एक श्लोक की तरह सुगठित और अकाट्य हो।
उनके रचना-संसार पर समय-समय पर लिखा जाता रहा है। अनेक शोधार्थियों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य पर कार्य किया है। कहना न होगा कि कुँवर नारायण का कृतित्व बहुवस्तुस्पर्शी है। वर्ष 2002 से पहले तक उनके व्यक्तित्व एवं कृतियों पर लिखे महत्त्वपूर्ण लेख ‘उपस्थिति’ नामक संचयन में समाविष्ट हैं। उसके पश्चात् लिखे निबन्धों का यह संकलन दो खंडों में है : ‘अन्वय’ और ‘अन्विति’। ‘अन्विति’ उनकी कृतियों को केन्द्र में रखकर लिखे आलोचनात्मक निबन्धों का चयन है। इसमें हाल की कुछ प्रकाशित कृतियों को छोड़कर बाक़ी कृतियों पर लिखे लेखों को शामिल किया गया है जो उपस्थिति में सम्मिलित नहीं हैं। अधिकांश लेख 2015 तक के हैं जब कुँवर नारायण का प्रबन्ध-काव्य ‘कुमारजीव’ प्रकाशित हुआ।
आशा है, पाठकों को ये दोनों खंड उपयोगी और प्रासंगिक लगेंगे तथा कुँवर नारायण के साहित्य के प्रति रुचि विकसित करेंगे।
Sarjana Path Ke Sahyatri
- Author Name:
Nirmal Verma
- Book Type:

-
Description:
निर्मल वर्मा ने जिस तरह कथाभाषा पर अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ी, उसी तरह रचना-चिन्तन और हिन्दी व अन्य भाषाओं के रचनाकारों पर केन्द्रित अपने लेखन में भी विश्लेषण और विवेचन का एक अलग मुहावरा गढ़ा। उन्होंने समय-समय पर अपने प्रिय लेखकों-कलाकारों पर लिखा। इन लेखों में उन्होंने ‘आलोचना की लगी-बँधी खूँटी से अपने को छुड़ाकर’ आत्मीय प्रतिक्रियाओं के प्रवाह में स्वयं को बहने दिया है। इसी आत्मीयता के चलते ये निबन्ध रचनात्मकता का एक अत्यन्त सकारात्मक और प्रेरक वातावरण रचते हैं।
भाषा के नैतिक और आध्यात्मिक आयामों को विकसित करती उनकी ये पारदर्शी गद्य रचनाएँ मूर्धन्य व्यक्तियों के आलोक और अँधेरे को जिस सजीवता के साथ प्रकट करती हैं वह दुर्लभ साधना और अनिवार्य जिज्ञासा से ही अर्जित की जा सकती है।
इस पुस्तक में देश के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों—प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, रेणु, मुक्तिबोध, भीष्म साहनी, धर्मवीर भारती, मलयज और चित्रकारों-कलाकारों—हुसेन, रामकुमार, स्वामीनाथन पर तो आलेख हैं ही, बोर्ख़ेज़, नायपॉल, नाबोकोव, राब्ब ग्रिये और लैक्सनेस पर भी बेहद संजीदगी और तरल संवेदना से लैस रचनाएँ संकलित हैं।
Acharya Mahaveerprasad Dwivedi Ke Shreshth Nibandh
- Author Name:
Acharya Mahaveerprasad Dwivedi
- Book Type:

-
Description:
आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं के बनाए हुए है। यदि पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती, समुन्नति की इस सीमा तक आने का अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का भी काम किया। हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है जो हिन्दी-साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के उन्नायक बने, हिन्दी-साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया; दर्जनों कवि, लेखक और सम्पादक बनाए। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है।
—प्रेमचन्द
अंग्रेज़ी भाषा में जो स्थान डॉ. जॉनसन का है वर्तमान में वही स्थान द्विवेदी जी का है। जिस प्रकार अंग्रेज़ी भाषा का वर्तमान स्वरूप बहुत दूर तक डॉ. जॉनसन का दिया हुआ है, उसी प्रकार हिन्दी का वर्तमान स्वरूप द्विवेदी जी का।
—सेठ गोविन्द दास
द्विवेदी जी ने समाजशास्त्र और इतिहास के बारे में जो कुछ लिखा है, उससे समाज-विज्ञान और इतिहास लेखन के विज्ञान की नवीन रूप-रेखाएँ निश्चित होती हैं। इसी दृष्टिकोण से उन्होंने भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का नवीन मूल्यांकन किया। एक ओर उन्होंने इस देश के प्राचीन दर्शन, विज्ञान, साहित्य तथा संस्कृति के अन्य अंगों पर हमें गर्व करना सिखाया, एशिया के सांस्कृतिक मानचित्र में भारत के गौरवपूर्ण स्थान पर ध्यान केन्द्रित किया, दूसरी ओर उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक रूढ़ियों का तीव्र खंडन किया और उस विवेक परम्परा का उल्लेख सहानुभूतिपूर्वक किया जिसका सम्बन्ध चार्वाक और बृहस्पति से जोड़ा जाता है। अध्यात्मवादी मान्यताओं, धर्मशास्त्र की स्थापनाओं को उन्होंने नई विवेक दृष्टि से परखना सिखाया।
—रामविलास शर्मा
उल्लेखनीय है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी की 'सरस्वती' ज्ञान की पत्रिका कही गई है और उनका गद्य हिन्दी साहित्य का ज्ञानकांड। इस प्रकार, भारत का उन्नीसवीं शताब्दी का नवजागरण यूरोप के 'एनलाइटेनमेंट' अथवा 'ज्ञानोदय' की चेतना के अधिक निटक प्रतीत होता है और पन्द्रहवीं शताब्दी का नवजागरण 'रेनेसां' के तुल्य।
—नामवर सिंह
Bharat Ki Bhasha Samasya
- Author Name:
Ramvilas Sharma
- Book Type:

-
Description:
style="text-align: left;">भारत की भाषा-समस्या एक ज्वलन्त राष्ट्रीय समस्या है। सुप्रसिद्धप्रगतिशील आलोचक और विचारक डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार यह ‘विशुद्ध भाषा-विज्ञान कीसमस्या’ नहीं बल्कि ‘बहुजातीय राष्ट्र के गठन और विकास की ऐतिहासिक-राजनीतिक समस्या’ है।
स्वाधीनता के तीन दशक बाद भी अगर यह समस्या ज्यों-की-त्यों बनी है तो सम्भवतः इसलिए कि उनकी तरह औरों ने भी इस समस्या को इसके वास्तविक और व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का प्रयास नहीं किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ में रामविलास जी ने भाषा-समस्या के विभिन्न पक्षों की विस्तार से चर्चा की है तथा इस बात पर बल दिया है कि सबसे पहले अंग्रेज़ी के प्रभुत्व को समाप्त करना आवश्यक है, क्योंकि वह भारत की सभी भाषाओं पर साम्राज्यवादियों द्वारा लादी हुई भाषा है। भारत की भाषा-समस्या के हल के लिए वह ‘अनिवार्य राष्ट्र-भाषा’ नहीं, बल्कि सम्पर्क भाषा की बात करते हैं जो हिन्दी ही हो सकती है। हिन्दी के जातीय स्वरूप की चर्चा के सन्दर्भ में वह यह स्पष्ट करते हैं कि हिन्दी और उर्दू में ‘बुनियादी एकता’ तथा हिन्दी की जनपदीय बोलियाँ परस्पर-सम्बद्ध हैं। भाषा-समस्या पर भारतीय जनता का सामाजिक और सांस्कृतिक भविष्य निर्भर करता है, इसलिए वह इसे आवश्यक मानते हैं कि ‘हम अपने बहुजातीय राष्ट्र की विशेषताएँ पहचानें, इस राष्ट्र में हिन्दी-भाषी जाति की भूमिका पहचानें।’
इस पुस्तक में दिए गए उनके अकाट्य तर्क समस्या को समझने की सही दृष्टि ही नहीं देते, समस्या-समाधान की दिशा में मन को आन्दोलित भी करते हैं।
Customer Reviews
0 out of 5
Book
Be the first to write a review...