Ek Tha Doctor Ek Tha Sant
(0)
Author:
Arundhati RoyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
250
₹ 200 (20% off)
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वर्तमान भारत में असमानता को समझने और उससे निपटने के लिए, अरुंधति रॉय ज़ोर दे कर कहती हैं कि हमें राजनीतिक विकास और एम.के. गांधी का प्रभाव, दोनों का ही परीक्षण करना होगा। सोचना होगा कि क्यों बी.आर. आंबेडकर द्वारा गांधी की लगभग दैवीय छवि को दी गई प्रबुद्ध चुनौती को भारत के कुलीन वर्ग द्वारा दबा दिया गया। राय के विश्लेषण में, हम देखते हैं कि न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र जो आज ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र है, विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जो जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है।
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वर्तमान भारत में असमानता को समझने और उससे निपटने के लिए, अरुंधति रॉय ज़ोर दे कर कहती हैं कि हमें राजनीतिक विकास और एम.के. गांधी का प्रभाव, दोनों का ही परीक्षण करना होगा। सोचना होगा कि क्यों बी.आर. आंबेडकर द्वारा गांधी की लगभग दैवीय छवि को दी गई प्रबुद्ध चुनौती को भारत के कुलीन वर्ग द्वारा दबा दिया गया। राय के विश्लेषण में, हम देखते हैं कि न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र जो आज ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र है, विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जो जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है।
Book Details
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ISBN9789388933056
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: प्रस्तुत पुस्तक में भारत के पूर्व विदेश सचिव श्री जे.एन. दीक्षित द्वारा पचास वर्षो की अवधि के विस्तृत फलक पर भारतीय विदेश नीति के विभिन्न चित्र सशक्त तथा प्रभावशाली ढंग से उकेरे गए हैं । लेखक ने 1947 को भारतीय विदेश नीति का आरंभ काल माना है । इन्होंने बताया है कि पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारत की विदेश नीति का मूलाधार रखा तथा इसके बाद उनके उत्तराधिकारियों ने इस दिशा में किस प्रकार से व्यापक और महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । इस महत्त्वपूर्ण आख्यान का वर्णन करते समय लेखक ने कालक्रमानुसार भारत की विदेश नीति के विविध पक्षों को उजागर किया है । इसके साथ ही उन पक्षों के राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़नेवाले प्रभावों का भी विवेचन किया है तथा ऐसी युगांतकारी घटनाओं को शामिल किया है जिनका भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर प्रभाव पड़ा है । इसके अतिरिक्त इस पुस्तक में उन घटनाओं के परिणामों तथा प्रतिक्रियाओं का भी विश्लेषण किया गया है । उदाहरण के तौर पर-सन् 1947-48, 1965 तथा 1971 में भारत-पाक युद्ध; संयुक्त राष्ट्र का संदेहास्पद रवैया तथा कश्मीर का मुद्दा; 1962 में भारत-चीन युद्ध; 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का कब्जा; महाशक्तिशाली सोवियत संघ का विघटन; कश्मीर की समस्या तथा पाकिस्तान की ' परोक्ष युद्ध ' की कार्यनीति; 1991 में खाड़ी युद्ध; मई 1998 में भारत-पाक द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण । इस पुस्तक में विश्व के विभिन्न देशों-विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, चीन तथा पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हुए घटनाओं के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विशद विवेचन किया गया है । भारतीय विदेश नीति को आधार बनाकर लिखी गई यह पुस्तक निस्संदेह एक उत्कृष्ट कृति है ।
Mughal Kaleen Bharat (Babar)
- Author Name:
Saiyad Athar Abbas Rizvi
- Book Type:

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Description:
यह ग्रन्थ बाबर के हिन्दुस्तान के इतिहास से सम्बन्धित है। इस कारण कि काबुल की विजय के उपरान्त उसका हिन्दुस्तान से सम्पर्क प्रारम्भ हो गया था। 910 हि. से अन्त तक के पूरे ‘बाबरनामा’ का अनुवाद भाग ‘अ’ में प्रस्तुत किया जा रहा है, किन्तु बाबर के व्यक्तित्व को समझने के लिए उसकी प्रारम्भिक आत्मकथा का भी ज्ञान परमावश्यक है; अत: भाग ‘द’ में इसका भी अनुवाद कर दिया गया है। केवल कुछ थोड़े से ऐसे पृष्ठों का जो पूर्ण रूप से उज्बेगों के इतिहास से सम्बन्धित थे, अनुवाद नहीं किया गया है। ऐसे अंशों के विषय में उचित स्थान पर उल्लेख कर दिया गया है। भाग ‘ब’ में ‘नफ़ायसुल मआसिर’, गुलबदन बेगम के ‘हुमायूँनामा’, ‘अकबरनामा’ तथा ‘तबक़ाते अकबरी’ के बाबर से सम्बन्धित सभी पृष्ठों का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। बाबर को समझने के लिए अफ़ग़ानों के दृष्टिकोण का ज्ञान भी परमावश्यक है; अत: भाग ‘स’ में अफ़ग़ानों के इतिहास से सम्बन्धित ‘वाक़ेआते मुश्ताक़ी’, ‘तारीख़े दाऊदी’ तथा ‘तारीख़े शाही’ का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। परिशिष्ट में ‘हबीबुस् सियर’, ‘तारीख़े रशीदी’, ‘तारीख़े अलफ़ी’ तथा ‘तारीख़े सिन्ध’ के आवश्यक उद्धरणों का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। प्रोफ़ेसर रश ब्रुक विलियम्स द्वारा प्रसिद्धि-प्राप्त ‘एहसनुस् सियर’ नामक ग्रन्थ का मिथ्या-खंडन भी परिशिष्ट ही में किया गया है।
बाबर के इतिहास के लिए उसकी आत्मकथा हमारी जानकारी का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण साधन है। प्रस्तुत अनुवाद अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना द्वारा किए गए फ़ारसी भाषान्तर से किया गया है, किन्तु मूल तुर्की तथा मिसेज़ बेवरिज एवं ल्युकस किंग के अनुवादों से भी सहायता ली गई है। नाम तो सब के सब तुर्की ग्रन्थ से लिए गए हैं और उनके हिज्जे में तुर्की उच्चारण का ध्यान रखा गया है।
उम्मीद है कि यह ग्रन्थ शोधार्थियों और जिज्ञासु पाठकों के लिए उपयोगी साबित होगा।
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