Rag Darbari Aalochana Ki Phans
(0)
Author:
Rekha AwasthiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
600
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Available
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‘राग दरबारी’ पर यह पहली आलोचना पुस्तक है। ‘राग दरबारी’ को लेकर हिन्दी समालोचना के क्षेत्र में जो तर्क-वितर्क और विवेचनात्मक वाग्युद्ध हुए हैं, उन्हें ऐतिहासिक क्रम से इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। श्रीलाल शुक्ल पर लिखे गए शोध ग्रन्थों में भी यह सामग्री उपलब्ध नहीं होती है। अत: इस पुस्तक में राग दरबारी से सम्बन्धित तमाम बहसों की जाँच-पड़ताल की गई है।</p> <p>‘राग दरबारी’ के प्रकाशन के तुरन्त बाद नेमिचन्द्र जैन और श्रीपत राय ने जो समीक्षाएँ लिखी थीं, उनसे कृति को लेकर भयंकर विवाद छिड़ गया था। इस पुस्तक में उस दौर की समीक्षाओं के अतिरिक्त अब तक के अनेक आलोचकों और सृजनकर्मियों के उन आलेखों और टिप्पणियों का संचयन-संकलन भी किया गया है जो अभी तक किसी पुस्तक में संगृहीत नहीं हैं। कथा समालोचना के मौजूदा स्वरूप का वस्तुपरक आकलन करने की दृष्टि से यह पुस्तक सार्थक और महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करती है।</p> <p>इस संचयन-संकलन के चार खंड हैं। पहला खंड समालोचना पर केन्द्रित है। दूसरा खंड लोकप्रियता और व्याप्ति से सम्बन्धित है जिसके अन्तर्गत रंगकर्मी, फ़िल्म निर्देशक और अनुवादक के संस्मरण समेत पाठकों की प्रतिक्रियाओं का दिग्दर्शन करानेवाले लेख भी सम्मिलित हैं। तीसरा खंड बकलमख़ुद श्रीलाल शुक्ल के ख़ुद के वक्तव्यों को समेटता है और चौथा खंड शख़्सियत उनके व्यक्तित्व से सम्बन्धित टिप्पणियों और संस्मरणों को प्रस्तुत करता है। इतनी भरी-पूरी सामग्री के संचयन के कारण यह पुस्तक ‘राग दरबारी’ का आलोचनात्मक दर्पण बन गई है।
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‘राग दरबारी’ पर यह पहली आलोचना पुस्तक है। ‘राग दरबारी’ को लेकर हिन्दी समालोचना के क्षेत्र में जो तर्क-वितर्क और विवेचनात्मक वाग्युद्ध हुए हैं, उन्हें ऐतिहासिक क्रम से इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। श्रीलाल शुक्ल पर लिखे गए शोध ग्रन्थों में भी यह सामग्री उपलब्ध नहीं होती है। अत: इस पुस्तक में राग दरबारी से सम्बन्धित तमाम बहसों की जाँच-पड़ताल की गई है।</p>
<p>‘राग दरबारी’ के प्रकाशन के तुरन्त बाद नेमिचन्द्र जैन और श्रीपत राय ने जो समीक्षाएँ लिखी थीं, उनसे कृति को लेकर भयंकर विवाद छिड़ गया था। इस पुस्तक में उस दौर की समीक्षाओं के अतिरिक्त अब तक के अनेक आलोचकों और सृजनकर्मियों के उन आलेखों और टिप्पणियों का संचयन-संकलन भी किया गया है जो अभी तक किसी पुस्तक में संगृहीत नहीं हैं। कथा समालोचना के मौजूदा स्वरूप का वस्तुपरक आकलन करने की दृष्टि से यह पुस्तक सार्थक और महत्त्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करती है।</p>
<p>इस संचयन-संकलन के चार खंड हैं। पहला खंड समालोचना पर केन्द्रित है। दूसरा खंड लोकप्रियता और व्याप्ति से सम्बन्धित है जिसके अन्तर्गत रंगकर्मी, फ़िल्म निर्देशक और अनुवादक के संस्मरण समेत पाठकों की प्रतिक्रियाओं का दिग्दर्शन करानेवाले लेख भी सम्मिलित हैं। तीसरा खंड बकलमख़ुद श्रीलाल शुक्ल के ख़ुद के वक्तव्यों को समेटता है और चौथा खंड शख़्सियत उनके व्यक्तित्व से सम्बन्धित टिप्पणियों और संस्मरणों को प्रस्तुत करता है। इतनी भरी-पूरी सामग्री के संचयन के कारण यह पुस्तक ‘राग दरबारी’ का आलोचनात्मक दर्पण बन गई है।
Book Details
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ISBN9788126726332
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Pages340
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Avg Reading Time11 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता में कॉलम लेखन को एक नया रूप देने के साथ ही उसे विविधता भी प्रदान की। ‘जनसत्ता’ में लिखे उनके कॉलम ‘कागद कारे’ के समानान्तर ‘प्रथम प्रवक्ता’ का कॉलम ‘लाग लपेट’ तथा ‘तहलका’ का ‘शून्य काल’ भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ‘कागद कारे’ में प्रभाष जी ने अपनी संवेदना के आधार पर समय को परिभाषित किया है जबकि ‘लाग लपेट’ और ‘शून्य काल’ में अपने गांधीवादी विचार और तर्क से समकालीन परिदृश्य की पहचान निश्चित की है।
इस पुस्तक में प्रभाष जोशी के अन्तिम दो वर्षों का लेखन संकलित है। पुस्तक की भूमिका में प्रभाष जोशी की ज़िन्दगी के अन्तिम छह दिनों का संवेदनात्मक वृत्तान्त भी दिया गया है। जीवन के अन्तिम सप्ताह में प्रभाष जोशी अपने लेखन, सामाजिक सक्रियता और विसंगतियों के विरुद्ध व्याख्यान की घुमन्तू दिनचर्या में बेहद व्यस्त थे। पुस्तक के सम्पादकीय में उसका क्रमशः ब्यौरा दिया गया है। भागमभाग के बीच भी क्रिकेट से दीवानगी की हद तक उनका लगाव हमें आश्चर्य से भर देता है।
यह पुस्तक प्रभाष जी के अन्तिम दिनों के वैचारिक मानस को समझने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
Hindi Ke Vikas Mein Apbhransh Ka Yog
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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Description:
प्रस्तुत पुस्तक का संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण पाठकों के समक्ष नई साज-सज्जा के साथ प्रस्तुत है जिसमें परवर्ती अपभ्रंश और आरम्भिक हिन्दी सम्बन्धी नवीन सामग्री, अपभ्रंश और हिन्दी वाक्य-विन्यास का तुलनात्मक विवेचन, अपभ्रंश के कुछ विशिष्ट तद्भव तथा देशी शब्द और उनके हिन्दी रूपों की सूची, अपभ्रंश के प्रायः सभी सूचित और ज्ञात ग्रन्थों की सूची, अपभ्रंश के मुख्य कवियों, काव्यों और काव्य-प्रवृत्तियों की विस्तृत समीक्षा, अपभ्रंश और हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक सम्बन्ध पर विशेष विचारों का समावेश किया गया है।
आशा है, पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा पाठकों का मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होगी।
Aadhunik Kavya Shastra : Kavi Sena Manifesto
- Author Name:
Sheshendra Sharma
- Book Type:

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Description:
भारतीय भाषाओं के संभवतः सर्वाधिक ख्यात और चर्चित कवि तथा विचारक ने यहाँ अपने उस स्वप्न को पूरा किया है जिस में साहित्य-चितन की चार धाराओं का एक साथ विचार होना है, अर्थात् प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र, प्राचीन पाश्चात्त्य काव्यशास्त्र, आधुनिक पाश्चात्त्य काव्यशास्त्र तथा मार्क्सवादी काव्यशास्त्र। यह मैनिफेस्टो, जैसा कि इसे कहा गया है, शेषेन्द्र की शीर्षस्थ उपलब्धियों का द्योतक है। इस के माध्यम से पूर्व, पश्चिम और मार्सीय काव्य-दर्शन का समग्र तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत होता है, जिसने शेषेन्द्र को यशस्वी बनाया है।
मैनिफेस्टो विचक्षण है, साहित्य के विद्यार्थियों के लिए आयामहीन अध्ययन, और काव्यशास्त्र के अध्यापकों के लिए मूल्यवान निर्देशिका, एक अग्रणी विचारक द्वारा काव्यशास्त्रीय विज्ञान का तुलनात्मक मूल्यांकन देनेवाला है।
कवि सेना एक नया बौद्धिक आंदोलन है जिस का उद्देश्य है नयी मनीषा को विकसित करना, युवा विकसनशील पीढ़ियों को सत्य की क्षमता प्रदान करना। मैनिफेस्टो उन्हें सिखाता है कैसे कविता की चुंबकीय शक्ति से सामान्य शब्दों को संपन्न किया जा सकता है, और साहित्य को परिवर्त्तन तथा प्रगति का एक अस्त्र बनाया जा सकता है। यह संभवतः भारत में पहला अवसर है जब एक कवि ने अपने समय का काव्यशास्त्र रचने के लिए लेखनी उठाई है, और अपनी मेधा का उपयोग अपने देश के सामान्य जीवन और समस्याओं के निदान के लिए किया है।
Muktibodh : Sarjak Aur Vicharak
- Author Name:
Sewaram Tripathi
- Book Type:

- Description: तर नेहरू-युग में जैसे-जैसे भारतीय लोकतंत्र जनहितों से निरपेक्ष होता गया है, वैसे-वैसे साहित्य मुखर रूप से लोकतंत्र के भीतर काम कर रही जन-विरोधी शक्तियों के कठोर आलोचक के रूप में सामने आया है। इसी क्रम में मुक्तिबोध की रचनाएँ और विचार हिन्दी में केन्द्रीय होते गए हैं। पारम्परिक रसवादी और रोमैंटिक आग्रहों के सामानान्तर आधुनिक साहित्य ने विचार और बौद्धिकता को केन्द्रीय महत्त्व दिया है। इस संघर्ष में मुक्तिबोध के रचनात्मक और वैचारिक प्रयासों की महती भूमिका है। प्रो. सेवाराम त्रिपाठी की पुस्तक ‘मुक्तिबोध : सर्जक और विचारक', मुक्तिबोध का विवेचन-मूल्यांकन समग्रता से करती है। मुक्तिबोध की रचनात्मकता कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना और पत्रकारिता तक फैली हुई है। इस पुस्तक का महत्त्व यह है कि वह मुक्तिबोध का अध्ययन करने के लिए सभी विधाओं को समेटती है। स्वाभाविक ही है कि ऐसे में लेखक ने मुक्तिबोध के सभी पक्षों पर विस्तृत विचार किया है। सेवाराम त्रिपाठी ने प्रस्तुत पुस्तक में मुक्तिबोध की सर्जना में विचारधारा की भूमिका की पड़ताल की है। मुक्तिबोध हिन्दी रचनाशीलता में एक मुकम्मल और सुसंगत मार्क्सवादी थे। इसका गहरा प्रभाव विशेष रूप से कविता और आलोचना जैसी विधाओं पर पड़ा है। यह प्रभाव सामान्य न होकर जटिल है। लेखक ने पुस्तक में मुक्तिबोध में उपस्थित रचना और विचारधारा की अन्तःक्रिया पर गहन और सूक्ष्म विवेचन किया है। प्रस्तुत संस्करण पुस्तक का दूसरा संस्करण है। इसमें ‘मुक्तिबोध : पुनश्च' शीर्षक से चार नए आलेख जोड़ दिए गए हैं। इन आलेखों में मूल अध्यायों में छूट गई कुछ महत्त्वपूर्ण बातें स्थान पा सकी हैं। पुस्तक न सिर्फ़ गम्भीर अध्येताओं की ज़रूरतों को पूरा करती है, बल्कि सामान्य विद्यार्थियों के लिए भी उपादेय ह
Kavi Ajneya
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

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अज्ञेय का नाम हिन्दी कविता में एक विवादास्पद नाम रहा है। ख़ास तौर से प्रगतिशीलों और जनवादियों ने न केवल उन्हें व्यक्तिवादी कहा, बल्कि उनके विरुद्ध घृणा तक का प्रचार किया और इस तरह एक बड़े पाठक-समूह को इस महान शब्द-शिल्पी से दूर रखने की कोशिश की। सबसे बड़ा अन्याय उनकी कविता के साथ यह किया गया कि उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़े बग़ैर उनके सम्बन्ध में ग़लत धारणा बनाई गई और उसे उनका अन्तिम मूल्यांकन करार दिया गया। हिन्दी के प्रगतिशील कवियों में सबसे बड़े काव्य-मर्मज्ञ शमशेर थे। उन्हें अपना माननेवाले लोगों ने यह भी नहीं देखा कि अज्ञेय के प्रति वे कैसी उच्च धारणा रखते हैं।
आज जब देश और विश्व का परिदृश्य बदल गया है और वैचारिक स्तर पर सभी बुद्धिजीवी पूँजीवाद और समाजवाद के बीच से एक नया रास्ता निकलने के लिए बेचैन हैं, अज्ञेय नए सिरे से पठनीय हो उठे हैं। अब जब हम उनकी कविता पढ़ते हैं, तो यह देखकर विस्मित होते हैं कि बिना व्यक्तित्व का निषेध किए उन्होंने हमेशा समाज को ही अपना लक्ष्य बनाया। इतना ही नहीं, अत्यन्त सुरुचि-सम्पन्न और शालीन इस कवि की कविता का नायक भी ‘नर’ ही है, जिसकी आँखों में नारायण की व्यथा भरी है। उस नर को उन्होंने कभी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने दिया और उसकी चिन्ता में हमेशा लीन रहे। निराला और मुक्तिबोध के साथ वे हिन्दी के तीसरे कवि थे, जो एक साथ महान बौद्धिक और महान भावात्मक थे।
उनके काव्य में आधुनिकता-बोध, प्रेमानुभूति, प्रकृति-प्रेम और रहस्य-चेतना—ये सभी एक नए आलोक से जगमग कर रहे हैं। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नवल की यह पुस्तक आपको आपकी सीमाओं से मुक्त करेगी और आपकी आँखों के सामने एक नए काव्य-लोक का पटोन्मीलन। आप इसे अवश्य पढ़ें।
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